राहुल कुमार बोयल की 10 कविताएं

 

राहुल कुमार बोयल

जन्म – 23.06.1985
जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान)
सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक

पुस्तक- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)

मोबाइल नम्बर- 7726060287 
ई मेल पता- rahulzia23@gmail.com 

 

 
1. मैं जानता हूँ
____________
 
मैं उस किसान को जानता हूँ 
जिसके खेत में इतनी कपास होती है
कि रेशे से उसके फांसी का फंदा बनता है।
 
मैं उस लुहार को जानता हूँ
जो लोहे पर हथौड़े चलाकर उकता गया है
और अब निहाई पर अपनी किस्मत पीटता है।
 
मैं उस बच्चे को जानता हूँ 
जिसकी आँखों के गीलेपन का फ़ायदा उठाकर
बेमुरव्वत ताक़तों ने उनमें बंदूकें उगा दी हैं।
 
मैं उस सिपाही को जानता हूँ
जिसके सीने से इंकलाब जैसे शब्द मिटा दिये गये ह
और थोप दिये गये हैं मज़हब के ग़लत मायने।
 
मैं उस औरत को जानता हूँ
जिसकी अस्मत पे उंगलियाँ उठ जाती हैं
वो जब भी अपना हक़ लेने घर से निकलती है।
 
मैं उस सुराही को जानता हूँ
जिसकी गर्दन में गंगा का पानी है
मगर पेंदों पर तेज़ाब की तलछट जमी है।
 
मैं उस मजदूर को जानता हूँ 
जो दिन भर जीने की क़वायद में काम करता है
और हर रात पीकर ख़ुद को मार लेता है।
 
मैं उस मोची को जानता हूँ 
जिसने ताउम्र सिले हैं हज़ारों जूते-चप्पल
मगर अपनी फटी बिवाइयाँ सीने में नाकाम रहा है।
 
मैं उस बड़े आदमी को जानता हूँ
जो भूख मिटाने के बदले गोश्त और ख़ून माँगता है
ऐसे हताश आदमी को भी पहचानता हूँ मैं
जिसे रोटी के बदले ईमान बेचना पड़ता है।
 
मैं उस पण्डित को जानता हूँ
जिसने इस धरती पर दो बार जन्म लिया
और बीसियों बार क़त्ल कर दिया गया।
 
मैं उस मौलवी को जानता हूँ
जिसे पता था इबादत और तक़्वा का सही अर्थ
मगर मुँह खोलते ही वो काफ़िर करार दे दिया गया।
 
मैं ऐसे गांव को जानता हूँ
जिसकी सड़कों की अंतड़ियाँ निकाल ली गयी हैं
ऐसे शहर से भी वाक़िफ़ हूँ मैं
जिसकी आस्तीन में बारूद की फ़सल होती है।
 
मैं ऐसे तलबगारों से भी हुआ हूँ रूबरू
गालियाँ जिनके लिए अभिव्यक्ति का अधिकार है
मैं ऐसे सरफ़रोश को जानता हूँ
जिसकी बहादुरी का ईनाम ग़द्दारी का तमगा लगाकर दिया गया।
 
मगर………………..
 
मैं ऐसे भारत को भी जानता हूँ
जो सत्तर साल भार ढ़ोकर भी बूढ़ा नहीं हुआ
मैं ऐसे भारतवासी को भी जानता हूँ
जो चिथड़ों में पड़ा है मगर रूआंसा नहीं हुआ।
 
इसलिए……….
 
