कविता के नए प्रदेश की नए महत्व की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

हिंदी कविता की नई ज़मीन जिस तेज़ी से बड़ी हो रही है, विकसित हो रही है, यह देखकर कविता के इतिहासकारों को प्रसन्नता ज़रूर होनी चाहिए, कविता के उन इतिहासकारों को, जो कविता-इतिहास-लेखन के समय ईमानदार बने रहते हैं। मेरे विचार से कविता की ऐतिहासिकता इसी बात में है कि इसकी नई ज़मीन जितनी उर्वर होगी, हरी-भरी होगी, जितनी कविता के मेहनतकश कवियों की विशिष्टता से पटी होगी, हिंदी कविता का फ़लक भी उतना ही विस्तृत होगा। हिंदी कविता के विकास की यह लयात्मकता कविता के क्षेत्र में दिखाई देती है, सुंदर भी है, अद्भुत भी है और क्रान्तिकारी भी है। मेरे विचार से युवा कवि राहुल राजेश का हिंदी कविता में प्रवेश इसी उद्भव का प्रमाण है। हिंदी कविता में राहुल राजेश का यह उद्भव नया नहीं है, तब भी राहुल राजेश जिस गुपचुप तरीक़े से, अपना स्थान हिंदी कविता में बनाते चले जा रहे हैं। राहुल राजेश के इस गुपचुप तरीक़े का महत्व अतिमहत्वपूर्ण है, विशिष्ट भी और प्रभावकारी भी। राहुल राजेश का पहला कविता-संग्रह ‘सिर्फ़ घास नहीं’ सन् 2013 में साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से छपकर आया था। अब राहुल राजेश की कविताओं का नया संग्रह ‘क्या हुआ जो’ ज्योतिपर्व प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद से छपकर इसी वर्ष यानी सन् 2016 में आया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘क्या हुआ जो’ की कविताओं में राहुल राजेश की कविता-चेतना अपने उद्देश्य को पाती दिखाई देती है। राहुल राजेश अपनी कविताओं के माध्यम से कविता के जिस नए प्रदेश के जिस नए घर में अपने पाठकों को लिए चलना चाहते हैं, नए प्रदेश के नए घर की यह यात्रा पहले के नए प्रदेश के नए घर से अधिक महत्व की है। कविता के इस नए प्रदेश में नया-नवेला होने की यह अवस्था, यह भाव अपनी नई महत्ता, नई गुरुता लिए इस कारण भी है कि राहुल राजेश दुमका, झारखंड के छोटे-से गाँव अगोइयाबाँध से निकलकर पहले पढ़ने के लिए और जीवन-संघर्ष के लिए पटना, बिहार आते हैं। फिर जीवन-संघर्ष को बड़ा आयाम देने के लिए अहमदाबाद, गुजरात और अब कोलकाता, बंगाल।

राहुल राजेश हिंदी कविता के उन युवा कवियों में हैं, जिनकी कविताएँ कविता की नई पृथ्वी को सही अर्थ दे रही हैं। राहुल राजेश दरअसल जीवन के उस उद्देश्य के कवि हैं, जो अपनी कविताओं में हमारे जीवन के आत्मीय पक्ष को गहरी आत्मीयता से प्रकट करते हैं। इनका शब्द-संकेत मनुष्य के उन गुणों की तरफ़ अधिक रहता है, जिसमें मनुष्य का जीवन किसी पार्टी के मुखपत्र की घोषणा की तरह न होकर संवेदनात्मक है। राहुल राजेश संग्रह की पहली ही कविता में यह स्पष्ट भी कर देते हैं : किसी वाद से / बँधा नहीं हूँ / कवि हूँ / अँधा नहीं हूँ ( ‘कवि हूँ’, पृ. 23 )। यही सच है, किसी रूढ़, किसी प्रथा से बँधा-बँधाया कवि भाग ही कितनी दूर सकता है। रूढ़ परंपराएँ वैसे भी मनुष्य-समाज को कमज़ोर ही करती रही हैं। इसीलिए सारे ‘वाद’ ढहते दिखाई देते हैं। ऐसे में जो कवि सजग है, वह उन संगठनों के वाद में कैसे बँधेगा, जो संगठनें मनुष्य को मनुष्य से विलग करती आई हैं। यह विलगाव एक घातक अनुबंध जो रहा है :

 

पहाड़-सा समय

पहाड़-सा बोझ

पहाड़-सी ज़िंदगी…

यदि सबकुछ

पहाड़-सा हमारे लिए

तो आइए

पहाड़ से पूछें–

 

