पुष्कर बन्धु की 5 कविताएं

पुष्कर बन्धु

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक ( हिन्दी साहित्य ) 2017 । सोशल मीडिया पर कविताओं का प्रकाशन । साहित्य , समाज और राजनीति में  गहरी रुचि ।

पता – हौसला सिंह लॉज, नसीरपुर, सुसुवाहि , हैदराबाद गेट , BHU

चयन और प्रस्तुति : विहाग वैभव

 

  1. श्रष्टा’ तुम कब थे

मैं कल्पनाएं करने में ही इतना स्वतंत्र क्यों हूँ ?

क्यों मुझसे ख्वाबों की दूसरी दुनियां में जाने को वीज़ा नही माँगा जाता

मेरे प्रतिद्वन्द्वी से मेरी हार ही क्यों मुझे आगे ज़िन्दा रहने का टिकट दिलाती है

मेरे खुद से खेलने के लिए रचे खेल

मेरे राजा की मुझसे की गई राजनीति से कही कठिन है

फिर भी मैं

बार-बार इस राजनीति का शिकार क्यों हो जाता हूँ ?

रॉयल इन्फिल्ड के 350 सी सी के इंजन को रवा करने वाले मेरे ये मैकेनिक हाथ

किसी कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते वक्त क्यों कांप जाते हैं?

मेरा भय ही मेरी जिजीविषा की साँसें क्यों है ?

क्यों मेरे भय के दूर हो जाने का मतलब है

मेरी साँसों का मुझसे दूर हो जाना

मेरी संस्कृति को आगे ले जाते

मेरे ये पांव कुचल दिए जाते हैं

यदि इनके आने की आहट

किसी मंत्रलाय तक पहुँचती है

मेरी आँखों से चमकता ये प्रकाश

कैंटोमेंट व सेंट्रल सेक्रेटेरिएट की दूधिया रौशनी से कहीं तेज है

क्योंकि इसे कभी मैंने ही लगाया था

वो आँख आज बंद हो गए हैं हमेशा के लिए

मेरे श्रष्टा!

