राजेंद्र राजन की सात कविताएं

1. श्रेय
पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा
तो इसलिए टूटा
कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे।
तेरहवां प्रहार करने वाले को मिला
पत्थर तोड़ने का सारा श्रेय।
कौन जानता है
बाकी बारह प्रहार किसने किए थे।
2.   हत्यारों का गिरोह
हत्यारों के गिरोह का एक सदस्य
हत्या करता है
दूसरा उसे दुर्भाग्यपूर्ण बताता है
तीसरा मारे गए आदमी के दोष गिनाता है
चौथा हत्या का औचित्य ठहराता है
पांचवां समर्थन में सिर हिलाता है।
और अंत में सब मिलकर
बैठक करते हैं
अगली हत्या की योजना के संबंध में।
3. बस यही एक अच्छी बात है
मेरे मन में
नफरत और गुस्से की आग
कुंठाओं के किस्से
और ईर्ष्या का नंगा नाच है
मेरे मन में
अंधी महत्त्वाकांक्षाएं
और दुष्ट कल्पनाएं हैं
मेरे मन में
बहुत-से पाप
और भयानक वासना है।
ईश्वर की कृपा से
बस यही एक अच्छी बात है
कि यह सब मेरी सामर्थ्य से परे है।
4. पश्चाताप
महान होने के लिए
जितनी ज्यादा सीढ़ियां मैंने चढ़ीं
उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं
ज्ञानी होने के लिए
जितनी ज्यादा पोथियां मैंने पढ़ीं
उतनी ही ज्यादा मूर्खताएं मैंने कीं
बहादुर होने के लिए
जितनी ज्यादा लड़ाइयां मैंने लड़ीं
उतनी ही ज्यादा कायरताएं मैंने कीं।
ओह, यह मैंने क्या किया
मुझे तो सीधे रास्ते जाना था।
5. पेड़
छुटपन में ऐसा होता था अकसर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही
तुमने खा लिया है उसका बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर।
मेरे भीतर
पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं,
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी
न फल
न वसंत की आहट।
लेकिन आज
जब मैंने एक जवान पेड़ को कटते देखा
तो मैंने अपने भीतर सुनी
एक हरी भरी चीख।
एक डरी डरी चीख
मेरे भीतर से निकली।
मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं,
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं,
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी
न फल
न वसंत की आहट।
6. एक यात्रा में
हड़बड़-हड़बड़
हड़बड़-हड़बड़ भागती है गाड़ी।
गाड़ी में बैठा
मैं खिड़की से देखता हूं:
तेजी से पीछे छूट रहा है
खिड़की का बाहर
चक्कर काटती क्यारियां
बेहद बेतरतीब कतारों में झुके हुए पेड़
खेतों में झुके हुए खेतिहर
गड्डमड्ड
ओझल होते परिंदे
दूर कहीं
मद्धिम
जलती लालटेन
तेजी से पीछे छूट रहा है
खिड़की का बाहर
मैं क्षण-भर डिब्बे में देखता हूं
सामानों का तकिया लगाए
नींद के नीचे लुढ़क गए हैं
मेरे सहयात्री
सब कुछ इस तरह गुजर रहा है
जैसे समय की गाड़ी का
अंधेरा पीछा कर रहा है
जितनी तेजी से पीछे छूटती है
उससे बदतर तेजी से
गुम हो रही हैं चीजें।
मैं टकटकी लगाए देखता हूं
कि जिस तरह पीछे छूटती हैं चीजें
उसी तरह पीछे क्यों नहीं छूटता अंधेरा?
अंधेरा शुरू होने के पहले की चीजें
बहुत पीछे छूट चुकी हैं।
लेकिन अंधेरे में भी तो चीजें होंगी
और वे पीछे छूट रही होंगी।
लेकिन अंधेरा पीछे छूट नहीं रहा है।
क्या मैं खतरे की जंजीर खींच दूं?
लेकिन कोई नहीं चाहता
कि नींद में खलल पड़े।
7. मनुष्यता के मोर्चे पर
मैं जितने लोगों को जानता हूं
उनमें से बहुत कम लोगों से होती है मिलने की इच्छा
बहुत कम लोगों से होता है बतियाने का मन
बहुत कम लोगों के लिए उठता है आदर-भाव
बहुत कम लोग हैं ऐसे
जिनसे कतराकर निकल जाने की इच्छा नहीं होती
काम-धंधे खाने-पीने बीवी-बच्चों के सिवा
बाकी चीजों के लिए बंद हैं लोगों के दरवाजे
बहुत कम लोगों के पास है थोड़ा-सा समय
तुम्हारे साथ होने के लिए
शायद ही कोई तैयार होता है
तुम्हारे साथ कुछ खोने के लिए।
चाहे जितना बढ़ जाय तुम्हारे परिचय का संसार
तुम पाओगे बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
स्वाधीन है जिनकी बुद्धि
जहर नहीं भरा किसी किस्म का जिनके दिमाग में
किसी चकाचौंध से अंधी नहीं हुई जिनकी दृष्टि
जो शामिल नहीं हुए किसी भागमभाग में
बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
जो खोजते रहते हैं जीवन का सत्त्व
विफलताएं कम नहीं कर पातीं जिनका महत्त्व
जो जानना चाहते हैं हर बात का मर्म
जो कहीं भी हों चुपचाप निभाते हैं अपना धर्म
इने-गिने लोग हैं ऐसे
जैसे एक छोटा-सा टापू है
जनसंख्या के इस गरजते महासागर में।
और इन बहुत थोड़े-से लोगों के बारे में भी
मिलती हैं शर्मनाक खबरें जो तोड़ती हैं तुम्हें भीतर से
कोई कहता है वह जिंदगी में उठने के लिए गिर रहा है
कोई कहता है वह मुख्यधारा से कट गया है
और फिर चला जाता है बहकती भीड़ की मझधार में
कोई कहता है वह और सामाजिक होना चाहता है
और दूसरे दिन वह सबसे ज्यादा बाजारू हो जाता है
कोई कहता है बड़ी मुश्किल है सरल होने में।
इस तरह इस दुनिया के सबसे विरल लोग
इस दुनिया को बनाने में
कम करते जाते हैं अपना योग
और भी दुर्लभ हो जाते हैं
दुनिया के दुर्लभ लोग।
और कभी कभी
खुद के भी कांपने लगते हैं पैर
मनुष्यता के मोर्चे पर अकेले होते हुए।
सबसे पीड़ाजनक यही है
इन विरल लोगों का और विरल होते जाना।
एक छोटा-सा टापू है मेरा सुख
जो घिर रहा है हर ओर
उफनती हुई बाढ़ से
जिस समय कांप रही है पृथ्वी
मनुष्यों की संख्या के भार से
गायब हो रहे हैं
मनुष्यता के मोर्चे पर लड़ते हुए लोग।
—–
कविताएं पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में प्रकाशित। पहला काव्य संग्रह’बामियान में बुद्ध’शीघ्र प्रकाश्य। लंबे समय तक सामयिक वार्ता की संपादकीय जिम्मेदारी से जुड़े रहे। संप्रति जनसत्ता में वरिष्ठ संपादक।

You may also like...

Leave a Reply