राज्यवर्द्धन की नौ कविताएं

कागज की कश्ती

कागज की नाव
बचपन की
अब भी तैर रही है
पानी में

फर्क सिर्फ
इतना है कि उसमें मैं नहीं
मेरे बच्चे सवार हैं

इसलिए मैं
किसी से
कागज की कश्ती
लौटाने की जिद नहीं करता

प्रतीक्षा

किसी सुबह
आप उठते हैं
और बारिश की गंध
महसूस करते हैं

वृक्ष के पत्ते/बहुत दिनों के बाद
खिलखिलाते हुए लगते हैं
नन्हीं दूब भी
हमारे कदमों का
हँसकर स्वागत करती है

आकाश में
बादल का एक टुकड़ा
बचपन का कोई गीत
सुना जाता है
और
आनंद विभोर हम
आगत की करते हैं
प्रतीक्षा !

रोटी और कविता(पाब्लो नेरूदा को संबोधित)
तुमने कहा था-
कविता कॊअच्छी तरह सिंकी
गॊल गॊल रॊटी की तरह हॊनी चाहिए
रॊटी
मैंने भी बनाई
पहली कच्ची रह गई
दूसरी जल गई
तीसरी ठीक ठीक बन गई
जीवन में
आँच के महत्व कॊ समझा
जुड़ गया
सृजन की उस महान परंपरा से
जब इंसान ने
पहली बार रॊटी बनानी सीखी थी
और तुमसे भी

सीख-1
तुमने कहा था –
चाहे जितना उड़ॊ
पैर जमीं पर रहे
धरती पर पैर रखकर ही
चाँद कॊ छूना चाहा
अंगूर मी़ठे मिले !

सीख-2
गांठ बांध ली
पिता की सीख-
इच्छा से पहले
यॊग्यता प्राप्त कर लॊ
हमेशा
यॊग्यता से थॊड़ा कम की ही
इच्छा की
जीवन खुशहाल जिया !

आम आदमी

दो रुपये की चाय
और एक रुपये का बिस्कुट
फुटपाथ की किसी दुकान से खाकर
सहज हो जाता हूं
…. और जीवन की डोर
आम आदमी से जुड़ जाती है

निष्कासन

निष्कासित हो गये
न जाने कब
जीवन से
धीरे-धीरे
मासूम कविताओं के भावुक अक्षर
संवाद करते कहानियों के पात्र
निबंधों के उत्तेजक विचार
द्वंद्व पैदा करते थे

शुरू हो जाता
मंथन
जान जाता था फर्क
अमृत व विष का ।

जिन्दगी का लेटर बॉक्स

इंतजार कर रहा हूँ
वर्षों से ………….
दोस्तों के खतों का
नाते-रिश्तेदारों के हाल-समाचार का
महसूसना चाहता हूँ फिर से
सजीव संबंधों की गर्माहट को
लेटर बॉक्स में मिलता है सिर्फ
बिजली का बिल
कॉरपोरेशन का टैक्स
बैंक का स्टेटमेंट
या फिर
निर्जीव पर्चे विज्ञापन के!

किताब

तुम्हारे पाठ से
खुल जाती थी
अन्तर्द्वन्द्व की गाँठ

जग जाती थी
प्रज्ञा
सरल हो जाती थी
पगडंडियाँ
ऊबड़-खाबड़ जीवन की

जान जाता था
कहाँ रखना है
पाँव संभालकर

अब तो छूट गई है
वर्षों से
संगति तुम्हारी

अब तो सिर्फ रोज
देखता हूं
सुनता हूं
सनसनी
चाटता हूं
अफीम-सा
उत्तेजना का फेन

बाजार के साथ
कदमताल करते-करते
हो गया हूं
निर्द्वन्द्व

जानता हूं
जगमग इस दुनिया में
सबकुछ जो चमकदार है
वह सोना तो नहीं ।

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