राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

  1. छठ मइया तुम्हें सलामत रखें!

एक दीप

हर दीपावली में

तुम्हारे नाम का

आज भी जला आती हूँ –

छत पर

 

रास्ता दिखाने

तुम्हारे हृदय तरंगों को

पता नहीं कब आ जाये

भूले भटके

 

आज भी तो हिचकी आई थी

खाते खाते

कहा माँ ने

कि कोई याद कर रहा होगा शायद

 

जानती हूँ –

तुम्हें छोड़कर

इस धरा पर

कौन करेगा याद

 

हो सके तो आना

छठ पर्व में

सभी प्रवासी तो लौटते हैं –

अपने अपने घर

 

प्रतीक्षा करूंगी

गांगा के कष्टहरणी घाट पर

जहाँ पहली बार तुम्हें देखते हुए

दिया था अरघ सूर्य  को

शायद नहीं

दिया था अपने प्रेम को

और कबूला था – एक ‘सूप’ तुम्हारे नाम का

लेकिन सभी कबुलती

स्वीकार तो नहीं होती

…… शायद कुछ खोट रह गयी होगी

 

मेरे नसीब में तो  बदा था

प्रतीक्षा करना

राधा की तरह

 

जर जर हो रहा है तन

लेकिन मन तो

आज भी अटका पड़ा है

उसी घाट पर

जहाँ हुई थी तुमसे

पहली मुलाकात

 

यदि तुम नहीं आओगे

तो इस साल भी

तो दे दूंगी अरघ

तुम्हारे नाम का

और करुंगी दुआ कि

तुम जहाँ भी रहो

छठ मइया तुम्हें सलामत रखे !

 

2. मोनेर मानुष

ढालता रहा

जीवन भर

अपने आपको —

बनने को श्रवण कुमार

माँ बाप की नजरों में

 

भाई बहनों के लिए

दुलार करने वाले भाई के रूप में

तो शिक्षकों की नजर में

बनने को प्रिय छात्र

 

प्रेमिका के लिए

चाँद तारे तक तोड़ लाने वाला रोमांटिक प्रेमी

तो पत्नी के लिए

देखभाल प्यार करने वाला पति

 

बॉस की नजर में

आज्ञाकारी मातहत

तो मित्रों के लिए भरोसेमंद साथी

 

संतान की नजर में

सहृदय पिता

तो नाते रिश्तेदारों के लिए

एक भला आदमी

 

सिर्फ नहीं ढाल पाया तो

अपने आपको

अपने ही अनुरूप

मोनेर मानुष होते पारलम ना *

(मन के अनुरूप मनुष्य नहीं बन पाया)

 

* बंगाल के लालन फकीर की प्रसिद्ध पंक्ति जिन्होंने बाउल पंथ की शुरूआत की थी

 

3. समानता

जन्म लेने दिया

अपने अंदर

एक स्त्री को

और बन गया सखी

अपनी प्रिया का

 

करने लगी है

वह साझा –

हर्ष विषाद

उपलब्धियाँ कमजोरियाँ

यहाँ तक कि छोटी- छोटी बातें

रसोई से सेज तक की

 

अपने हाथों से बनाकर

सुबह की चाय

भर देता हूँ उसे और खुद भी

प्यार की असमाप्त ऊर्जा से

ओर जुट जाते हैं हम

सुबह – सुबह

घर के कामों में /जल्दी –जल्दी

वह चढ़ा देती है –

चूल्हे पर कड़ाही

मैं डाल देता हूँ

उसमें तेल

वह डाल देती है –

पांचफोरन और मेरी पसंद की सब्जियाँ

मैं ड़ाल देता हूँ –

थोड़ी – सी हल्दी

जीवन को रंगने के लिए

थोड़ा -सा नमक

जीवन में स्वाद घोलने के लिए

और सीझने देता हूँ

सब्जी को

प्यार की मद्धिम आंच पर

 

इसी तरह मिलजुल कर

बना लेते हैं हम

दाल,चावल,रोटियाँ

 

और निकल पड़ते हैं

अपने-अपने कामों पर

उसने भी तो जन्म लेने दिया है-

एक पुरुष अपने अंदर !

 

4. कालीदास मेघ से कह पाओगे………

तपती जेठ के बाद

आषाढ़ में

देह को जब छूती है

मानसूनी बयार

पहली बार

 

हर्षित हो जाता है —

दग्ध तन मन

 

धरती पर जब पड़ती है

बारिश की पहली बूंद

जुड़ा जाती है —

आत्मा

………लेकिन डरता है मन

सावन भादों की

मूसलाधार बारिश को सोचकर

 

जानता हूँ

बढ़ जाएगा कष्ट

बस्तियों में रहने वालों का

 

चरमरा जाएगी

एक बार फिर

महानगर की व्यवस्था

खुल जाएगी पोल

नगर निगम की

बस्तियों की संकरी गली में

बहने लगेगा

सड़कों व नालियों का पानी

जल मल मिलकर

हो जाएंगे एक

घरों में घुस आएगा

बरसाती गंदा पानी

आठ गुणा आठ के कमरे में

चौकी बन जाएगी

घर की सबसे ऊंची जगह

रख दिए जाएंगे जिस पर

सारे माल असबाब

 

शरण लेंगे बच्चे उसी पर

जमेंगी रसोई की व्यवस्था भी वहीं पर

 

और उलीचना पड़ेगा

बार-बार

घर में घुसा पानी

छोड़ देंगे उलीचना

थक हार

कुछ देर बाद

घर में घुसा पानी

 

बस्ती में हो जाएगी

अघोषित जलबंदी

खबरों की भूखी मीडिया को

शायद मिल जाए

एक दिन की खुराक

कोसेंगे जी भर प्रशासन को

करेंगे उजागर —

सरकार की नाकामियों को

 

बढ़ाने के लिए

अपनी टी.आर.पी.

पाने के लिए विज्ञापन

 

बारिश के पानी में

छपछपाते खेलते बच्चे

शायद पा जाएं

टेलीविजन की बाइट में जगह

 

देखकर खबरें

शायद आ जाएं

पेज थ्री की औरतें

बांटने को राहत सामग्री

 

लेकिन इससे होगा क्या ?

कठिनाइयों से फिर भी

नहीं मिल पाएगी निजात ।

इसलिए कालिदास

तुमसे एक विनती है —

बनकर दूत

हमारी ओर से

मेघ से कह पाओगे कि

जाकर बरसे

गांंवों के सूखे खेतों में

 

महानगर की बस्तियों में हम

चाहकर भी स्वागत नहीं कर सकते

हर्षित करने वाले मेघ का !

You may also like...

2 Responses

  1. Barun , ARUNACHAL says:

    Man ko chhuti hain kavitayen. Saral shabdon me atyant gambhir bhao.
    – Congrats

  2. Sushma sinha says:

    सभी कविताएँ बेहद खूबसूरत हैं !!
    बधाई !!!👌👌

Leave a Reply