निराला की कविता का विस्तार -‘‘राजा की दुनिया’’

अमीरचंद वैश्य

बुद्धिलाल पाल पुलिस विभाग में उच्चपद पर सेवारत है। ऐसी अवस्था में व्यवस्था की आलोचना करते समय उन्हें सघन अन्तद्र्वन्द्व का तनाव झेलना पड़ता होगा। फिर भी उन्होंने साहस किया है। ‘राजा की दुनिया’ से साक्षात्कार करवाके वर्तमान क्रूर व्यवस्था की सटीक आलोचना की है। मुक्तिबोध के बहुप्रयुक्त पद ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ के आधार पर कह सकते हैं, कि कवि ने ‘राजा की दुनिया’ में मुक्तिबोधी पदों को दृष्टिगत रखते हुए कविता रची हैं। कवि के पास इतिहास-दृष्टि के साथ-साथ वर्तमान जन-जीवन के पर्यवेक्षण से पर्याप्त अनुभव है, कल्पना के रंग मे रंगकर प्रभावपूर्ण अनुभूति का रूप प्रदान किया है।

महाकवि निराला ने अपनी सहज अनुभूति के आधार पर राजतंत्र के प्रतीक राजा की आलोचना करते हुए लिखा हैं- ‘‘राजे ने अपनी रखवाली की/ किला बनाकर रहा/बड़ी-बड़ी फौजें रखीं। /चापलूस कितने सामन्त आए/मतलब की लकड़ी पकड़े हुए/कितने बा्रम्हण आए/पोथियों में जनता को बांधे हुए/कवियों ने उस की बहादुरी के गीत गाए/लेखकों ने लेख लिखे/ऐतिहासिकों ने इतिहासों के पन्ने भरे/नाट्यकारों ने कितने नाटक रचे/रंगमंच पर खेले/जनता पर जादू चला राजे के समाज का।’’ (नि.र.द्वि.खण्ड,177-178)

‘जनता पर जादू चला राजे के समाज का’। वाक्य विचारणीय है। यह कैसे सम्भव हुआ। इतिहास साम्य की अवस्था से विषमता की ओर अग्रसर हुआ। निजी सम्पत्ति के कारण।

पहले गण समाज की व्यवस्था थी। गण का कोई महावीर गण का स्वामी हुआ करता था। अपना वर्चस्व कायम करने के लिए गण या कबीले आपस में झगड़ते-लड़ते थे। विजेता होकर अपना वर्चस्व बढ़ाया करते थे। प्राचीन भारत में भरत गण प्रमुख था। शायद, इसी के नाम पर अपने देश का नाम ‘भारत’ प्रसिद्व हुआ। कालान्तर में छोटे राज्य संगठित हुए। फिर बड़े-बड़े साम्राज्य

राजा चक्रवर्ती सम्राट भी  होने लगा। उसकी इच्छा सर्वोपरि मानी जाने लगी। उसके वर्चस्व की रक्षा को पुरोहित वर्ग सक्रिय हुआ। उसने ऐसा विधि-विधान प्रस्तुत किया कि जन-गण उसका अनुसरण करने लगे। कुछ राजा लोकरंजक अवश्य हुए, लेकिन अधिकतर लोकपीड़क के रूप में ही सामने आए। प्रमाण है शूद्रक का नाटक मृच्छकटिकम् अर्थात मिट्टी की गाड़ी। इस नाटक में दिखाया गया है कि स्वेच्छाचारी एवं अत्याचारी राजा को नाटक के वीर पात्र गोपाल आर्यक द्वारा पदच्युत कर दिया जाता है। अब यह सिद्व हो गया है कि इतिहास राजाओं की गाथा न होकर वर्ग-संघर्ष की गाथा है।

