राजेश ‘ललित’ शर्मा की तीन कविताएं

मौन
1.
मौन मौन,
अब तो बोलो।
कुछ हल्के रह गये
शब्द,
थोड़ा वज़न डालो
इनमें,
ज़रा अब तोलो।
नहीं ,वही कुछ भाव भरो;
अब बोलो,
मौन मौन—–!
2.
मौन क्यूँ है?
क्यूँ  तू
अब भी चुप है!
कोहरा है,धुंध है,
अंधकार घना घुप है।
बैठा है ,सहता है
सदियों से;
बहुत हुआ अब,
चिल्लाओ
कि ब्रह्मांड भी
थर्रा जाये;
आयें रश्मियाँ
चीर कर,
सब अंधकार प्रकाशित
कर जाओ
मौन ,मौन ;चिल्लाओ
उठो देव
उठो देव
बहुत हुआ शयन्
पूरा हुआ
चातुर्मास
दीपावली भी चली गई
आती प्रति वर्ष अमावस,
दूर करो ये तमस
असंख्य प्रज्ज्वलित
हुए दीपक,
हो गई अब तो;
देव दीपावली भी,
अब तो करो प्रकाश।
आई आ कर
चली गई एकादशी
देव उठनी
बहुत हुआ उपवास।
त्यागो अब तो
शेष शय्या
उठाओ गदा
सज गया तांडव
का आँगन ।
अंतिम है तुमसे आस।।
अंतिम अब तुमसे आस
———-
राजेश ‘ललित’ शर्मा
बी-९/ए;डीडीए फ्लैटस;

निकट होली चाइल्ड स्कूल;
टैगोर गार्डन विस्तार
नई दिल्ली -११००२७

You may also like...

4 Responses

  1. Asking questions are actually nice thing if
    you are not understanding anything completely, but this paragraph
    offers pleasant understanding even.

  2. vinod says:

    ललित शर्मा की कविता मौन ने प्रभावितकिया है शब्दविन्यास बहुत उम्दा है

  3. vinod says:

    कविता ठूठ बेहतेरकविता है

  4. deepesh sharma says:

    बेमिसाल कवि हैं राजेश ललित शर्मा।मौन मौन आधुनिक काल की उत्कृष्ट कविता मानता हूँ ———–दीपेश

Leave a Reply