मैं धरती की मटमैली देह पर 
पानी के नीले निशानों की वकालत करता हूँ
मैं इस देश के हर बाशिन्दे के पैरों की मिट्टी
और बदन के पसीने की वकालत करता हूँ।
 
जो झूठे आश्वासनों के बाद चैन से सोता है
मैं ऐसे नेता की धोती खोलने की वकालत करता हूँ
जो जनता का दर्द लाल फीतों में बाँध के नहीं रखता
मैं उस अफ़सर की हुकूमत की वकालत करता हूँ।
 
मैं उन सब ज़िन्दगियों की ख़िलाफ़त करता हूँ
जो बेवजह भीड़ का हिस्सा हो जाती हैं
मैं उन तमाम मौतों से मुहब्बत करता हूँ
जो खाद बनकर खेतों की शान हो जाती हैं।
 
मैं ऐसी बंदूक की तलाश में हूँ
जिसकी दुनाली का मुँह ख़ौफ़ की तरफ़ हो
मैं ऐसी बारूद का हिमायती हूँ
जो बदन पर छिटकते ही भस्म बन जाती हो।
 
मैं ऐसे दिलों की तलाश में निकला हूँ
जो मिट्टी की सुगन्ध से बहलते हैं
मैं ऐसे होंठों को चूमने की तमन्ना करता हूँ
जो मुल्कपरस्ती के गीतों पर ठुमकते हैं।
 
मैं ऐसी आँखों की तलहटी में सोना चाहता हूँ
जो मुहब्बत में सरहद के उस पार भी निकल जाती हैं
मैं ऐसी हथेलियों को कांधों पर रखना चाहता हूँ
जिनकी थाप से इंसाफ की शहनाई के सुर निकलते हैं।
 
मैं उन सीखचों का हमेशा अहसानमंद रहूंगा
जिन पर मेरे विचारों को भूनकर पकाया गया
मैं उन भट्टियों का भी कर्ज़दार रहूंगा
जिनमें मेरे भीतर के कुरा को पिघला दिया है।
 
मुझे ऐसे अख़बार में अपनी तस्वीर देखनी है
जिसकी काली छपाई में सच सहमा हुआ न हो
मुझे ऐसे चैनल पर सुननी है मेरी मौत की ख़बर
जिसकी कड़वाहट पर रिश्वतों की मिठास न हो।
 
मैं भारत के केसरिया लिबास में
दंगों की आग नहीं, बदलाव की भंगवासा चाहता हूँ
मुझे हर हाथ की ताक़त बनना है
न कि टूटे हुए जिस्मों पर झूठमूठ का दिलासा चाहता हूँ।
 
मैं हर बच्चे, बूढ़े और जवान के हाथ की
वो एक ख़ास क़लम बन जाना चाहता हूँ
जो बदगुमान सरकार की गर्दन पर चलते ही
किसी चाकू या ख़ंज़र की नोंक बन जाती है।
 
जब बाहर की ख़ामोशी और भीतर का भूकम्प
मिलकर एक नयी इंसानी क़ौम को जन्म देंगे
तब सफ़ेदपोश कालिख़ पोतकर 
क़ानून के कटघरे में लाये जायेंगे।
 
मैं सचमुच का भारत बन जाना चाहता हूँ
भारत जिसकी आरजू आज़ाद ने की होगी
वही भारत जो भगतसिंह का महबूब है
वही भारत जो तेरा-मेरा गुरूर है, रौब है, वजूद है।
 
 
[कुरा= वह गाँठ जो पुराने ज़ख़्म में पड़ जाती है । इसमें पीब जमा रहता है और नासूर हो जाता है ।]
भंगवासा= हल्दी
 
 
2. प्रारब्ध
____________
 
प्यार करने के लिए 
मेरे पास चार शब्द थे
घर, तुम, मैं और मुल्क
और इनके भी अपने प्रारब्ध थे।
 
घर बचाने के लिए
तेरे शहर किराये पर रहना पड़ा
घर छूट गया
तुमसे निभाने के लिए
ख़ुद से ही लड़ना पड़ा 
और मैं टूट गया
 
मुल्क के ऐतिहासिक सौन्दर्य पर
हमारे भविष्य स्तब्ध थे
स्वप्नों का शब्दकोश बहुत बड़ा था
पर मेरे पास चार ही शब्द थे
और इनके भी अपने ही प्रारब्ध थे।
 
 
3. सच?
_______________
 
क्या सच वही है जो दिखता है ?
क्या सच वही है जो सुनता है ?
क्या सच वही है जो झूठ नहीं है ?
क्या सच का वर्ण-रूप नहीं है ?
अस्तित्व सच का निर्विवादित रहेगा
पर क्या सच अपरिभाषित रहेगा ?
 