अब समाज में राजतंत्र का नहीं लोकतंत्र का वर्चस्व है। लेकिन यह सच्चा लोकतंत्र न होकर क्रूर पूंजीतंत्र है। और साम्राज्यवाद उसका सर्वाधिक भयंकर और शोषक रूप है। आजकल जो व्यक्ति धनबल और बाहुबल से चुनाव जीत जाता है, वह स्वयं को किसी राजा से कम नहीं समझता है। वास्तविकता तो यह है कि प्राचीन युग के राजाओं की तुलना में आजकल के पूँजीपति,नेता,अधिकारी और उनके छुटभैये इतने अधिक सुख भोग रहें है जो पुराने राजाओं ने सपने में भी नही देखे थे। आजकल प्रत्येक मंत्री पुष्पक विमान में आराम से विराजमान होकर हवाई यात्रा करता है। धरती पर तो वह पांव रखता ही नहीं है।

ऐसे वर्तमान राजा अपने राज-पाट की रक्षा के लिए निरन्तर चैकन्ने रहते है। जनता के प्रति न्याय न करके उससे यमिचार करते हैं। उस पर बलात्कार करते है। अदृष्य रहकर प्रत्येक समर्थक के घट में निवास करते हैं।

आजकल का राजा जनता को घड़ियाली आंसू बहाकर उसे अपने पक्ष में करता है। भय दिखाकर उसका दोहन करता है। फिर भी राजा के आमोद में कोई कमी नहीं आई है। क्योकि ‘‘ राजा का रूप/दिव्य शक्तियों का पुंज होता है/और जनता/राजा के इसी रूप पर/मुग्ध रहती है।’’ (राजा की दुनिया,पृ.13)

वर्तमान समय में सज्जन अथवा भला मानुष चुनाव में प्रत्याषी होने की बात सपने में भी नहीं सोचता है, लेकिन ‘वर्चस्ववादी संस्कृति’ का पोषक अपने आतंक से चुनाव अनायास जीत जाता है,

क्योकि ‘‘उसने कितनों के सर कलम करवाए/ उसने कितनों से (पर) बलात्कार किया/उसने कितनों के शील भंग किए/उसने अमानवीयता की कितनी सीमाएं तोड़ी/ यह सब जरूरी नहीं है/ जरूरी है उसने वर्चस्वादी संस्कृति /कितना पोषण किया।’’ (पृ.15)

ऐसा वर्चस्ववादी राजा अदृश्य रहकर अपने विरोधियों का संहार करता है, लेकिन दृश्य रूप में ‘‘ईश्वर की तरह/ पीताम्बर धारण किए होता है।’’ (पृ16) ऐसे बाहुबली एवं धनबली राजा अपनी कूटनीति से जनता को छलता है। और यह ‘छलना’ राजा का यश फैलाना होती है’’ (पृ.17)

ऐसा स्वार्थी और महत्त्वकांक्षी राजा अपने वर्चस्व की रक्षा के लिए जाति और धर्म की सब बंदिशें तोड़ देता है, क्योंकि ‘‘ये सब जरूरतें /जनता के लिए हैं/जनता ही भोगे।’’ (पृ.18)

राजा ऐश्वर्यवान् होता है। उसका आदेश ईश्वर का आदेश होता है। यह मान्यता यद्यपि इतिहास ने खंडित कर दी है, तथापि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रायः देखा गया है कि मंत्री या मुख्यमंत्री तुगलकी फरमान जारी करता रहता है। जन-विरोध से विवश होकर वह अपना फरमान वापस भी ले लेता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता आक्रोशित न हो, इसके लिए राजा ‘जनता के उबलते खून को’ ठंडा करने का प्रयास करता रहता है। आरक्षण देकर। लैपटाप देकर। बेरोजगारी-भत्ता देकर।

इतिहास के प्रत्येक युग में राजा का वर्चस्व रहा है। राजसत्ता के साथ-साथ धर्मसत्ता भी रही है। दोनों का गठबंधन लोक कल्याणकारी नहीं है। ऐसा गठबंधन अन्य धर्मो के अनुयायियों का अस्तित्व मिटाता है। इतिहास साक्षी है। हिन्दू राजाओं ने बौद्वों का इतना विरोध किया कि बौद्व धर्म भारत में विलुप्त हो गया।

वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारो की अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार संविधान ने प्रदान किया है। फिर भी व्यवस्था का आतंक ऐसा है कि लोग सच कहने – बोलने से बचते हैं। ‘धीरे बोलो’ कविता में यही आशय व्यक्त किया गया हैं ‘‘ कुछ कहने के पहले /आवाज साथ नहीं देती / कहीं सुन न ले राजा। ‘‘यहां‘राजा’ प्रत्येक सत्ताधारी अधिकारी का प्रतीक है। राजा के पास जब शक्ति है, तब ‘‘उसका दर्प भी झलकता है।’’ (पृ.23)

आजकल के राजा की भाषा मातृ भाषा न होकर अंग्रेजी है और खेल भी अॅग्रजी। व्यंग्य के लहजे में कहा गया है- ‘‘राजा कोई/गिल्ली डंडा तो खेलेगा नहीं। हिन्दी से तो उसका काम चलेगा नहीं/राजा है/ तो कुछ विशिष्ट तो होगा ही/ खेलेगा तो शतरंज, गोल्फ/ काम चलेगा तो/सिर्फ अॅग्रजी में ही राजा का भला/ दरिद्रता से क्या वास्ता। ’’(पृ.24)। इस कविता में कलात्मक ढंग से राजा और रंक का अन्तर व्यक्त किया गया है।

‘किसने कहा’ कविता में ठीक प्रश्न उठाए गए है- आदमी/ब्राहमण होता है, शूद्र होता है/ आदमी गोरा होता है काला होता है/ आदमी/मालिक होता है, सेवक होता है/किसने कहा ? /ईश्वर ने/ईश्वर ने नहीं/तो फिर किसने कहा ?/राजा ने/या उसकी दुनिया के लोगों ने / किसने कहा….?’’(पृ.43) मिथ्या प्रचार इतना किया गया कि सत्य समझा जाने लगा। आभिजात्य और सम्पन्नता-विपन्नता पूर्व जन्म के कर्मो का परिणाम है। इस अवधारणा ने, पुनर्जन्म के विचार ने लोगों को अपनी निर्धनता से समझौता कर लिया और उसमें ही संतुष्टि का अनुभव किया। शक्ति-सम्पन्न राजा अर्थात् आजकल के मंत्री-गण स्वयं को ‘विधाता’ समझकर के आम लोगों की किस्मत लिखा करते है। आखिरकार क्या कारण आजादी के  69 साल बीतने के बाद भी भारत के अधिकतर जन-गण गरीबी रेखा के नीचे  जी रहें है।

वर्ग-विभक्त समाज यह विधान अलिखित और अघोषित है कि समाज में गरीब ही अपराध करते है। अतः ‘‘अमीर के अपराध/गरीब पर थोप दिए जाएं/ गरीब को कोई फर्क नही पड़ता/अमीर को पड़ता है।’’ (पृ.61) लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘राजा’ सरे राह नंगा किया जा रहा है। उसके काले कारनामे उजागर किए जा रहे है। आपकी कविताओं में इसकी ओर संकेत नही किया गया है।

खैर। इस लाभ-लोभ की व्यवस्था में ऐसी प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ है कि हर कोई आगे की पंक्ति में उपस्थित रहना पड़ता है। आदमी आदमी से छल कर रहा है। ठीक लिखा है- ‘‘आदमी आदमी को/ सीढ़ी बनाता है/चढ़ता है/ दूसरों को धक्का देकर’’ (पृ.67)

‘राजा की दुनिया’ की कविताओं मे पूर्वावर सम्बन्ध का निर्वाह लक्षित नहीं होता है। इस कारण इसे लम्बी प्रबंधात्मक रचना कहना उचित नहीं है। फिर भी कवि ने निराला की कविता ‘राजे ने अपनी रखवाली की’ के संवेदनात्मक विचार को अपने ढंग से विस्तृत रूप प्रदान किया है। इसे आप की उपलब्धि कहा जा सकता है ‘सवाल शीर्षक कविता महत्वपूर्ण है। इसका जवाब गम्भीर शोध के बाद दिया जा सकता है। ‘राजा की दुनिया’ कवि की निर्भीकता का प्रमाण है।

 

 

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