सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘प्रीमियम’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

शिक्षा : बीएससी (फिजिक्स ऑनर्स), एम ए (हिन्दी), एम ए (पत्रकारिता, गोल्ड मेडलिस्ट) सारी पढ़ाई कलकत्ता  विश्वविद्यालय से

पेशा : 3 दशकों से पत्रकारिता। कोलकाता के दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ से 1990 में नौकरी की शुरुआत। दस सालों तक सन्मार्ग में रहने के बाद टेलीविजन पत्रकारिता में। 2001 में ईटीवी (हैदराबाद), 2003 में सहारा समय (दिल्ली) और अब आजतक ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत।

प्रकाशन : 2 कविता संग्रह ‘रोटियों के हादसे’ और ‘अंधेरे अपने अपने’ प्रकाशित।

कहानियां परिकथा, वागर्थ, जनसत्ता, सन्मार्ग समेत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं  में प्रकाशित।

किंडल पर एक लघु उपन्यास ‘कसक’ प्रकाशित। 

सम्मान : कोलकाता जर्नलिस्ट क्लब द्वारा संतोष घोष मेमोरियल अवॉर्ड, ‘दूध’ कहानी के लिए कोलकाता हिन्दी मेला (समकालीन सृजन) की ओर से अलखनारायण स्मृति पुरस्कार।

संपर्क : ईमेल : satyendrasri@gmail. com

मोबाइल : 09811986069

सीने में जैसे कोई सूई चुभो रहा था। तेज़-तेज़, जल्दी-जल्दी। दर्द बर्दाश्त से बाहर था। उसने सीने को जोर से दबाया और फिर डेस्क पर ही झुक गया। उसने सिर को डेस्क पर टिका दिया। सीने को जोर से दबाने से थोड़ा आराम मिला। तो क्या मांसपेशियों में दर्द हो रहा है ? नहीं ये हंड्रेड परसेंट गैस का ही दर्द है। फिलहाल पिछले 15 मिनट से दर्द तो सीने में ही हो रहा है लेकिन यह दर्द अक्सर शिफ्ट होता रहता है। कभी इधर तो कभी उधर। पता ही नहीं चलता कि वास्तव में दर्द हो कहां रहा है। मूविंग पेन हमेशा गैस से हो ही होता है। इतना तो वह जानता था।  इस वक्त भी दर्द गैस की वजह से ही हो रहा है। नाइट शिफ्ट के साथ यही दिक्कत है। बहुत सारी समस्याएं फ्री में मिल जाती हैं। नाइट शिफ्ट के साथ गैस की समस्या फ्री। नाइट शिफ्ट के साथ थकान की समस्या फ्री। नाइट शिफ्ट के साथ नींद पूरी नहीं होने की समस्या फ्री।  नाइट शिफ्ट मतलब आंखों को नीचे काले धब्बों की सौगात फ्री। बंपर ऑफर लेकर आती है नाइट शिफ्ट।

अब जितने दिन नाइट शिफ्ट रहेगी, उतने दिन गैस की इस समस्या से उसे निजात नहीं मिलने वाली। और यहां तो एक महीने की नाइट शिफ्ट लगती थी यानि एक महीने तक इस समस्या को झेलना पड़ेगा। आज तो दूसरा ही दिन था। उदय ने उस हिस्से को जोर से दबाया, जहां दर्द हो रहा था। शुरू में भले ही उसे वहम हुआ हो कि दबाने से आराम हो रहा है लेकिन यह सच नहीं था। तभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि दर्द बाईं ओर हो रहा है। बाईं ओर ही तो दिल होता है। कहीं यह दिल का दौरा…

