राजकिशोर राजन की चार कविताएं

शहीद मीनार के नीचे

हुआ हूँ शहरी आया था गाँव से
बतियाया हूँ, बहुत कवि, लेखक, चित्रकार से
रहा हूँ, सभ्य लोगों के समाज में
घूमा हूँ वेश्याओं के साथ भी
अब जा कर खड़ा हूँ शहीद मीनार पर
और आँय-बाँय-साँय चिल्ला रहा हूँ लगातार
कि गलत समय में, गलत जगह में पैदा हो गया हूँ मैं

उस विचित्र आदमी के प्रलाप पर मजमा लगा था
जो कूदते, बैठते, नाचते, गाते
एक से बढ़कर एक सूक्ति वाक्य बोल रहा था
शहीद मीनार के नीचे

जानकार लोगों का कहना था
कि वह कभी उभरता हुआ कवि था शहर का
दिन भर लिखता-पढ़ता, गुनगुनाता, कविताएं, गीत
ट्यूशन पढ़ाते गुजारता था शाम
और हर रात किसी गुरूद्वारे, किसी मंदिर-मस्जिद में
घूमता रहता पेट में डालने के लिए कुछ अन्न

झोला भर कागज ले विचरता रहता
शहर के अलग-अलग इलाकों में
तरह-तरह के लोगों से मिल उन्हें समझाता रहता
अपने समय की बदरंग हकीकत

सन्न रह जाता हूँ, बैठ जाता जमीन पर
कि कहीं गश खाकर गिर न पडूँ
माथे के ऊपर चक्कर लगाने लगते
विक्टोरिया मेमोरियल, चटर्जी इंटरनेशनल, टाटा सेन्टर
की बड़ी-बड़ी इमारतें
वह दोस्त था मेरा, जिसने बताया था मुझे
कविता और महानगर कोलकाता के बारे में
उसी ने कोलकाता के बड़ाबाजार से शुरू कर
अनगिन बाजारों में घुमाया था
और फुटपाथ पर बैठा कर दिखाया था कि देखो
यहाँ लोग नहीं, सिर्फ चलते हैं पैर
देखो, ठीक से देखो, पैरों में नही होती आँखें
आँखें दिखती हैं सिर्फ बाजार में

बत्तियों के चकाचैंध से उसकी जाती रही थी आँखें
शोर से बहरे हो गए थे कान
स्ुाख गई थी देह, भूख से
और आज उसके सामने खड़ा था मैं

और उस दिन से मैं भी, मैं नहीं था ।

मुस्कान चिकन काॅर्नर

गली के मोड़ पर
जब भी देखता
मुस्कान चिकन कार्नर
छीन जाती मुस्कान

यहाँ मुर्गे-मुर्गियों के गले रेते जाते
तड़फडा़ते-फड़फड़ाते, रक्त से सने
उनके पंख उखाड़े जाते
छील-छाल, बोटी-बोटी कर
वे तौल दिए जाते

जैसे-जैसे फैल रही है शब्दों की दुनिया
जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, देश-दुनिया में
साक्षर, बुद्धिमान, विद्वान
वैसे-वैसे शब्दों और उसके अर्थ के साथ
बढ़ता जा रहा अनर्थ

अपार्टमेंट के गेट पर
लिखा रहता ‘तपोवन’
करोड़पति के पुत्र का नाम रहता ‘ऋषि’
मूर्ख अपना नाम लिखता ‘विवेक’
और शातिर, ठग मिलता ‘शंकर कुमार’

सब-कुछ इतना गड्ड मड्ड
कि जिस दिन मुस्कान चिकन काॅर्नर में
खूब बिकता चिकन
उसका मालिक किसनवा लौटता घर
हनुमान मंदिर का दर्शन कर ।

दोष

तुमने कहा !
बताओ अपना नाम ?
मैंने कहा, कुछ भी कह लो

तुमने पूछा !
हो कहाँ के तुम ?
मैंने शहर की भीड़ भरी सड़क किनारे
चुटकी से धूल उड़ाते कहा
जहाँ तक जान लो तुम

तुमने पूछा !
करते क्या हो ?
मैं सुनाने लगा मीरा, सूर, कबीर को
बताने लगा
इस बार ठीक है धान और गन्ने की फसल
मेरे गाँव में
हुलस रहे हैं लोग
खेत-खलिहान में

तुम चौंक पड़े!
एक आदमी और उसकी दुनिया की
इतनी आसान परिभाषा
तुमने अब तक नहीं सुनी थी
और तुम बुरा मान गये

इसमें मेरा क्या दोष है!

