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रोटियोें के हादसे

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव


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‘रोटियों के हादसे’ की भूमिका वरिष्ठ कवि परम श्रद्धेय स्वर्गीय अजित कुमार ने लिखी थी। संग्रह की पहली प्रति कवि ने उन्हें ही सौंपी थी। उसी मौके पर ली गई तस्वीर। उनकी स्मृतियों को हमारा नमन।


”सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएं लघु पत्रिकाओं में जब-तब पढ़ने पर उनकी ऊर्जा और संलग्नता के प्रति मेरा मन आकर्षित हुआ था। उनकी कवितओं के प्रथम संग्रह की पांडुलिपि देखने का अवसर मिलने पर यह प्रभाव और गाढ़ा हुआ कि वे सूक्ष्म संवेदना के धनी हैं, कि उनकी संपदा मात्र शाब्दिक या मौखिक नहीं, कि अभाव, असुरक्षा और असमानता के खिलाफ़ लड़ाई में वे सामान्य जन के साथ मौजूद हैं। और ये मौजूदगी सिर्फ़ नारा लगाने तक सीमित नहीं, उसमें कंधे से कंधा मिला चलने और जूझने का जज़्बा भी है।
स्वाधीन भारत में अमीरों की अमीरी और ग़रीबों को ग़रीबी बढ़ी है, इस भयावह सच्चाई से किस तरह निबटा जाय, एक पेचीदा सवाल है। सत्येंद्र प्रसाद की कविता ना उससे आंख चुराती है, न उसे अतिरंजित करती है। शांत-संयत किंतु निश्चित गति से वह उसको समझने का यत्न करती है। शायद इसमें से ये संभावना उभरे कि रोज़ी-रोटी की तलाश में घर-गांव छोड़ महानगर में मर-खप जाने वालों में से कुछ तो ऐसे होंगे जो सचमुच अच्छा जीवन जीने के वास्ते अपने यहां लौट पाएंगे।
काश ये सपना कभी सच हो।”
AJIT JI
अजित कुमार
‘रोटियों के हादसे’ की भूमिका

‘रोटियों के हादसे’के बारे में

देश में उनका हाल तो और बुरा है, जिन्हें दो जून की रोटी बमुश्किल नसीब हो पा रही है। सामाजिक-सियासी हालात ऐसे हैं कि भूखे मर रहे लोगों की कोई पूछ तक नहीं है। यकीन नहीं तो ताजा ग्लोबल हंगर इंडेक्स में देश का हाल ही देख लीजिए. ऐसे वक्त में सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव अपने कविता संग्रह में इन्हीं सवालात से मुठभेड़ करते नज़र आते हैं।
india today
इंडिया टुडे
कभी अदम गोंडवी ने जिस ‘पेट के भूगोल’ की बात की थी, वह सत्येंद्र के यहां कदम दर कदम दिखाई देता है। उनकी कमोवेश सारी कविताएं मनुष्यता की लाचारी से उपजी पीड़ा से ग्रसित है।
jansatta
जनसत्ता
‘रोटियों के हादसे’ में कुल 51 कविताएं संकलित हैं। कुछ के अकार बहुत छोेटे हैं लेकिन प्रकार और सरोकार बहुत बड़े। इन कविताओं में कवि अपने ईमान की प्रखरता के साथ अपनी हर कविता मेें तप्त-दग्ध मौजूद है। ‘रास्ता रोका है मजदूरों ने/क्योंकि उन्हें रोटी की जरूरत है/पुलिस ने बरसाए हैं डंडे/क्योंकि भूख उन्हें भी लगती है.’ जाहिर है कवि बड़ी खूबी से मुल्क की अर्थव्यवस्था को बेनकाब कर देता है।
–नूर मुहम्मद नूर, वरिष्ठ कवि-कथाकार
lahak
लहक
समय के साथ सभ्यता का विकास होता गया लेकिन भूख और रोटी का विकास नहीं हुआ। आज भी ये अपनी आदिम अवस्था में ही हैं। कवि पत्रकार सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का काव्य संकलन ‘रोटियों के हादसे’ जीवन की इन दो विधाओं की घटनात्मक यात्रा है। –ओमप्रकाश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
sanmarg
सन्मार्ग
भूख इस संग्रह का केन्द्रीय विषय है।आज के दौर में जहाँ देश की एक चौथाई आबादी को रोज भर पेट भोजन नसीब नहीं होता कवि की चिंताएँ बहुत वाजिब है।इस संग्रह की इक्यावन कविताएँ हमारे समय का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमें उद्वेलित करते हुए ठहर कर सोचने को मजबूर करती है।
ANAND GUPTA 19 JULY
आनन्द गुप्ता, युवा कवि
भूख, रोटी, धर्म, दंगे, सिस्टम के बीच पिसते हुए गरीब-मजूर, कविता संग्रह में जगह-जगह मौजूद हैं। कही सीधे-सीधे तो कहीं संकेतों में। संग्रह का शीर्षक ” रोटियों के हादसे ” दरअसल संग्रह का केंद्रीय स्वर है।
GANESH PANDEY
गणेश पांडेय, वरिष्ठ कवि
कविताएं अच्छी ही नहीं दमदार और नोकीली भी है।समय की चीख ही इन कविताओं की दिलकशी है ।कहीं दस्तयाब हों जाएं तो आप भी ज़रूर पढें।
नूर मुहम्मद 'नूर'
नूर मुहम्मद ‘नूर’, वरिष्ठ कवि
शोषित और शोषक तंत्र के बीच जो लोग खड़े होते हैं , उनके अन्तर्सम्बन्ध के आर्थिक श्रेणी की द्वंद्वात्मक अवस्थिति को बखूबी अपनी कविता में कवि ने रखा है! इस कविता में कला का जो क्षण बचा रह गया, उसका बोध कविता पढ़ने से स्वयं हो जाता है। यही इस किसी कवि की कलात्मक विशिष्टता हो सकती है जो कलासौष्ठव के लिए कविता में अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करता बल्कि खुद वह आकर दमकने लगती है।
sushil-kumar
सुशील कुमार, वरिष्ठ कवि
मेरी इस दृष्टि से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव उन कवियों में मुझे दिखाई देते हैं, जो अपने कवि-कर्म को सीधे उस वर्ग का हिस्सा बनाते हैं, जिस वर्ग को हमारे समर्थन की ज़रूरत सदियों से रही है। इस कवि की वास्तविक छवि यही है कि यह कवि दुनिया-भर के आम आदमी के संघर्ष में साथ देने के लिए खुल्लम-खुल्ला डटा खड़ा है।
2803 SHAHANSHAH
शहंशाह आलम, वरिष्ठ कवि
सत्येंद्र भैया की कविताओं को देख पढ़ कर हमने कविताएं लिखनी शुरू की थी।पिछले रविवार को भैया की पहली किताब”रोटियों के हादसे” राकेश दा से मिला।खुश हूं।भैया की एक कविता आप मित्रों के अवलोकनार्थ-आज भी नहीं जला चूल्हा/आज भी उदास है मां/बच्चों की आंखों में आज भी है आंसू/वो पूछते हैं/मां, रोज भूख क्यों लगती है?
NISHANT
निशान्त, युवा कवि