उदय को घबराहट होने लगी। इस दिल का क्या भरोसा? कोई नहीं जानता कब धोखा दे जाय। उसे शशांक बाबू का ध्यान आया। एकदम हठ्ठे-कट्ठे स्वस्थ। पिछले महीने की 7 तारीख को अचानक चल बसे। दिल का दौरा पड़ा और संभलने का मौका तक नहीं मिला। पता चला था कि उनके भी सीने में ही दर्द हुआ था। गैस के दर्द  के धोखे में वक्त पर डॉक्टर के पास नहीं गए। महज 40 साल के थे। उनकी मौत से पूरा मोहल्ला सकते में थे। कितने अनुशासनबद्ध इंसान थे। जब सुबह उनकी बाइट स्टार्ट होती, लोग बिना घड़ी देखे ही जान जाते थे कि पांच बज गए। ठीक सुबह 5 बजे वो पार्क के लिए निकल जाते। दौड़ते। योग करते।  डाएट कंट्रोल ऐसा कि लोग दांतों तले अंगुली दबा ले। शाम को 8 बजे तक डिनर। उसके बाद कुछ देर नाइट वॉक भी। जिस आदमी ने अपने शरीर के लिए, अपने दिल के लिए इतनी मेहनत की, उसे भी दिल ने धोखा  दे दिया। अचानक सीने में दर्द।  अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मौत। डॉक्टरों ने कहा सिविअर हार्ट अटैक। दिन भर बिना थके, बिना कुछ कहे काम करने वाले हृदय जैसे मेहनतकश ऐसे ही होते हैं। कब बग़ावत कर दें, किसी को नहीं पता।

दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था लेकिन अब वो दर्द से कम दिल के दौरे की आशंका से ज्यादा परेशान हो रहा था। अब दर्द के साथ-साथ घबराहट भी बढ़ने लगी थी। मौत पर तो किसी का नियंत्रण नहीं। जब आना होगा, आएगी ही लेकिन यही सोचकर बैठा तो नहीं जा सकता। अगर गैस का दर्द हुआ तो ठीक लेकिन सचमुच अगर दिल काम करना बन्द कर रहा हो तो? क्या उसे तत्काल डॉक्टर के पास नहीं भागना चाहिए। दिमाग कह रहा था कि उसे अभी, इसी वक्त अस्पताल के लिए निकल जाना चाहिए। अभी वह मौत के सामने सरेंडर करने की स्थिति में नहीं था। यह ज़िन्दगी उसकी अपनी नहीं है। कई बैंकों के पास उसने इसे गिरवी रखी हुई है। ईएमआई के इतने बोझ उसके सिर पर थे कि अभी मरने की बात सोची ही नहीं जा सकती थी। दरअसल उसने खुद को कर्ज देने वालों का बंधुआ मज़दूर बना लिया था। एक तरह से वह उनके लिए दफ्तर में काम करने आता था। सैलरी आती थी लेकिन एक हफ्ते के अन्दर ही ईएमआई के दीमक  अंदर अंदर ही अंदर उसके बैंक खाते को खोखला कर देते। अगर अभी उसे कुछ हो गया तो परिवार सड़क पर आ जाएगा। मदद का वहम पैदा करने वाले बैंक संभलने का मौका तक नहीं देंगे।

“अरे कितनी फालतू बातें सोचता है वह” उसने खुद को ही फटकारा , “मामूली से दर्द को लेकर बात का बवंडर बनाए जा रहा है। यह गैस का ही दर्द है। कोई पहली बार थोड़े ही न हुआ है।” खुद को तसल्ली देते हुए वह उठ खड़ा हुआ। गैस का पुराना मरीज है वह। थोड़ा टहलेगा तो गैस से राहत मिलेगी।  वह ऑफिस के अहाते में   निकल आया। अहाते में सन्नाटा छाया हुआ था। कोई नहीं था। अमावस के आसमान पर डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। इस सन्नाटे को वह अपने अंदर भी महसूस कर रहा था।  दफ्तर के बगल वाले कॉम्प्लेक्स में झिंगुरों का राज था और उनकी आवाज़ ही इस डरावने सन्नाटे को तोड़ रही थी। बगल वाला प्लॉट खाली पड़ा था और रखरखाव के अभाव में उसमें बेतरतीब जंगल उग आए थे। दफ्तर के अहाते में एलईडी ट्यूबलाइट्स एक ख़ास दायरे तक अमावस के अंधेरे को परास्त करने में कामयाब नज़र आ रहे थे। काश ऐसी ही कोई एलईडी उसके मन के अंदर भी जल उठती तो वह चिन्ता और तनाव के सारे अंधेरे का एक झटके में नाश कर देता।

