राहुल कुमार बोयल की 4 कविताएं

राहुल कुमार बोयल
जन्म दिनांक- 23.06.1985
जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान)
सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक
पुस्तकें- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)
नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)
मैं चाबियों से नहीं खुलता( काव्य-संग्रह)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं यथा वागर्थ, सृजन सरोकार, किस्सा कोताह, कथा, दोआबा, हिन्दी जनचेतना, हस्ताक्षर वेब पत्रिका इत्यादि में कविताएँ/ग़ज़ल प्रकाशित।
मोबाइल नम्बर- 7726060287
ई मेल पता- rahulzia23@
 
 
  1. कवि नहीं थे

    कवि नहीं थे

    वो खाये- पीये – अघाये लोग थे

    वो अपने एकान्त में 

    चीज़ों की बहुलता से तंग आये लोग थे

    उनकी करुणा उधार की थी

    उनके रिश्ते खरीदे हुए थे

    वो शालीनता का दिखावा थे

    वो संवेदनाओं से अलगाये लोग थे

    वो गधों की तरह खपे नहीं थे

    वो मानवता- स्केल से नपे नहीं थे

    उनके हँसने-रोने में भी अनुशासन था

    वो परोपकार की छवि नहीं थे

    कवि नहीं थे

    वो नशे मे धुत मुस्काये लोग थे

    वो मिट्टी से थोड़े ऊपर के थे 

    दिन में दस बार नहाये लोग थे।

     

    उन्होने हरियाली की बातें की

    वो फूलों को चूमा करते थे

    वो जड़ों से जुड़े रहने के हिमायती थे

    पर कभी उन्होने पौधे लगाये नहीं थे

    वो पसीने की करते थे पैरोकारी

    अमन और क्रान्ति के लबादे ढोते थे

    पर बरक्स ख़ुद के भी कभी 

    कांधे तक उचकाये नहीं थे

    उन्होंने स्त्रियों पर विमर्श लिखा

    पितृसत्ता के ख़िलाफ़ कई शब्द उछाले

    उन्होंने शान्ति का उत्कर्ष लिखा

    वो भाग्य के सताये नहीं थे

    वो यजमान थे, हवि नहीं थे

    कवि नहीं थे

    वो भरे पेट के चुगली खाये लोग थे

    वो अतिरेक से उबकाये लोग थे

     

    कवि नहीं थे

    वो सबकुछ थे, बस कवि नहीं थे

    वो खाये- पीये – अघाये लोग थे।

     

    2.  धिक्कार

    हमने लड़ने के लिए 

    अपने – अपने पक्ष चुने

    हमने अपने- अपने विचार गढ़े

    एक दूजे के तर्क सुने

    मतभेदों को स्वीकारा

    विविधताओं का स्वागत किया

    हमने पृथक – पृथक संस्कार धरे

    हमने सैंकड़ों त्रासदियाँ भोगी

    पर हम अर्हताओं के कथानक रहे

    हमारे भीतर युगों के दु:ख थे

    पर हम सुन्दरताओं के मानक रहे।

     

    हमने दुनिया के भूगोल को ललकारा

    हमने प्रेम में प्रतिष्ठा पायी

    हमने वैश्विक जिम्मेदारियाँ उठायीं 

    किन्तु अपनी मिट्टी से प्यार करना नहीं छोड़ा

    हमने नदियों का वरण किया

    जीवन-कला में वैचित्र्य पाया

    हम घावों को पढ़कर बड़े हुए, 

    हमने चोटों से प्रतिवाद किया

    हमने हर कालखण्ड को चुनौती दी

    हमने तमाम घृणाओं को धूल चटायी।

     

    फिर समय के एक टुकड़े ने स्वांग किया

    हमें श्रेष्ठ – हीन के बीच में टाँग दिया

    हम बेसिर-पैर की लड़ाइयों के पुरोधा हुए

    हज़ारों अंवाछित युद्धों में सम्मिलित हुए

    हम गर्व से फूलकर कुप्पा हुए

    अपनी ही दृष्टि में योद्धा हुए

    हमने धीरे- धीरे धैर्य खोया

    हम विपाक भूले, वीर्य खोया

    हमने वैकुण्ठ और स्वर्ग के फर्ज़ी स्वप्न देखे

    हमने हठधर्मिता भोगी, हमने कृतघ्न देखे।

     

    हमने परिष्कार से मुँह मोड़ा

    हमने चिरपरिचित मार्ग छोड़ा

    हमने बेशर्मी की हदें लाँघी, दाँत चिराये

    हमने धूमिल किया अपने को, गरियाये

    धिक्कार! हम धिक्कार की ध्वनि सुनते गये

    ओह! प्रतिकार में हम भी यही दोहराते गये

    अपने गीत भूलते रहे, बस गालियाँ गाते गये

    धिक्कार ! छि: छि: ! थू -थू ! मैं – मैं ! तू- तू!

