रागिनी शर्मा “स्वर्णकार” की तीन कविताएं

सरलता ही है जीवन

सरल सरल सांसों से
बनता सुन्दर ,
मृदुमय जीवन !
सहज सहज बातों से
बनता सहज
भाषा साधन !
सहज ही होते हैं
सुख के आनन्दित क्षण
जब पाते हृदय का
सरल स्पंदन !!
वृहद आकार पाते
जब जुड़ते सरलता से
सरल सरल लघु कण !

सुलझाओ कठिन
उलझे धागों को
बनो सरल से सरल
सरलतम !
सुलझे सुलझे भावों से
बनता है अपनापन!
पिघले रहो
जमो मत
बहो बन तरल तरलतम!
बर्फ भी बहता तब
जब पिघले जल के कण कण!
झरना झरता झर झर
मुक्त हो जाता प्रेमिल जल कण!

आँसू

याद बहुत आये थे आँसू
प्यार की कसक भरे वे आँसू
मधुर मधुर उस मधुशाला में
रस से छलक उठे थे आँसू

सरिता से सागर रूठा था
या अवनि से जलधर रूठा था
साथ छोड़ रही थी कश्ती
साहिल का सिसक उठे थे आँसू

प्यार प्यार बस प्यार चाहिए
हर धड़कन पर अधिकार चाहिए
प्रिय की बेरुखी से व्याकुल
होकर हिलक उठे थे आँसू

मैं वो नहीं…

मैं वो नहीँ हूँ ,जो डर जाउंगी !
मैं आँधियों सेभी लड़ जाउंगी!

चाहे सताती रहें रूढ़ियाँ,
चाहे चुभती रहें ,पैर में सीढ़ियाँ

काँटे रोकें चाहे रस्ते डसें
लोग हंसते हैं तो ,हंसते रहें !

संग संग मैं समय के गुज़र जाउंगी!!
मैं वो नहीं हूं जो……………….

प्रीत ही मैं लिखूं ,चाहे नफरत मिले
मैंनेे सपने हैं सभी मेहनत से सिले

उमंगों से भरा एक दरिया हूँ मैं
महकती हुयी सी एक बगिया हूँ मैं

खुशबु हूँ हवाओं में बिखर जाउंगी
मैं वो नहीँ हूँ जो ……….

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