राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

पक्ष

जो लेखक,कलाकार,वैज्ञानिक,अधिकारी उद्योगपति एवं
बुद्धिजीवी हिन्दू हैं
और हमारे पक्ष में नहीं हैं
वे कम्युनिस्ट हैं
या फिर दरबारी हैं कांग्रेस के

…और जो मुस्लिम हैं
हमारे पक्ष में नहीं हैं
वे पाकिस्तानी हैं

सिर्फ मेरी ही विचारधारा
देश की सभ्यता से जुड़ी है
पवित्र है
देश की संस्कृति का संवाहक है
पावन है
बाकी विचारधाराएं
देशद्रोही हैं
देश को बदनाम करने की
साजिश है
देश के विकास में बाधक है

हमें सहिष्णुता  का पाठ न पढ़ाएँ
आप हीं असहिष्णु हैं
जो हमारी विचारधारा से
इत्तेफाक नहीं रखते
हमारी तरह नहीं सोचते
हमारी तरह  नहीं बोलते
हमारी तरह नहीं पहनते –ओढ़ते

अभी भी समय है
चुन लो पक्ष
समर होने वाला है !

साढ़े पांच के लोकल में संसद के अधिनायक

तिल न धरने की जगह को
चरितार्थ करते हुए
ठुंसे हुए हैं- लोग
शाम की साढ़े पांच की लोकल में
महानगर से सटे हर स्टेशन पर
बढ़ती जाती है भीड़
कंपार्टमेंट में
उतरने वालों से ज्यादा है
चढ़ने वाले
समुद्र का ढेव (लहरें)
ज्यों उतावला हो
लौट चला नदियों में
फलियों की तरह
लटके हैं लोग
दरवाजे पर ट्रेन के
खचाखच भीड़ में
जयशंकर प्रसाद का छोटा जादूगर
आज भी दिखाना है –जादू
माँ के इलाज के लिए
छोटे भाई बहनों का पेट भरने के लिए
आलपीन , सूई, रूमाल
लच्छा , फुदना, जेबर, गहना
खाने-पीने की चीजों से लेकर
बच्चों के खिलाना
यहाँ तक कि
सपने तक को बेचते
हॉकरों का है अटूट सिलसिला
खरीदने वाले से ज्यादा हैं –
बेचने वाले
इतनी बड़ी पृथ्वी पर
इससे बेहतर और कोई ठौर नहीं
डिब्बे में व्याप्त है
डूयूडरेंट के बजाए
महकता पसीना

ट्रेन से उतरते समय
पुरूषरचित चक्रव्यूह से
निकलने के प्रयास में
धर्षित होती स्त्रियां
उत्तेजित नहीं होती
बल्कि नाकाम कोशिश करती हैं-
बनाने का सुरक्षा कवच
हथेलियों से स्तन के ऊपर
और निकल आती हैं
तोड़कर चक्रव्यूह
भारत के भाग्य विधाता
तुम क्यों भूल जाते हो
कि कुम्हार की चाक के
मिट्टी के लौंदे नहीं हैं
ये चेहराविहीन आकृतियां
वरन्
संसद के अधिनायक भी हैं !

साजिश

दिल्ली के लाल किले में
‘मुगलों के उत्थान-पतन की कहानी’ का
‘लाइट-साउंड’ कार्यक्रम देखते हुए
लगी थी प्यास
आज से पच्चीस साल पहले ।

पिया था- मिनरल वाटर
पहली बार
आठ रुपये खर्च कर
अकचकाया था-दाम सुनकर

हँसा था –
हाथ में बोतल लेकर
कि चोंचले हैं अमीरों के
हिन्दुस्तान में यह सब नहीं चलेगा ।

आज
मिनरल वाटर की बोतल लिये
करता हूँ सफर
अपरिहार्य रूप से
पता नहीं कहाँ व कब लगे प्यास ?

मिनरल वाटर की बोतल भी शायद
हँसती हो
अमीरों के चोंचलों में जो
शामिल हो गया हूँ !

सुना है –
हर हाथ में बोतल की घोषणा की
साजिश में
रख दी गयी हैं नदियाँ गिरवी
अब नहीं मिलता है –
खेतों को पानी
और न ही मिलता है –
हाथों को काम !

मन की आँखें

देखे हैं –
कई बार जो दृश्य
मन की आँखों से
वो वैसे नहीं होते
जो खुली आँखों से
आते हैं नजर

राजा,मंत्री और सिपाही के साथ
कटघरे में
मैँ भी पाता हूँ
अपने- आपको
चोर की तरह

काश!
हर वक्त देख पाता
अपने- आपको
मन की आँखों से

काश!
हर कोई देख पाता
अपने-आपको
मन की आँखों से

लोगों के चेहरे पर
तब नहीं होते नकाब
और ना होती दुनिया में
इतनी फरेब मक्कारी

पृथ्वी रहने के लिए
तब स्वर्ग से भी बेहतर जगह होती !

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1 Response

  1. Vibhuti says:

    ‘साढ़े पांच की लोकल…..’और’मन की आंखे’पसंद आई।साधुवाद।

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