     

    3.  हम बैल थे

    हमने हल जोते

    खेतों की सफ़ाई में हाथ बंटाया

    कुओं से पानी निकाला

    हमने ऊख पेरी

    घाणी से तेल निकाला

    हमारी पीठ ने तुम्हारे कूल्हे ढोये

    बग़ैर हमारे सारे चूल्हे रोये

    हमारे दु:ख से धरती हरी थी

    हमने हस्ती गिरवी धरी थी

    हम बस गोबर-मैल लगे

    हाँ, हम नहीं थे पक्की छत की मानिन्द

    पर हम निर्धन की खपरैल थे

    हम बैल थे

    केवल बैल थे।

     

    हम भादो की काली चौदस को जन्मे

    और केवल अमावस तक जीवित रहे

    बस एक दिन जिये,

    पोला- पिठोरा में एक दिन सजे

    बस एक दिन तुम्हारी खीर खायी

    बस एक दिन पूरणपोळी चखी 

    तुमने हमारे सींग संवारे

    पर नकेल धँसा कर यूँ ही रखी

    कहीं अन्नमाता ने गर्भ धरा

    कहीं धान में उतरी दुग्ध की धारा

    बस सधा तुम्हारा काज

    बस मना तुम्हारा पर्व

    हम जोड़ी में दौड़े

    दौड़ कर जिताया तुम्हे

    मगर हम हारे

    कि हम नहीं थे झूरी के हीरा- मोती

    हम बिगड़ैल थे

    हम बैल थे

    केवल बैल थे।

     

    हम वृषभ थे 

    हम ऋषभ थे

    हम बारात में तुम्हारे रथ बने

    कहीं खिलौनों की तरह बिके

    कभी मिट्टी के हुए 

    कभी पत्थर के हुए

    सड़क पे कट के मरे

    हम आवारा कहलाये

    पीछे पड़े डण्डों से डरे 

    हमारे खेत छूटे

    हमारे भाग फूटे

    हम ताकतवर थे

    न कि गुस्सैल थे

    हम बैल थे

    केवल बैल थे।

     

    हमने साथी खोये

    हम कितने तन्हा रोये

    हम गाढ़ी अंधेरी रात में

    तेज़ धूप – बरसात में

    बर्फ़ानी शीत में तुम्हारे काम आये

    हमने लकड़ियों के गट्ठर खींचे

    हम चलते रहे आँखें मींचे

    हमने छींके देखे

    हमने खुराई झेली

    हमने जलते जंगल देखे

    हमने उगते मक़तल देखे

    हम भूखे रहे, खेतों को छाना

    सबने हमें लावारिस माना

    हम शिव के नन्दी नहीं थे

    हम शैल थे

    हम बैल थे

    केवल बैल थे।

    (पोला-पिठोरा मूलत: कृषकों से जुड़ा हुआ बहुत ही सुन्दर त्योहार है। भाद्रपद की अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है।पूरणपोळी नामक विशिष्ट आहार इस दिन बनाने का रिवाज है।)

     

     

    4. शिशुओं का रोना

    मेरी दृष्टि में 

    सभी शिशुओं के रोने का स्वर

    तक़रीबन एक जैसा होता है

    और हँसने की ध्वनि भी लगभग समान

     

    किसी अंधेरी रात में 

    रो रहे हों यदि 

    तीन-चार शिशु एक साथ

    तो क्या तुम पूरे विश्वास से 

    कह सकते हो कि

    तुम्हारा बच्चा नहीं रो रहा!

     

    सारे शिशुओं को भाती है

    गोद की सघनता 

    और दुग्ध की तरलता

    अस्वस्थ माँ में भी होती है अहर्ता

    कि रोक सके वह 

    अपने शिशु का क्रन्दन

     

    ओ पिताओ!

    तुम भी अपनी बाँहें खोलो

    घर के बाहर 

    अबोध शिशुओं का भयंकर क्रन्दन है

    माँ तो सदियों से बेचैन है 

    बच्चों के लिए

    क्या तुम निश्चिन्त हो कि

    बाहर रोता बच्चा तुम्हारा नहीं है?

     

Leave a Reply

Your email address will not be published.