प्रवीण कुमार की दो कविताएं

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे

‘क’ से कलम नहीं जानता वह

‘प’ से पेंसिल मायने भी

नहीं समझता शायद

गुलाब जैसा खुद रहा होगा कभी

शायद जन्म लेने के वक्त

या कुछ महीनों बाद तक

पर अब हो गया है सूखकर कांटे जैसा

स्कूल का मुंह नहीं देखा

लेकिन कर रहा है

भूख के अर्थशास्त्र में पीएडी

 

कल देखा उसे पेंसिल

और गुलाब बेंचते हुए

पिचके पेट, पड़पड़ाए होठ,

सूखी शक्ल लिए

एक-एक रुपए खातिर

गिड़गिड़ाते हुए

 

कोई पहली दफ़ा नहीं

हर रोज पाया जाता है

मेट्रो के नीचे, चौराहों पर

कभी पेन कभी गुलाब

लिए हाथों में

डियोड्रेंट से नहाये लोगों से

रिरियाते, झिड़की खाते हुए

 

मुझे डर लगता है

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले

भूख के इन रिसर्चरों से

 

कहीं पूछ ना लें ऐसा वैसा

संविधान में लिखा अपने लिए

अधिकार क़ानून जैसा सवाल

 

पेंसिल और गुलाब की तरफ

देखने पर छूटते हैं पसीने

चुभने लगते हैं कांटे पोर-पोर में,

बिंध जाती है आत्मा नोंक से

 

इसीलिये उन्हें देखते ही

काट जाता हूँ कन्नी

करने लगता हूँ

इग्नोर करने का नाटक

 

पर अब नहीं बची,

इन  पेंसिल-गुलाब वालों से

बचने की राह

आने लगे हैं वे  नींद में भी

नाक सुड़कते हुए

हाथों में गुलाब लिए

खाली प्लेट जैसा

हर नया दिन

होता है खाली प्लेट जैसा

जिसमें दिखता है

उदास, धुंधला

खुद का अक्स

परोसता हूं उसपर दाल भात

दाल में कभी

नमक ज्यादा कभी हल्दी

दोनों को साधने की कोशिश

रोज होती है, हो रही है

जैसे मेड़ पर चलाना साइकिल

कर देता हूं एक एक चावल बीन,

जीभ से चाट कर प्लेट

पहले से अधिक चमाचम

लेकिन यह चमक तब तक

जब तक उसमें,

दाल-भात की नमी

बनाता हूं अंगुलियों से

मन की खुरापातों की

तस्वीर प्लेट पर,

रोज की तरह

तब तक फिसल कर,

हाथ से गिर गई प्लेट

छन्न की आवाज करके,

जैसे दिन बीत जाता है धीरे से

बाद फिर मचती है हाय-तौबा


प्रवीण कुमार

डी 3/56,सेक्टर 56 नोएडा

8447388711

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