पूनम शुक्ल की 6 कविताएं

पूनम शुक्ल

जन्म 26 जून 1972 
जन्म स्थान – बलिया , उत्तर प्रदेश 

शिक्षा – बी ० एस ० सी० आनर्स ( जीव विज्ञान ), एम ० एस ० सी ० – कम्प्यूटर साइन्स ,एम० सी ० ए ० । कुछ वर्षों तक विभिन्न विद्यालयों में कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान की । अब कविता कहानी लेखन मे संलग्न ।

कविता संग्रह ” उन्हीं में पलता रहा प्रेम ” किताबघर प्रकाशन , दिल्ली द्वारा 2017 में प्रकाशित 
कविता संग्रह ” सूरज के बीज ” अनुभव प्रकाशन , गाजियाबाद द्वारा 2012 में प्रकाशित ।
“सुनो समय जो कहता है” ३४ कवियों का संकलन में रचनाएँ – आरोही प्रकाशन 

नया ज्ञानोदय,पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, गर्थ,मंतव्य,विपाशा, जनपथ,स्त्री काल ,संचेतना,रेतपथ,युद्धरत आम आदमी, कविता बिहान, परिकथा,लाइव इंडिया,समालोचन,दैनिक जागरण,दैनिक ट्रिब्यून, हरिगंधा,शोध दिशा,भारतीय रेल,जनसत्ता दिल्ली,संवेदना,नेशनल दुनिया,जनसंदेश टाइम्स ,चौथी दुनिया,परिंदे,सनद,एवं कुछ ब्लाग्स में रचनाएँ प्रकाशित । समावर्तन में कविताएँ रेखांकित । 

ई मेल आइडी – poonamashukla60 @gmail.com

1. जीवन एक युद्ध है 

नजर आता है 
हर तरफ एक युद्ध
अंदर बाहर
घर में, गली में
दुकानों में, मॉल्स में
अस्पतालों, दफ़्तरों, बैंकों की लंबी कतारों में
अपने उनके सबके विचारों में
खुद के विचारों में 

इस शरीर के भीतर भी युद्ध ही है
लड़ती हैं सैकड़ों कोशिकाएँ
आक्रमण,संक्रमण के खिलाफ

हर दिन लोहा लेती है एक स्त्री
विभिन्न विचारों
अनिच्छित कार्यों
जुल्मों के खिलाफ
पर लोहा लेते हुए कम हो जाता है
उसके रुधिर में लोहे का स्तर

एक स्त्री
नव सृजन को
दे देती है
अपनी मजबूत हड्डियों का एक अंश
फिर थोड़ी कमजोर हुई
हड्डियों के सहारे
अपने शरीर का बोझ उठाते
चलती रहती है
सुबह से रात तक
साथ छोड़ने लगती हैं हड्डियाँ
कहीं पोली 
कहीं आकृति बदलने लगती हैं हड्डियाँ
औरत फिर लड़ती है
अपनी ही हड्डियों के खिलाफ 

कैल्शियम और आयरन की
गोलियाँ गटकती हुई
बखूबी जानती है
आज की औरत
जीवन एक युद्ध है ।

2. पहाड़ का राई 

अहंकार का पहाड़ 
अक्सर रहता है मेरे आस-पास
पर ऐसा कहीं लिखा ही नहीं 
कि अगर आपने कैद कर लिया
अपने अहं को अपनी मुट्ठी में 
तो अदृश्य हो जाएगा यह पहाड़ भी 

पहाड़ ज्यों को त्यों है 
लगता है मैं ही लुप्त हो जाऊँगी 

सोचती हूँ 
उठा ही लूँ अब
चाणक्य नीति की किताब 
लिखा है जिसमें 
उजागर करना मत कभी 
सत्य अहं के सम्मुख
बस उसे तुष्ट करना
और पहाड़ को राई में 
तब्दील होते देखना ।


