राजेंद्र राजन की 5 कविताएं

राजेंद्र राजन हिन्दी के उन कवियों में शामिल हैं, जो प्रचार के शोरगुल से दूर रहकर चुपचाप बेहतर लिख रहे हैं। गूंगे वक्त को आवाज़ दे रहे हैं। उनकी कविताएं सच से मुंह नहीं मोड़ती बल्कि उससे टकराती है और समाज को सचेतन करती है। यहां प्रस्तुत उनकी कविताओं में आज के हालात का कितना प्रभावी चित्रण है, आप खुद पढ़कर महसूस कीजिए।
1.  शत्रुः एक
 
शत्रु से निजात दिलाने की उम्मीद ने
उसे यहां तक पहुंचाया था
जब वह कुर्सी पर बैठा
उसने मन-ही-मन
शत्रु का शुक्रिया अदा किया
 
जब-जब उसे लगता
कि लोग पहले की तरह एकजुट नहीं हैं
लोगों का उत्साह ढीला पड़ गया है
उसकी जय-जयकार कम हो गई है
वह फिर से शत्रु की याद दिलाने लगता
 
लोग फिर से जोश में आ जाते
उसकी जय-जयकार के नारे लगाते
और शत्रु को कदम-कदम पर हवा में ललकारते
 
एक दिन पता चला कि शत्रु नहीं रहा
लोग खुशी में सड़कों पर निकल आए
झूम-झूमकर नाचे गाए
घर आए जमकर खाए-पीए
चैन से सोए
 
उसे लेकिन फिक्र के मारे
रात-भर नींद नहीं आई
दूसरे दिन उसे अपनी कुर्सी हिलती मालूम हुई
और वह नए शत्रु की खोज में निकल पड़ा
 
उसकी शत्रु-खोजी दृष्टि को
दूर नहीं जाना पड़ा
नया शत्रु पास में ही मिल गया
फिर वह नए शत्रु का डर दिखाने में
जोर-शोर से जुट गया
 
अब उसकी कुर्सी हिल नहीं रही थी
उसने मन-ही-मन
नए शत्रु का शुक्रिया अदा किया।
 
 
2.  शत्रुः दो
 
शत्रु जमीन पर पैर पटकता तो वह भी पटकता
शत्रु की भौंहें चढ़ जातीं तो उसकी भी चढ़ जातीं
शत्रु हवा में मुट्ठियां लहराकर बोलता
तो उसी तरह से वह भी बोलता
शत्रु उंगली उठाता तो वह भी उठाता
शत्रु आंख दिखाता तो वह भी दिखाता
शत्रु हंसी उड़ाने के लिए हंसता
तो उसी अंदाज में वह भी हंसता
शत्रु झंडा उठा लेता और जोर-जोर से
झंडे का गाना गाने लगता
तो वह भी ऊंची आवाज में
ध्वज-वंदना शुरू कर देता
शत्रु हथेलियां फैलाए आसमान की तरफ सिर उठाए
शत्रु की बरबादी के लिए प्रार्थना करता
तो ऐसी ही प्रार्थना वह भी करता
 
शत्रु से मुकाबला इसी तरह चलता रहा
एक दिन उसने आईने में देखा और दंग रह गया
वह शत्रु की तरह दिख रहा था।
 
3.  हाथ
 
हमसे कहा जाता रहा
चलो उनके हाथ मजबूत करने हैं
इसी में सबका भला है।
 
हम उनके हाथ मजबूत करने में लग गए
धीरे-धीरे उनके हाथ मजबूत होते गए
और मजबूत होते गए
और अब इतने मजबूत हो गए हैं
कि वह जो चाहे सो कर सकते हैं
जबकि हम कुछ नहीं कर सकते
हमारे हाथ इतने कमजोर हो गए हैं।
 
क्या हमारे ही हाथों की ताकत
उनके हाथों में जा रही थी
जब हम उनके हाथ मजबूत कर रहे थे?
 
आज सबकुछ उनके हाथ में है
हमारे हाथ में कुछ भी नहीं
 
यही नहीं
आज जब हम
अपने हाथों की खोई हुई ताकत
वापस पाना चाहते हैं  
तो हम पर वे हाथ उठाते हैं
जो हाथ जोड़कर आए थे यह कहने
कि चलो उनके हाथ मजबूत करने हैं।
 
4.  गुस्सा पर्व
 
जिसे हर गलत चीज पर गुस्सा आता था
हां क्या नाम था उसका, अलबर्ट पिंटो!
आजकल वह नजर क्यों नहीं आता?
कहां चला गया वह?
 
अब कहीं एक सही किस्म का गुस्सा क्यों नहीं दिखता
जबकि तरह-तरह का गुस्सा
सब तरफ से घेरे है तुम्हें।
 
तमाम लोग तमाम वक्त गुस्से में हैं
जैसे कि कोई गुस्सा पर्व चल रहा हो।
 
हवाएं गुस्से से भरी हैं
दिशाएं गुस्से में डूबी हैं
रास्ते सड़कें गलियां चौराहे
गाड़ियां और गंतव्य
लक्ष्य और कर्तव्य
सब गुस्से में हैं
 
छवियां और प्रतिमाएं
पूजा-प्रार्थनाएं
भावनाएं और आस्थाएं
अस्मिताएं और परिभाषाएं
बोलियां और भाषाएं
शैलियां और विधाएं
रंग और रेखाएं
रीतियां और नीतियां
सफलताएं और विफलताएं
दुष्टताएं और सरलताएं
सब गुस्से से आप्लावित हैं।
 
तर्क और वितर्क
विचार और आचार
खबरें और चर्चाएं
बहसें और विमर्श
दर्शन और दृष्टियां
धर्म और संस्कृतियां
सब गुस्से की अभिव्यक्तियां हैं।
 
जो गुस्से में है
उसका सही होना स्वयंसिद्ध है
जो गुस्से में नहीं है
वह बुजदिल है या संदिग्ध है
जो तनिक ठहरकर सोचने लगता है
उसका भरोसा नहीं किया जा सकता।
 
गुस्सा इस वक्त
सशक्तीकरण का सबसे सुलभ
और सबसे आसान उपाय है।
 
गुस्से से भरा हुआ समाज
फिलहाल अपने को ताकतवर महसूस कर रहा है
अपनी संचित निधियों
और साधी हुई शक्तियों को खोते हुए भी।
 
5.  जो मारा जाएगा
 
जब उसका नाम पुकारा गया
वह पुलक से भर गया
सोचा नहीं था कि वह इतनी आसानी से
चुन लिया जाएगा
 
जब उसे वर्दी मिली
वह फूला नहीं समाया
लगा वह एक सपने को
पहन रहा है
 
परेड करते हुए
रोज उसे लगता कि अब जिंदगी
ताल मिलाकर चलने लगी है
 
जल्दी ही उसने
अच्छी तरह हथियार चलाना भी सीख लिया
और निशाना साधने में माहिर हो गया
 
एक दिन लाम पर जाने का हुक्म आया
वह रोमांच से भर गया
कि दुश्मन से भिड़ने का समय आ गया है
 
लेकिन वहां पहुंचकर उसने देखा
ये तो बिलकुल अपने लोग हैं
जैसे अपने गांव के लोग
रोजमर्रा के सुख-दुख की छाप लिये
उन चेहरों की ओर देखते हुए उसे लगा
जैसे वह अपने गांव में खड़ा है
 
रात-भर उसे नींद नहीं आई
रात-भर यही खयाल उसे परेशान किए रहा
कि कल जो मारा जाएगा अपना भाई होगा
कल जो बिलख रही होगी अपनी मां होगी।
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