सच की खोज में कौन गया है ?
क्या लौट आया है यदि गया है ?
सच को किसने सही कहा है ?
क्या देखा- सुना वही कहा है ?
सच सुन्दर मर्यादित रहेगा
पर क्या सच अपरिभाषित रहेगा ?
 
सच को जिसने कटु कहा है ?
उस वाणी में क्या मधु रहा है ?
सच में मारे है झूठ कुलाँचे
जैसे पूर्वज लिख दे और वंशज बाँचे 
सच शोभित अलंकारित रहेगा
पर क्या सच अपरिभाषित रहेगा ?
 
चाहिए सच को अवलम्ब किसका ?
बाहर लाओ, है भय-भ्रम किसका ?
सच को ईश का मार्ग कहा है
पर समझ तो आये कि सच क्या है ?
सच शाश्वत निरंकारित रहेगा
पर क्या सच अपरिभाषित रहेगा ?
 
4. ज़िन्दा रहने की तड़प
____________________
 
रात तुम्हारे लिए सोने की एक कोशिश भर है
मगर मेरे लिए 
ज़िन्दा रहने की तड़प से भरी हुई एक चीख।
 
दिन तुम्हारे लिए रोजगार की तलाश से लेकर
मौज़ उड़ाने तक का एक मुमकिन सफ़र है
मगर मेरे लिए
ख़ुद को जोड़ते-जोड़ते टूट जाने का एक गहरा सदमा।
 
तुम्हारा दिल इतना बड़ा है कि 
दुनिया की तमाम ख़ूबसूरत चीज़ें
सहेज कर रखी जा सकती हैं ख़्वाहिशों की शक्ल में
मगर मेरे लिए 
दिल एक ऐसी काली कोठरी है
जिसमें तमाम टूटे हुये सपनों की लाश दफ़न है।
 
तुम रोज़ बाज़ार की सरगर्मियों का लुत्फ़ उठा सकते हो
हर शाम थकान का बहाना कर ख़ुद को सुला सकते हो
मगर मेरे लिए
जितना मुश्किल है महंगी होती ज़मीनों की ख़रीद करना
उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है दो पल सुकून से सो लेना।
 
तुम मुझ पर लगा सकते हो 
बहुत ज़्यादा ज़ज़्बाती हो जाने का ठप्पा
तुम इस धूल खाये शहर की हवा से निकलकर देखो
तुम्हें मेरा पसीना भी तुम्हारे ख़ून से गाढ़ा मिलेगा।
 
सही और ग़लत के पैमाने तय करने वाले
मेरे भीतर लगी आग में जब नहीं सेंक पाते हाथ
तब तुम्हारी मुट्ठियों में कसी हुई रेत
करके पानी की तरह इस्तेमाल
तुम्हारे हाथों ही बुझा देना चाहते हैं मुझे।
 
जब तक मेरे अल्फाज़ तुम्हारे कानों से होते हुये
तुम्हारे जिस्म के किसी हिस्से को छूये बग़ैर
तुम्हारी रुह पर चस्पा होंगें
तब शुरू करोगे तुम ज़िन्दा रहने की तैयारी
पर तब तक मैं मर चुका होऊंगा
क्यों कि अभी
रात तुम्हारे लिए सोने की एक कोशिश भर है
और मेरे लिए
ज़िन्दा रहने की तड़प से भरी हुई एक चीख।
 