उसने घड़ी देखी। रात के 2 बज रहे थे। नहीं, इस वक्त अहाते में टहलना ठीक नहीं। अगर सचमुच दिल का दौरा पड़ गया तो वहीं तड़प-तड़प कर मर जाएगा। इलाज तक मयस्सर नहीं होगा। उसे दफ्तर के ही नरेश बाबू का किस्सा याद आ गया। 2 साल पहले की ही बात है। नरेश बाबू नाइट शिफ्ट में थे। रात को कब बाहर आए, किसी को पता नहीं चला। फिर लौटे ही नहीं। सभी नाइट शिफ्ट वाले सुबह अपने अपने घर पहुंच गए लेकिन नरेश बाबू घर नहीं पहुंचे। जब खोज  शुरू हुई तो पार्किंग में उनकी कार में ही उनकी लाश मिली। नरेश बाबू रात को सिगरेट पीने बाहर निकले थे। सिगरेट पीने के बाद शायद थोड़ी देर आराम  करने के लिए अपनी कार में बैठ गए लेकिन उसी दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। कोई मदद नहीं मिल पाई और उनकी जान चली गई। उनके परिजनों को ही नहीं बल्कि दफ्तर  के लोगों को भी यह अफसोस आज भी सालता है कि अगर कोई देख लेता तो समय से उन्हें इलाज मिल जाता और शायद वो बच जाते। तभी उसे पता चला था कि दिल की बीमारी अब महामारी को रूप लेती जा रही है।

उसने अहाते में टहलने का इरादा छोड दिया। दफ्तर के अंदर लौट आया। वहीं टहलने लगा। बड़ी तेज़ डकार आई। राहत मिली। गैस ही है। बेवजह परेशान हो रहा है वो। ये गैस की समस्या भी अजीब है। अजीब अजीब भ्रम पैदा करती है। वैसे गैस का उर्ध्वमुखी होना अच्छा भी नहीं है। कभी सीने में दर्द पैदा करेगी तो कभी सिर में। कभी इधर दर्द तो कभी उधर दर्द। बच्चों की तरह आंख मिचौली खेलती है पेट की ये बदतमीज गैस।

“अरे, कहां टहल रहे हैं उदय बाबू?  नींद आ रही है क्या?” शुक्ला जी ने पूछा।

उदय का जी बात करने का नहीं हो रहा था लेकिन इस शुक्ला का कोई क्या करे। टोकाटोकी करने की बुरी आदत। कितने लोगों के सामने से गुजरा लेकिन किसी ने कुछ नहीं पूछा लेकिन शुक्ला से रहा ही नहीं जाता। खुद स्टोर में रात भर सोता है लेकिन उसे दूसरों की बड़ी चिन्ता रहती है कि कहीं सो तो नहीं रहा। अगर पता चल गया तो इस ख़बर को फैलाते भी देर नहीं लगती उसे। कई बार तो मोबाइल से फोटो या वीडियो बनाकर ऑफिस वाले व्हाट्सअप ग्रुप में शेयर कर चुका है। दिखाता तो यह है कि सब मजाक में कर रहा है लेकिन जिस ग्रुप में बॉस हों, उस ग्रुप में इस तरह की तस्वीर या वीडियो डालने का क्या मकसद है, यह उदय खूब समझता था। खैर, उदय को ऐसे लोगों की परवाह कभी नहीं रही। वह अपने काम के प्रति शत-प्रतिशत ईमानदार था। नाइट शिफ्ट में आजतक  कभी भी दफ्तर में नहीं सोया।

जी में तो आया कि कह दे कि अरे मेरी नौकरी स्टोर में थोड़े ही है कि रात में सो सकूं लेकिन उसे पता था कि इस जवाब से बात बहुत लंबी खिंचती। वह शुक्ला के साथ बक-बक  करने के मूड में नहीं था। उसने कहा, “नहीं, ऐसे ही थोड़ा टहल रहा था। बैठे-बैठे कमर अकड़ गई थी।”