गौरैया, बैल, गेंदा और पीपल के नाम

चुनमुन चिरैया, गौरैया आज भोरे-भोरे
चीं-चीं……… चूँ……………चूँ करती
उड़ती, फुदकती, खोजती फिर रही पेट के लिए दाना
पंक्षियों में निरीह, सीधी, सरल
सदा अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत
बेचारी गौरैया को, कौन दे खुशखबरी
कि बहुरे हैं दिन तुम्हारे
सरकार की दृष्टि, आखिर तुम पर भी गयी
और तुम्हें घोषित किया गया राजकीय पक्षी
अब तुम नहीं हो लुप्तप्राय, कातर गौरैया
जाओ कौओं, गिद्धों, बिल्लियों सभी में कर दो ऐलान
कि तुम्हारे साथ खड़ी है सरकार

बैल तो बैल ही ठहरा
उसे समझााना तो और मुश्किल
हल-बैलगाड़ी खींचने
ऊपर से सोटा खाने, पूँछ तुड़वाने से फुर्सत नहीं
यही गनीमत कि गाड़ी खींचते
करता है मूत्र विसर्जन
गाड़ीवान, गाड़ी रोक, लेता है जम्हाई
उसे, बस इतने भर से मतलब
कि जब मुँह में जाब, नाक में नाथ
और गले में पगहा नहीं होता
तो कैसा रामराज्य होता ?
वह इतने भर से खुश कि नाद में हो सानी-पानी
तो वह नाक-मुँह डुबाकर खाए
फिर खूँटा में बँधा पगुराए
और  कोई राजा, हमें का हानि!

और फिर गेंदा फूल
जिसे है समाजवादी बनने की चाह
गाँव-देहात के खंडहरनुमा घरों से ले नए बने स्कूलों तक
चहकती, खिलखिलाती
जिससे बाकी फूल सिकोड़ते नाक-भौं
बेहाया के जंगल से अधिक नहीं मानते
उसे भला कौन समझाए !
आज से तुम हो राजकीय पुष्प
यानी सरकारी गुलाब हो
खेलो-खाओ, हँसो-हँसाओ
औरों को देखो, धूल-धूसरित
और सुख पाओ

प्रायः गाँव के सिवान पर
मृतात्माओं के लिए घट लटकाने वाले
स्वयं में लीन बस हवा में डोलनवाले
पीपल को कोई कैसे स्मरण दिलाए
कि सैकड़ों वर्ष पहले
तुम्हारी छाँव में सिद्धार्थ गौतम को मिली थी संबोधि
तब से आज तक जटा-जूट बढ़ाये
घर से बाहर ही रहे तुम
जाओ अब अपनी जटा-जूट कटवाओ
कर स्नानादि, साफ-सुथरा, चिक्कन हो जाओ

अपने देश में देर भले हो, अँधेर नहीं होता
इसीलिए जीवित है और रहेगा
यहाँ का लोकतंत्र
रहेगी जनता की सरकार
भूखे-नंगों, कमजोरों और भूले-बिसरों को
मिलता रहेगा, राजकीय होने का अधिकार
तुम्हें भी घोषित किया गया है राजकीय वृक्ष
आज से तुम भी अपने को याद करो
अपने देश की महानता पर नाज़ करो ।

नोटः- वर्ष 2013 में बिहार सरकार ने गौरैया को राजकीय पक्षी, गेंदा को राजकीय पुष्प, बैल को राजकीय पशु और पीपल को राजकीय वृक्ष घोषित किया ।


राजकिशोर राजन

देश की प्रतिष्ठित तमाम पत्रिकाओं में पिछले एक दशक से कविताएँ, समीक्षाएँ आदि प्रकाशित
बस क्षण भर के लिए (2007),  नूरानीबाग (2010) एवं ढील हेरती लड़की (2012)कुशीनारा से गुजरते — काव्य संग्रह  प्रकाशित, (स्वर-एकाद के अन्तर्गत 11 कवियों के साथ कविताएँ)-2013
पुरस्कार एवं सम्मान – आरसी प्रसाद सिंह राष्ट्रीय सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्मान, जनकवि रामदेव भावुक स्मृति सम्मान आदि
कई भारतीय भाषाओं में कविताओं का अनुवाद
आजीविका – पत्रकारिता से लेकर अध्यापन, ट्यूशन तक, फिलहाल राजभाषा विभाग, पूर्व-मध्य रेल, हाजीपुर में नौकरी

संपर्क — 59, एल.आई.सी.काॅलोनी, कंकड़बाग, पत्रकारनगर, पटना-20

You may also like...

2 Responses

  1. Appreciation to my father who shared with me about this weblog,
    this web site is genuinely remarkable.

  2. Sling TV says:

    This article is actually a fastidious one it assists new net visitors,
    who are wishing in favor of blogging.