 
5. लोहा
______________
 
 तुम्हारी प्रतीति चुम्बक की तरह है
जिसको मेरे वृत्ताकार जीवन के केन्द्र में रख दिया गया है
मैं स्वयं को लोहे की निर्मिति मानता हूँ
परन्तु इस लोक में तुम जिससे भी पूछोगे
वह इस काया को मिट्टी ही बतायेगा।
 
मैं तुम्हारे मुख से सुनना चाहूँगा
कि मिट्टी में इतना लौहा कहाँ से आया?
तुम्हे यकीन नहीं आयेगा 
जब मैं तुम्हे बताऊंगा कि
यह प्रेम में मिली यातनाओं का प्रतीक है
जितना लोहा मिट्टी में धँसाया गया
उतना ही रक्त में मिलाया गया।
 
इस वृत्ताकार धुरी पर मैं परिधि पथ चुनता हूँ 
तो लौटकर अपने पास ही आ जाता हूँ
जीवन को इस तरह क्यों रचा गया है
कि जब तक मैं तुम्हारी त्रिज्या नाप पाता हूँ
तब तक बहुत सा लोहा मेरी आँखों में धँस जाता है।
 
तुम्हे अपनी ओर खींचने के लिए
मुझे अभी और लोहा खाना होगा।
 
 
6. उस व्यक्ति को चुनना
____________________
 
तुम्हें कोई पूछता है क्या
कि तुम कब आओगी?
सिवा मेरे कोई और है क्या 
जो फ़िक्र करता है
कि तुम कब तक ठहरोगी?
 
अन्तरिक्ष की सैर का स्वप्न पालने वाले लोग 
बहुत अधिक हैं धरती पर
ऐसे स्वप्न से पहले अपने पैराशूट को भूल जाने वाले
और भी अधिक
हवा के इन्तजाम को याद रखने वाले तो नगण्य।
तुम्हे कोई बताता है क्या
तारों की भीड़ में चाँद क्या सोचता है?
मेरे सिवा कोई और है क्या
जो तुम्हारे लिए शून्यता के दौर में भी
गर्वीली कहकशां लिए फिरता है?
 
मैं तुम्हारे बारे में सोचते हुए अपनी नसों में
तुम्हारी साँसों का दबाव महसूस करता हूँ
और अपने अख़लाक को और मजबूत करने के
नये-नये तरीके खोजता हूँ।
तुम्हारे साथ जो समय फूल सा कोमल होता है
वह प्रतीक्षा में सूई बन जाता है
तुमको यह जानकर और भी हैरानी होगी 
कि इस सूई में सुराख़ नहीं होता
बस दोनों ओर नोंक होती है।
 
लौट आने के सम्बन्ध में तुम्हारे पास
कोई तसल्लीबख़्श जवाब नहीं होता 
और मेरे पास सवालों से घिरे होने के इतर
दिनभर कोई काम नहीं होता
ये दुनिया बहुत ही ज़्यादा सलीकेदार है
और हज़ारों-लाखों सलाहों से भरी हुई है
कदम दर कदम तुम्हें विकल्प मिलेंगे
मगर फिर भी तुम उस व्यक्ति को चुनना 
जो आत्मा की तमाम चुभनों को भूलकर
तुम्हारे दु:ख-दंश शहद की तरह पीता हो।
 
 
7. पुल
_________
 
वह एक अभियन्ता था
पुल बनाने में उसको महारत हासिल थी
भवनों की डिज़ायन तो वह ऐसी तैयार करता था
कि आदमी भौंचक्का हुआ फिरे
पर उसने नहीं बनाया एक भी पुल 
जिससे कोई प्रेमी पहुँच सके अपनी प्रेमिका तक
एक किनारे का आदमी दूसरे किनारे के आदमी से जुड़ सके
वह एक चिकित्सक भी होता 
तो ज़्यादा से ज्यादा कर सकता था अंग प्रत्यारोपण
वह मुर्दे में जान डालने के काबिल भी हो सकता था
मगर पुल बनाने की कुव्वत वह शायद ही जुटा पाता
 