शुक्ला को जवाब का कोई मौका दिए बगैर वह आगे बढ़ गया। डकार आने से थोड़ी राहत मिली। कई बार लंबी-लंबी डकारें ली उसने। गैस निकल रही थी। चिन्ता दूर हुई। बेवजह डर रहा था वह। दिल का दौरा मजाक थोड़े ही है। भला उसे क्यों पड़ेगा दिल का दौरा? कितनी परहेज से तो रहता है वह। परहेज? नहीं परहेज ही तो नहीं करता वह। सिगरेट उसे छोड़ देनी चाहिए। अब छोड़ देगा। बिल्कुल छोड़ देगा। उसने हिसाब लगाया रोज 7-8 सिगरेट पी लेता है। दिल का दौरा नहीं तो कैंसर तो हो ही जाएगा। हर बार धूम्रपान वाला विज्ञापन देखने के बाद तय करता है कि सिगरेट छोड़ देगा लेकिन नहीं हो पाता। पत्नी कह कह कर थक गई। अब बच्चे भी थकने लगे हैं। बिटिया तो हर रोज उसे सिगरेट पीते वक्त आंखें दिखाती है और वह हंस कर टाल देता है, ‘बस बेटा, आज की आखिरी सिगरेट।’

उसमें इच्छाशक्ति का बहुत अभाव है, वरना सिगरेट छोड़ना कौन सा कठिन काम था। उसने सिगरेट छोड़ने का सिस्टेमेटिक प्लान भी बनाया था। सिस्टेमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान की तरह सिस्टेमेटिक नो स्मोकिंग प्लान। दोस्तों में खूब चर्चित हुआ था इसका यह प्लान। प्लान के मुताबिक उसे हर हफ्ते एक एक सिगरेट कम करना था। जैसे जैसे सिगरेट की संख्या कम करनी थी, वैसे वैसे दो सिगरेट के बीच का टाइम गैप बढ़ाना था। इस तरह 7 से 8 हफ्ते में सिगरेट बन्द लेकिन दो से तीन हफ्ते से ज्यादा ये प्लान टिक नहीं पाता। उसके इस प्लान पर अमल कर उसके दो दोस्त सिगरेट छोड़ चुके थे लेकिन वह नहीं छोड़ पाया। लेकिन अब नहीं। सेहत के प्रति गंभीर होना जरूरी है। अब आज रात सिगरेट नहीं। सिगरेट से भी तो एसिडिटी होती है। डॉक्टर ने उसे हाइपर एसिडिटी का शिकार बताया था। एसिडिटी और गैस यही उसकी समस्या है—और सिगरेट इसकी एक मुख्य वजह जरूर है। अभी गैस इतना सता रही है, इससे पहले कि यह धूम्रपान कैंसर की वजह बन जाय, उसे सिगरेट छोड़नी ही पड़ेगी। दृढ़ संकल्प के साथ वह फिर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया।

काफी काम पड़ा हुआ था। उसने काम शुरू तो किया लेकिन फिर वही दर्द। अभी तो गैस रिलीज हुई थी। लंबी लंबी  डकारें ली थी। फिर दर्द। बाईं ओर। नहीं, उसे अब लापरवाही नहीं करनी चाहिए।  दिल के दौरे का लक्षण को ठीक से समझना होगा। गूगल की मदद लेने के अलावा इतनी रात को और कोई चारा नहीं था। कई वेबसाइट थे। न्यूज़ वेबसाइट से लेकर मेडिकल वेबसाइट तक में दिल के दौरे के लक्षण बिखरे पड़े थे। सीने में दर्द, सीने में दबाव, दिल के बीचों-बीच कसाव महसूस होना, शरीर के दूसरे हिस्सों में दर्द,  अमूमन सीने से बाएं हाथ तक दर्द का प्रसार होता है लेकिन कभी कभी दोनों हाथों में भी दर्द हो सकता है। दर्द जबड़े, गर्दन, पीठ और पेट की ओर जाता हुआ महसूस हो सकता है। मन अशांत लगेगा, चक्कर आ सकता है, शरीर पसीने से तरबतर हो जाएगा,  सांस लेने में तकलीफ होगी, उल्टी जैसा महसूस होगा।