कैसा तुम्हारा समय

कैसा तुम्हारा बोझ

कैसी तुम्हारी ज़िंदगी ( ‘पहाड़’, पृ. 31 )।

यह सुखद संयोग है कि राहुल राजेश इस संदिग्ध समय में असंदिग्ध रहकर स्वयं को कवितारत रखे हुए हैं। इनकी कविता-खोज की दिशा उन विविधताओं को लेकर है, जिसमें मनुष्य अपने अलावे दूसरों की चिंता भी कर रहा होता है। यानी राहुल राजेश सिर्फ़ अपने बारे में सोचकर चुप बैठ जानेवाले कवियों में नहीं हैं जैसा कि आज के बहुत सारे कवि अपने भीतर रह गई संकीर्णता के कारण करते हैं। राहुल राजेश का मार्ग सीधे-सीधे उन आदमियों तक पहुँचता है, जो अपनी पहाड़ जैसी ज़िंदगी ढोता फिरता है और उन आदमियों को ख़ुद के लिए सही निष्कर्ष चाहिए होता है। राहुल राजेश ऐसे पहाड़ ढोऊ आदमियों की फ़िक्र भी करते हैं और इनके विरुद्ध चल रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ भी लगाते हैं :

नगरपालिका की टोंटी पर

नागरिकों का जमघट है

बूँद-बूँद के लिए हाहाकार है

और लंबी कतार है

ख़ाली डब्बा, ख़ाली बाल्टी

ख़ाली कनस्तर, ख़ाली घट है

और बस जीने का हठ है

 

यह भीड़ है, वोट बैंक है

शहर की तलछट है

रोज़-रोज़ का यह दृश्य

देश का चित्रपट है ( ‘चित्रपट’, पृ.92 )।

 

वैसे संपूर्णता में कहें, तो राहुल राजेश प्रणय-निवेदन के अनोखे कवि कहे जा सकते हैं। ऐसा इसलिए है कि प्रणय-संबंध मनुष्य-जीवन का अभिन्न अंग है। फिर कोई जीवन-संघर्ष भी कर रहा हो और प्रेम भी, तो यह स्थिति कवि के सोच को व्यापक ही बनाती है। फिर यह राहुल राजेश की अपनी अदा है कि ये अपना जीवन-संघर्ष ऐसे ही जीतते हैं। इससे इनकी प्रगतिशीलता भंग नहीं होती। इसलिए कि मनुष्य का सामाजिक जीवन बिना किसी लक्ष्य के पूर्ण भी नहीं होता। ‘क्या हुआ जो’ कविता-संग्रह की कविताएँ मनुष्य के सामाजिक जीवन की कविताएँ कही जा सकती हैं। हालाँकि कभी-कभी कवि को यह भी लगता है कि प्रेम-व्रेम फ़ालतू चीज़ है, जैसे निराशा के समय आदमी को लगता है कि यह जीवन-बीवन बेकार है। तब भी आदमी इस जीवन को जीता है और अपने जीवन-लक्ष्य तक पहुँचता है। वैसे ही इस कवि को प्रेम के बारे में कभी-कभी निगेटिव एहसास होता है, परंतु कवि प्रेम करना छोड़ नहीं देता, इसलिए कि कवि को यह पता है कि प्रेम कसकर पकड़े रहने की चीज़ है। इस तरह राहुल राजेश जो भी अर्थ और आशय ढूँढ़ना चाहते हैं, ढूँढ़ ही लेते हैं। ऐसा इसलिए है कि इन्हें अपने लक्ष्य का पता है। ऐसा इसलिए भी है कि इनके भीतर प्रकृति पूरी तरह पैबस्त है। ‘क्या हुआ जो’ में राहुल राजेश की लगभग नब्बे कविताएँ संगृहीत की गई हैं। ये कविताएँ ऐसी हैं, जो अपने पाठ के वक़्त बिजली की तरह चमकती हैं। यहाँ मेरा आशय यह है कि ये कविताएँ आदमी के घटाटोप अँधेरे जीवन में रौशनी की तरह हैं। यानी एक आदमी जब अपनी चारों तरफ़ फैले अँधेरे से घिर जाता है, तो ये कविताएँ आदमी के इर्द-गिर्द फैले अँधेरे को मार भगाने की ताक़त रखती हैं। यही राहुल राजेश की कामयाबी का द्योतक है :

तुम्हारी गोद में सिर धरता हूँ

तो हो जाता हूँ आकाश

 

होंठों पर होंठ

तो समुद्र

 

आँखों में आँख

तो बादल

 

बाहों में बाँह

तो इंद्रधनुष

 

जिस क्षण मैं बदलता हूँ

इन सब चीज़ों में

 

तुम किन-किन चीज़ों में

बदलती हो

 

जिस क्षण तुम बदलती हो

उन-उन चीज़ों में

किसमें बदलते हैं मेरे दुःख

 

किसमें बदलती है पृथ्वी

किस्में बदलता है समय

 

कौन-से शिल्प में उतरती है दुनिया

कौन-सी दुनिया में देह ( ‘जिस क्षण मुक्त होता हूँ स्वयं से’, पृ. 82 )।

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‘क्या हुआ जो’ ( कविता-संग्रह ) / कवि : राहुल राजेश / प्रकाशक : ज्योतिपर्व प्रकाशन, 99, ज्ञान खंड-3, इंदिरापुरम्, ग़ाज़ियाबाद-201 012 / मोबाइल संपर्क : 09429608129 / मूल्य : ₹199

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800 015 / मोबाइल : 09835417537

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