जब अकेलापन मेरी नसों में दौड़ने लगा
मैंने कविताओं को तूल दिया
जब प्यार मेरी आत्मा को झिंझोड़ने लगा 
मैंने कागज़ को फूल दिया
जिन लोगों ने मेरी तारीफ़ों के पुल बाँधे
वो मेरी कविताओं के ठेकेदार निकले
जिन लोगों ने मेरी आलोचनाओं के शब्द गढ़े
एक दिन वो अपने ही कहे से मुकर चले
कुछ लोग ख़ामोश थे, जो काम कर रहे थे
शायद वही पुल बनाने का काम कर रहे थे
जिसकी डिज़ायन मैंने अपनी कविताओं में तैयार की थी।
  
8. पारितोषिक
_______________
 
जागृति नींद का पारितोषिक है
नींद दिनभर के श्रम का
श्रम हमारे स्वप्नों का
और स्वप्न इस जीवन का।
 
जीवन भी एक पारितोषिक है
जिसे कमाना पड़ता है
ठीक उसी तरह
जैसे एक मजदूर दिहाड़ी कमाता है
एक किसान फ़सल उगाता है।
 
एक मजदूर इमारतें बनाता नहीं है,
अपनी पीठ पर ढ़ोता है
इसलिए वह जीवन के वज़न को रोता है
और रोज़ मरे हुए जिस्म में 
नयी आत्मा पिरोता है।
 
एक किसान केवल बीज रोपता नहीं है
धरती के सीने में अपना पसीना बोता है
इसलिए वह बेहतर जानता है
जीवन का यथार्थ कड़वा है
और दु:ख जन्म का जुड़वां है।
 
फ़सल बारिश का पारितोषिक है
बारिश मजदूर के पसीने का
पसीना हमारी दौड़-धूप का
और धूप आत्मा की गरमाहट का।
 
गरमाहट भी एक पारितोषिक है
जिसे बचाना पड़ता है
ठीक उसी तरह 
जैसे नामवर ख़ुद को अपयश से बचाता है
प्रेमी स्वयं को अप-स्पर्श से बचाता है।
 
स्पर्श संवेदना का पारितोषिक है
संवेदना निर्मल चेतना का
चेतना हमारे स्वप्नों का
और स्वप्न इस जीवन का।
 
 
9. दुर्लभ प्रजाति
_________________
 
पीपल पर बैठा हुआ कबूतर घबराहट में उड़ जाता है
मुझे देखते ही गायें असमंजस में उठकर चल देतीं हैं
मैंने जितनी भटकती आत्माओं के बारे में सुना
वो सब की सब दु:खों से भरी 
और अधूरी इच्छाओं के चक्रों में फँसी हुई थीं।
जितने चेहरे मैंने पहचाने 
उनके पास अपनी ही समझ थी
वो झुर्रियों को शत्रु समझ 
अपने ही चेहरे को बार -बार रगड़ रहे थे।
 
जो दो पैरों और दो हाथों वाली सममित आकृतियाँ थीं
वो रोटी के साथ नाख़ून तक चबाने में माहिर थीं
जब मेरे शव को अन्त्येष्टि की जायेगी
तब वो चबाये हुए नाखून रह जायेंगे
शेष जिस्म थोड़ा-थोड़ा कर 
बाकी लोगों के जिस्मों में छुप जायेगा
जो हुक्के और चिलम का इस्तेमाल कर 
मुझे धुएँ की तरह उड़ाने की कोशिश करेंगे
वो ऐसा इसलिए करेंगे क्यों कि मैं सच जानता हूँ
और मंटो की तर्ज़ पर कहूँ 
तो ” हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं।”
 