ओह, इतना सब कुछ तो नहीं हो रहा है। उसने ठीक से ध्यान दिया। सीने में दर्द था। बाईं ओर। हाथ, गर्दन, जबड़ा या  कहीं और दर्द नहीं था। बेचैनी हो रही थी। मन घबराया था लेकिन वह समझ नहीं पाया कि दर्द की वजह से या ईएमआई की उसकी चिन्ता की वजह से। पसीना वसीना तो बिल्कुल भी नहीं आ रहा था। नहीं, दिल का मुआमला नहीं है। उसने लगे हाथ गैस दर्द का लक्षण भी चेक कर लिया। इससे कंफ्यूजन पैदा हो गया। गैस दर्द के लक्षण भी दिल के दौरे से होने वाले दर्द के लक्षण से मिलते जुलते ही थे। पेट में दर्द के अलावा सीने में दर्द, उल्टी आना, गर्दन या कंधे में दर्द। आधे लक्षण तो दिल के दौरे वाले ही थे। गूगल ने दिल के दौरे और गैस की शिकायत में ऐसा घालमेल किया कि उदय परेशान हो गया। जिस बारे में बिल्कुल भी जानकारी न हो, उस बारे में गूगल ज्ञान खतरनाक हो सकता है। उसे याद आया, उसने फेसबुक पर एक वीडियो देखा था, जिसमें दिल का दौरा पड़ने से तत्काल मौत के वीडियो थे। ऐसी कई मौत को मिलाकर एक वीडियो। ख़बर पढ़ते पढ़ते एंकर की मौत, स्टूडियो में बहस करते वक्त गेस्ट की मौत, प्रेस कांफ्रेंस में वैज्ञानिक की मौत। दिल तो संभलने का मौका नहीं देता।

‘हे भगवान, दया करो। आज की रात सकुशल निकाल दो। कल सुबह ही डॉक्टर के पास जाऊंगा’ वह मन ही मन बुदबुदाया। दर्द बढ़ता जा रहा था। तभी एक और रिपोर्ट पर नज़र पड़ी। 15 मिनट से ज्यादा देर तक सीने में दर्द हो सकता है हार्ट अटैक का लक्षण। अनदेखी ना करें। तत्काल किसी कॉर्डयोलाजिस्ट से संपर्क करें।  उसके सीने में तो एक घंटे से ज्यादा वक्त से दर्द हो रहा है। घबराहट हो रही है। सांस लेने में तकलीफ हो रही है और वह काम किये जा रहा है। अगर आज की रात बच गया तो कल सुबह सुबह ही कॉर्डियोलॉजिस्ट के पास जाएगा।

बच गया तो? ये क्या बात हुई? उसे बचना ही पड़ेगा। अभी वह मर ही नहीं सकता। अभी बच्चे किसी ठौर नहीं लगे हैं। बेटा बारहवीं का इम्तिहान देगा। बेटी आठवीं में है। इन्हें बीच भंवर में छोड़ कर वह कैसे जा सकता है। उसने लोन का हिसाब लगाया। होम लोन 22 लाख। पर्सनल लोन साढ़े आठ लाख। कार का लोन 3 लाख । क्रेडिट कार्ड पर करीब सवा लाख बकाया।

यानि करीव 35 लाख का कर्ज उस पर था। होम लोन तो इंश्योर किया हुआ था। उसकी मौत के बाद होम लोन का बोझ घर वालों पर नहीं पड़ना था लेकिन पर्सनल लोन और कार लोन इंश्योर नहीं था। पौने तेरह लाख का सीधा बोझ उसके बाद परिवार पर पड़ेगा। पीएफ ग्रेच्युट मिलाकर इतना पैसा भी नहीं मिलने वाला था। परिवार तो सड़क पर आ जाएगा। इस कर्ज से वह बहुत ज्यादा परेशान था। वेतन ईएमआई में चला जाता। घर की जरूरतें पूरी करने के लिए बीच-बीच में क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करना पड़ता था। जब क्रेडिट कार्ड का बिल विशालकाय रूप धारण कर लेता और उसकी लिमिट खत्म हो जाती तो पर्सनल लोन लेकर उसे चुकाता। इस चक्र में वह पिछले 15 सालों से फंसा हुआ था। इससे मुक्त ही नहीं हो पा रहा था। हर बार फैसला करता कि क्रेडिट कार्ड सरेंडर कर देगा लेकिन कभी नही कर पाया। डर सताता कि अगर अचानक कोई इमरजेंसी आ गई तो? ख़ासकर वो मेडिकल इमर्जेंसी से डरता था। अगर किसी की तबीयत खराब हो गई और अस्पताल जाना पड़ा तो। अस्पताल वाले तो मुंह खोलते ही कम से कम  25 हजार रुपए की डिमांड करते हैं। इतने रुपए जमा करे बगैर इलाज शुरू ही नहीं होता। कहां से लाएगा वह 25 हजार रुपए? उसके बैंक एकाउंट ने  वेतन के दिन के अलावा एक साथ इतने रुपयों का मुंह कभी नहीं देखा था। जो आदमी क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन के चक्कर  में फंस गया वो सेविंग्स की बात तो सोच ही नहीं सकता। उदय के लिए भी बचत किसी दिवास्वप्न से कम नहीं था। पर्सनल लोन लेकर क्रेडिट कार्ड का कर्ज चुकाने के बाद वह इस संकल्प के साथ कार्ड को रख लेता कि इसका इस्तेमाल वह सिर्फ मेडिकल इमरजेंसी में करेगा। उसे छिपाकर रख देता लेकिन हालात ऐसे बनते कि फिर से क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करना ही पड़ता।