मुझे क्षमा करना

क्या दुनिया में इतने ज़ुल्मो का होना

तुम्हारे न होने का प्रमाण नहीं है     

2. पूरब और पश्चिम

यथार्थ से कोसों दूर

मेरी कल्पना में दफन वह घड़ीसाज

मेरे सपनों में आ

बार- बार मुझे जगा जाता है

जिसके बनाये घड़ी की सूइयाँ

हमारे मिलन बिन्दु से प्रारम्भ होकर,

तुम्हारे चले जाने पर बंद हो जाती थीं

चाँद का हाथ पकड़े

वो रात मेरे स्मरण में हमेशा आती है

जो रात तुम्हारी आँखों के बंद होने पर

मुझे सुला जाती थी

उस पीपल की शीतल छांव को

न भूलने का शापित मैं

नहीं ही भूल सकता उस शाम को

जिससे उत्पन्न ठंडी हवाएँ

तुम्हारी गर्म साँसों से मात खाती चली गई थीं

मेरे रोओं को स्पर्श करता

अधरों की चंचलता के बीच

संकोचवश मेरा नाम लेती

तुम्हारी यह मधुर आवाज़

मेरे संगीत प्रेमी होने की मुख्य वजह थी

परंतु अब

हमारे प्रेम का बाधक मेरा यह

खोखला आदर्श

मेरे पैरों को जंजीरो सें जकड़ देता है

इन रुढ़ परम्पराओं की जड़ों को

सींचता तुम्हारा वह परिवेश

हमारे निश्छल प्रेम संबंधों की सीमाएं

ठीक वैसे ही बनाता है जैसे

तुम पूरब और मैं पश्चिम ।

3.पाप नही होता

कंठ सूखने लगे

जीभ में स्वाद की कोई अभिलाषा न रहे

भूख मिटाने को बस दिन डूबने का इंतज़ार  हो

उधर संसद की आवाज़ चुभने लगे कानो में

तो जीवित रहने के लिए

उन पर पत्थर उठाना आसान लगता है

जब किसी जातयुद्ध में

आठ साल की बच्ची से छीन लिया जाए

उसका बचपन और

हाथों में आ जाए एक और

दो साल के बच्चे की परवरिश का जिम्मा

तब उस माँ को

किसी यशोदा के स्थान में स्वीकारना

बेईमानी नहीं होता

इक पत्थर को भोग लगाने

मंदिर से आने वाली

घण्टी की आवाज़

अंदर तक बेध जाए उनको

जिनके यहाँ उस रोज़ चूल्हा नहीं जलता

तब इस पाषाण जगाती घण्टी को चुरा लेना

पाप नहीं लगता

यौवन प्राप्त करती

किसी लड़की को देख

मुँह से लार टपकाते

उन बाबाओं के प्रवचनों से

वस्त्रहरण की कथा सुनकर,

हाथों को उनकी जिव्हा खींच लेने से रोकना

एक कमज़ोर लोकतंत्र में रहना लगता है

अंगारे उगलते उन आँखों का तेज

किसी विराटरूपी अवतार के

भस्म करती नेत्रों से

कहीं गाढ़ी तेजस्वी दिखे

जिससे भयभीत होकर लोगों में

समानता आने का आसार हो,

तब लोगों को भयाक्रांत रखना

पाप नहीं होता

  1. प्रेम का अर्थात

हर भेंट के पश्चात

मेरे हृदय को परत-दर-परत लीपता

तुम्हारे होने का एहसास

रात की गहराई से खींच भोर के चाँद को

हमारे आलिंगन का साक्षी बना

सूर्योदय की पहली किरण साथ लिए

रोशनदान की आंखों से झाँककर

एक प्रश्न करता है कि,

इस प्रेम का अर्थ क्या है ?

मेरे शरीर पे निर्बाध गति से

टीपा गया तुम्हारा चुम्बन

इस दुपहरी में सूखे कंठ को भीगा

सूर्य को चुनौती देता

दिन भर मुझे गतिशील रखकर

सर्यास्त के साथ ही पुनः

एक प्रश्न छोड़ जाता है कि,

इस प्रेम का अर्थ क्या है ?

कस्तूरी धारण की उस दिव्यहिरणी को ललकारता

चारों ओर हवाओं मे मादकता बिखेर

जीवों को मदहोश करता

तुम्हारे स्पर्श का यह गंध

मेरे वक्ष पर तुम्हारी चंदन रूपी शरीर के

घिसने का संकेत है

और इस प्रश्न का उत्तर भी कि

प्रेम में अर्थ नही,

हर अर्थात में प्रेम छुपा होता है..

  1. अंत तक बस ‘प्रेम

मैं तुम्हारे ज़िन्दगी में आऊंगा,       

आ ही जाऊंगा

पर

वैसे नहीं जैसे सब आते हैं

मैं आऊंगा

वैसे

जैसे,

किसी बच्चे के मुँह में दाँत आते हैं

टूटते हैं, पुनः आते हैं

फिर कभी नहीं जाते

मैं आऊंगा

वैसे

जैसे,

तुम्हारे बाल सफ़ेद होंगे

तुम उसे बाज़ारी उपकरणों से छुपाओगी

पुनः छुपाओगी

फिर थक कर मुझे सबके सामने अपनाना ही होगा

मैं वैसे ही आऊंगा

और

उसे जाना ही होगा

जिसने आज तुम्हारी ज़िन्दगी को

लालिमा से भर दिया है

वैसे ही जैसे तुम्हारे हाथों की मेहँदी

दिन-ब-दिन फीकी होकर मिटेगी

तुम पुनः उसे लगाओगी

पर वह धुँधलाता जायेगा ही

फिर कभी न आने के लिए.

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