‘रोटियों के हादसे’ की कुछ कविताएं

आग

फैक्टरी की बांझ बन गई
चिमनी
अब धुआं नहीं उगलती।

मौन, उदास चिमनी को
हर रोज
सैकड़ों आंखें घूरती हैं
पर
चिमनी नहीं तोड़ती
अपनी चुप्पी
नहीं देती
किसी भी
सवाल का जवाब
क्योंकि
उसके पेट में
अब नहीं दहकती आग।

सिर्फ
एक भट्टी के बुझ जाने से
जल रही है
कई जगह आग।

वह बच्चा
छटपटा रहा है
पेट में जलती आग से
मां की सलाह पर
वह गटागट पीता है पानी
लेकिन आग
बुझती नहीं
धधक उठती है।

मां के हृदय में है
मां होने की आग
जो
हर पल उसे
थोड़ा-थोड़ा राख करती है
और बाप?
वह तो
खुद बन गया है आग
जो फूंक डालना चाहता है
ऐसी व्यवस्था को
जहां
भूख की आग में
हो जाता है सबकुछ राख।

श्रमजीवी

चींटियों काकोई धर्म नहीं होताकतारबध्द चींटियांसिर्फ मेहनत करना जानती हैंदिन-रातचौबीसों घंटेबस काम और काम। उन्हें फुरसत ही नहींधर्मं के बारे मेंसोचने की न वे मस्जिदें तोड़ना जानती हैंन मंदिर बनानालेकिनजब-जब टूटी हैं मस्जिदेंजब-जब गिराये गये हैं मंदिरकुचली गईं हैं चींटियांकतारबध्दमेहनतकश चींटियां।

अगर भूख नहीं होती

भूख रोटी की 
भूख बोटी की
भूख शरीर की
भूख सत्ता की

भूख ही लड़ाती है
भूख ही नचाती है

भूख ही भगवान है
भूख ही शैतान है

सोचिए
अगर भूख नहीं होती
तो कितनी सुंदर होती ये दुनिया!!!

 

रोज-रोज भूख

आज भी
नहीं जला चूल्हा
आज भी
उदास है मां
बच्चों की आंखों में
आज भी है आंसू
वो पूछते हैं
मां, रोज भूख क्यों लगती है?

 

सिस्टम

रास्ता रोका है मज़दूरों ने
क्योंकि उन्हें
रोटी की जरूरत है

पुलिस ने बरसाए हैं डंडे
क्योंकि भूख उन्हें भी  लगती है

भूख दीवानी है

मैंने ठंडे चूल्हे में
मुहब्बत को दम
तोड़ते देखा है

भूख दीवानी है
किसी को नहीं छोड़ती

आक्रोश

कुत्तों में आक्रोश है
आदमी के प्रति
क्योंकि
आदमी ने
दुम हिलाने  के
मौलिक अधिकार से
वंचित कर दिया है उन्हें।

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