यदि मेरी लाश के साथ वो 
यह सुलूक ना करके, दफ़नाने का विचार करें
तब भी नमक के साथ गड़ा हुआ 
मेरा बदन सिकुड़कर उसी पीपल का बीज बन जायेगा
जिस पर बैठा हुआ कबूतर उड़ जाता है
तब कबूतर को मैं दोस्त बनकर बताऊंगा 
कि वह मेरी पनाह में सुरक्षित है
और अपने हाथों को शाखाओं में तब्दील कर 
मैं गायों को जाने से रोक लूंगा।
 
जाने क्यों?
सम्पर्क में आयी सारी प्रजातियाँ मनुष्यों जैसी थीं
पर समाजशास्त्र पढ़ते हुए मैंने जाना 
कि मनुष्य एक दुर्लभ प्रजाति है
जिसका जिक्र विज्ञान ने कहीं नहीं किया था
जीव विज्ञान के जनक अरस्तू को 
फिर से जन्म लेना चाहिए कि नहीं?
 
 
10. प्रतीक्षा और प्रतिफल
______________________
 
हम हँसने के तमाम मौक़ों सेे चूकते गये
ये जानते हुए कि हँसना झुर्रियों से लड़ना है।
या तो हम प्रशिक्षित हँसोड़ हैं या असहाय योद्धा
हम तय नहीं कर पा रहे, हमें क्या-क्या बनना है।
हमें शृंगार की कविताएँ याद रहतीं हैं
मगर हम मुस्कुराने के नुस्खे भूल जाते हैं
वीरता पर समीक्षाएँ लिखने के चक्कर में
दुर्बल पल में खुद ही रस्सी पर झूल जाते हैं।
 
वो बारिश ग़ायब है जिसमें मन हँसता था
वो ख्वाहिश ग़ायब है जिससे तन हँसता था
वो हँसी जो आईने में झाँक लेती थी, क़त्ल हो गयी
वो हँसी जो दु:ख ढाँप लेती थी, क़त्ल हो गयी
क़ातिल की तलाश जारी है, कवि मन पुलिसिया हो गया है
जिसकी हँसी गयी, उसका मन एक हँसिया हो गया है
हँसिया मन किसी और के हाथ लग गया है
जो फ़सल की जगह हमारे होंठों पर लग गया है
गर्दनें अना से अकड़ गयीं हैं, वो सकते में पड़ गयीं हैं
उधर कोई नहीं जाता, जिधर भावनाओं की जड़ गयीं हैं।
 
कहते हैं हँसने से उम्र दराज़ होती है
जबकि हमारी दवाएँ दराज़ होतीं हैं
पेड़ समुद्र के नमक में डूब जाना चाहते हैं
आदमी उनके नमक का कर्ज़ भूल गया है
नाव बंधी रह गयीं हैं नदियों के तटों पर
मल्लाह जबसे अपनी हँसी भूल गया है
सूरज रो रहा है, लोग अब तक सो रहे हैं
उसे लगता है, वो सपने में चरस बो रहे हैं
पृथ्वी का नृत्य अब दु:खों की लरज़िश है
पत्तों का उड़ना बस एक वर्जिश है
कौनसा भ्रम छल गया है दुनिया को 
कि हँसता बच्चा भी खल गया है दुनिया को।
 
तुम्हारी हँसी किसकी प्रतीक्षा कर रही है
क्या वह किसी अच्छे का कर रही है?
नहीं, प्रतीक्षा प्रेम की विडम्बना होती है, प्रतिफल नहीं
बिना हँसे यह जीवन किञ्चित भी सफल नहीं
आओ! बैठो पुल पर, पानी को बहते हुए देखो
इस जल में मेरी परछाई को हँसते हुए देखो
तुम हँसने की कला में निपुण हो जाओ
मेरी आत्मा में कोई सद्गुण हो जाओ।
 
 
अपनी रचनाएं literaturepoint@gmail.com पर भेजें

You may also like...

Leave a Reply