उसने सोचा जब कर्ज के इतने स्रोत नहीं थे तभी लोग खुश थे। किराये के मकान में रहते थे। हर महीने किराया भरते। रिटायरमेंट के बाद पीएफ-ग्रेच्युटी के पैसे से घर बनाते लेकिन अब तो हर चीज के लिए कर्ज है। हर कदम पर महाजन खड़े हैं। कर्ज देने को बेकरार। शहर में जो आदमी जितना साधन सम्पन्न और सुखी दिखता है, समझिए वह उतना ही ज्यादा कर्ज में डूबा हुआ है। इस कर्ज़ की वजह से शहर की रीढ़ की हड्डी झुक गई है। वह तन कर खड़ी हो ही नहीं सकती। एक कर्ज़खोर कभी बग़ावत नहीं कर सकता। स्वाभिमान के साथ नहीं जी सकता। वह उसका खुद का अनुभव था। जिस बॉस के मुंह पर थूक देना चाहिए था, उस बॉस की हर खरी-खोटी सुननी पड़ती थी। बॉस की हर बात का जवाब दिया जा सकता था लेकिन तभी तमाम ईएमआई याद आ जाती और डंडे की तरह सीधी रहने की जगह रीढ़ की हड्डी धनुष जैसी मुड़ जाती।

उसके पास दिन भर कर्ज देने वाले महजनों के ही फोन आते रहते। कभी ये बैंक, तो कभी वो बैंक। आपने एक बार  लोन ले लिया तो इससे मुक्ति नहीं थी। ये नए जमाने के महाजन थे। कर्ज बांटने को ऐसे बेकरार रहते जैसे खैरात बांट रहे हों। जो फंस जाता वो बस कर्ज ही भरता रह जाता। उदय ऐसे ही फंस चुका था।

“आपका सिबिल तो बहुत ही अच्छा है।” महाजनों की ऐसी बातों पर पहले उदय को सीना गर्व से फूल जाता लेकिन बाद में उसे लगा कि सिबिल अच्छा होने का मतलब कि वह ईमानदार कर्जखोर है। समय से ईएमआई चुकाता है। कभी ईएमआई बाउंस नहीं होता। इसलिए वह महाजनों का प्रिय है। हर महाजन उसे कर्ज़ देना चाहता है। महाजनों के प्रिय कर्जखोर की सूची से वह निकलना चाहता था लेकिन आजतक नहीं निकल पाया। घर की जरूरत, बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च कुल मिलाकर वह बुरी तरह फंस चुका था। अगर एक भी ईएमआई नहीं होती तो उसे जितना वेतन मिलता है, उससे बहुत ऐश से ज़िन्दगी कट सकती थी। वह सोचता अगर अपना घर नहीं होता, अपनी कार नहीं होती तो क्या फर्क पड़ता जिंदगी पर। किराये के मकान में रह लेता। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से चल लेता। जिस दिन ज्यादा आराम की जरूरत होती उस दिन कैब कर लेता। कितने पैसे होते! सेविंग्स कर पाता। आखिर इस घर और कार का क्या मतलब है? इनकी ईएमआई के चक्कर में ज़िन्दगी जहन्नुम बन गई है। जिस घर के लिए इतनी जद्दोजहदक वह घर भी घर नहीं रहा। हर वक्त पैसे के लिए चिक-चिक। कभी कभी जी  में आता कि घर बेच दे लेकिन अब तो घर बिकना भी मुश्किल था। सही दाम नहीं मिलता। बिल्डरों ने इतने घर बना दिए थे कि उनके ही खरीदार नहीं थे। ऐसे में पुराने फ्लैट का खरीदार कहां से मिलता?

सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। दर्द फिर शुरू हो गया था। लग रहा था कि कोई बार-बार सूई चुभो रहा हो। कायदे से तत्काल अस्पताल जाना चाहिए लेकिन अभी ऐसा करना उसे सही नहीं लग रहा था। दफ्तर के आसपास ही कई बड़े अस्पताल हैं। दफ्तर वाले गाड़ी भी मुहैया करा देंगे। लेकिन अस्पताल जाने का मतलब ही था कम से कम 20-25 हजार का झटका। उसके खाते में इतने पैसे तो थे नहीं। क्रेडिट कार्ड का लिमिट भी खत्म होने वाला था। वह दोबारा पर्सनल लोन लेने के कगार पर खड़ा था। पुराने पर्सनल लोन पर टॉप अप।

कहीं आज की रात ही उसकी आखिरी रात तो नहीं? वह तड़प उठा। आंखों के सामने बीवी-बच्चों का चेहरा घूमने लगा। मेरे बिना क्या होगा इनका? उसकी बेचैनी और बढ़ गई। आंखें  छलछला आई। बेटा तो फिर भी समझदार है लेकिन बिटिया का तो उसके बिना काम ही नहीं चलता। घर  में रहो तो दिन भर पापा, पापा । पापा के बिना उसकी जिंदगी में मानो कुछ है ही नहीं। काश दीपा कोई नौकरी कर रही होती तो उसे इतनी टेंशन नहीं होती। वह निश्चिन्त होकर मर तो सकता था। अब उसकी समझ में आ रहा था कि बीवी का भी नौकरी करना कितना जरूरी है। ज़िन्दगी का क्या भरोसा? किसकी मौत कब आ जाय-कोई नहीं जानता। अगर आज वो बच गया तो दीपा की नौकरी के लिए पूरी तरह लग जाएगा। उसे भी प्रोत्साहित करेगा कि वह खुद भी कोशिश करे। एमए बीएड है। किसी ना किसी स्कूल में नौकरी जरूर मिल जाएगी। बच्चों की देखरेख के लिए आया रख लेगा।

दर्द और तेज़ हो गया। वह एक बार फिर उठा। फिर टहल ले अगर गैस हो तो आराम मिलेगा लेकिन शुक्ला का ख्याल आते ही फिर कुर्सी पर बैठ गया। स्साला, बेवजह जिरह करेगा। फिर डकार आई। आराम हुआ लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। उसने याद किया उसके पास कुछ  7 लाख रुपए की बीमा पॉलिसी है। थोड़ी राहत मिली। यही एक बचत है। उसके बाद ये रुपए परिवार के काम आएंगे लेकिन तभी उसे याद आया। 4 लाख वाली पॉलिसी का प्रीमियम बाकी है. मोबाइल पर लगातार एसएमएस आ रहा था लेकिन बजट ही नहीं बन पा रहा था। प्रीमियम नहीं भरा तो यह पॉलिसी तो लैप्स मानी जाएगी। इसका फायदा तो घर वालों को मिलेगा ही नहीं। बीमा कंपनियों का नियम साफ है। लैप्स पॉलिसी पर कोई डेथ बेनिफिट नहीं मिलता।

सीने का दर्द अलार्मिंग स्थिति में था लेकिन अब उसे अस्पताल नहीं बीमे की पॉलिसी की चिन्ता बार-बार  सता रही थी। उसने झट से बीमा कंपनी की वेबसाइट खोली। लॉगिन किया। 6 हजार 337 रुपए देने थे। क्रेडिट कार्ड का लिमिट चेक किया। 7000 रुपए बचे थे। उसने बिना देर किये  प्रीमियम भर दिया। इतनी राहत मिली मानो प्राण निकलने से पहले मुंह में गंगाजल और तुलसीदल पड़ गया हो। मानो प्राण निकलने से पहले किसी ने गाय की पूंछ पकड़ा दी हो। वह निश्चिंत होकर कुर्सी पर पसर गया।

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यह कहानी परिकथा के सितंबर अक्टूबर 2019 अंक में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी संग्रह कथा-कहानी -1 में भी संकलित है।

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