राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

फूल

फूल अच्छे लगते हैं
लेकिन वे जो
निषेचित होकर
बनते हैं – फल
देते हैं –अन्न

सुरक्षित रहता है – बीज
भविष्य की यात्रा के लिए

कैसे कहूँ
उस फूल को सुंदर
जो बिना कुछ दिए
अभिशप्त होते हैं –
झड़ने को ।

पेड़
जब हम
अपनी हवस में
ऊँचा और ऊँचा उठने के लिए
हवा में घोल रहे होते हैं – जहर
तब वह दिन में
नीलकंठ की तरह
उसका विष चूस रहा होता है
ताकि हम बचे रह सके-
जहरीली हवाओं से
इतना ही नहीं / वह
सूरज के सहयोग से
पृथ्वी के सभी प्राणियों के लिए
उत्साह से बना रहा होता है-
भोजन

रात को वह
थक कर  चूर सो जाता  है –
मजूर किसान
किरानी चपरासी अध्यापक और
दुनिया में हर नेक काम करने वाले
भले मानुषों के साथ
गहरी नींद में
……तब सिर्फ
लुटेरे और षड़यंत्रकारी
पृथ्वी के विरुद्ध
साजिश कर रहे होते हैं –
पेड़ काटने की ।

मैं शायर बदनाम!

चाहता हूँ लिखना
एक ऐसी भाषा में कविता
जो जुड़ी हो-
जमीन से

जिससे आती हो खूशबू
पसीने की
चाहता हूँ कि
कविता खड़ी हो
उनलोगों के साथ
जिनके साथ सदियों से
कोई नहीं खड़ा है
जानता हूँ-
जादुई यथार्थ सा है
जिनका जीवन
उनको नहीं भायेगी
मेरी कविता

करेंगे खारिज़
कविता को
यह कह कर कि
जीवन और जगत के सौंदर्य को
तराशने की तमीज़ नहीं है
अफसोस नहीं कि
मैं हो जाऊँ
शायर बदनाम!

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1 Response

  1. Paritosh kumar piyush says:

    अर्थपूर्ण कविताएं…..
    बधाई।

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