3. चुप्पी 

चुप होने के भी होते हैं कई कारण
किसान अपना गमझा अरगनी पर टाँग
आसमान देखता बैठ जाता है चुप 
हम दुख में एकाएक चुप हो जाते हैं 

वे इसलिए चुप हैं क्योंकि चुप रहने तक ही वे जीवित हैं
वे इतना बोल चुके हैं कि अब वे चुप हो जाना चाहते हैं
वे चुप हैं क्योंकि उनकी आवाजें पहचानी जा सकती हैं

शिकारी शिकार के पहले हो जाते हैं चुप
बाबा रहते हैं अपनी रोशनी की उजास में चुप
प्रेमी प्रेम में चुप हो जाते हैं 
तुम आँखों से बोलते हो इसलिए चुप हो 
बच्चे सपनों में हो जाते हैं चुप 
वह चुप है क्योंकि वह डराता है
वह डरती है इसलिए चुप है ।

4. आज सुबह

रोज ही तो होती थी बात
वह ऊपर बालकनी से नीचे झाँकता 
रोज ही पूछता था
क्या हो रहा है भाई साहब
चाय शाय चल रही है क्या
नया नीला कुर्ता बड़ा जँच रहा है आज
संतरे आज क्या भाव मिले
ग्रीन टी ही पीयो हैल्थ ठीक रखेगी 
अमेरिका से बेटा कब तक आएगा

आत्मीयता तो बन ही जाती है 
जब रोज कोई करे ऐसे सवाल
सो छोड़ गए वे शरीर अपना सुबह ही आज
उसी ऊपर वाले के सहारे 
पर ऊपर वाला धीरे से उठा
तैयार हुआ धीरे से सीढ़ी से उतरा
और बड़बड़ाता हुआ निकल गया 
दफ्तर के लिए देर हो रही है ।


5. चाहिए 

शब्द चाहिए ……
इजाद किया होगा किसी ने यह शब्द भी 
और फिर पीछे पूँछ की तरह 
खस दिया गया होगा हर वाक्य के 
आप को सुबह जल्दी उठ जाना चाहिए
आप को खूब मन लगा कर पढ़ना चाहिए 
आप को झूठ नहीं बोलना चाहिए 
आप को बड़ों का आदर करना चाहिए 
पर इस शब्द में बच्चे उलझ जाते हैं अक्सर 
जो करने के लिए कहा गया भारी हो बन जाता है पत्थर 
चाहिए में दिखती है एक अकड़ 
हुक्क़ाम का हुक्म 
जो खड़ी करती है एक दीवार …….
इस चाहिए का तो खात्मा कर देना चाहिए 
सोचती हूँ मगर कैसे ?
अब भी क्या इस शब्द को यूँ कूद कर आ जाना चाहिए ।


6. बुजुर्गों के बीच

जब भी बैठती हूँ मैं बुजुर्गों के बीच 
देखने लगती हूँ उनके हाथ पाँव खूब गौर से 
उनके उजले-उजले बाल जो रंगे हुए नहीं होते 
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं 
उजले बालों के बीच ही कहीं-कहीं 
कुछ रेखाएँ होती हैं काले बालों की 
जो कहती रहती हैं गाथाएँ 
जिन्हें सुनना होता है हमें धीरे से 

उनके शरीर की चमड़ी जो पड़ गई होती है ढ़ीली 
और लटकने लगती है एक-एक इंच नीचे 
जी करता है छू लूँ और सहलाऊँ उसे धीरे से
मैं अक्सर बैठ जाती हूँ उनके बहुत पास 
और निहारती हूँ उनके चेहरों की रेखाएँ 
जो होती हैं कहीं सीधी कहीं आड़ी कहीं तिरछी 
जिनमें समाहित होती हैं उनकी सारी पीड़ाएँ 

और सबसे प्यारी बात तो यह है 
कि जो बातें बताई गई थीं उन्हें कुछ दिनों पहले ही 
वे उन्हें तनिक याद नहीं रहतीं 
उन्हे फिर से बतानी होती हैं वही बातें धीरे से ।

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