राकेश कायस्थ का व्यंग्य ‘मत रोइए मी लॉर्ड…’

राकेश कायस्थ

मी लार्ड का सादर अभिवादन। आप इस देश के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश हैं और मैं इस देश का एक अदना सा नागरिक। मेरे बाप-दादा कहा करते थे—- समझदार वही है जो कोर्ट-कचहरी के चक्कर से दूर रहे। कानून के रखवाले बहुत रूलाते हैं। बचपन में जो बाप दादाओं के मुंह से सुना था, आगे चलकर अपनी आंखों से देखा। जी हां, मी लॉर्ड मैने देखे हैं, इंसाफ के लिए दर-दर भटकते लोग। मैने देखे हैं, मुर्गी चोरी और साइकिल चोरी के इल्जाम में विचाराधीन कैदी बनकर जेलों में सड़ते लोग। एक ऑर्डर की कॉपी हासिल करने के लिए हफ्तों जिला अदालत के चक्कर काटते और न्यायमूर्ति की नाक के नीचे पेशकार साहब की मुट्ठी गर्म करते लोग भी मैंने अपनी आंखों से देखे हैं। इसलिए मैं मानता था कि रोते सिर्फ वही लोग हैं, जिनका पाला कानून से पड़ता है। लेकिन प्रधानमंत्री और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच कार्यक्रम में जब आपकी यानी देश के मुख्य न्यायधीश की आवाज़ भर्राई तो मेरा भ्रम दूर हो गया। भावुक सिर्फ आप नहीं हुए बल्कि आपने मेरे जैसे करोड़ों देशवासियों को भी भावुक कर दिया। इसी भावुकता में यह सब लिख रहा हूं। आशा करता हूं कि आप इसे अवमानना नहीं मानेंगे और अज्ञानता में कही गई बातों को क्षमा कर देंगे, क्योंकि ना तीर से ना तलवार से बंदा डरता है तो सिर्फ मुकदमों की मार से। कानून की इज्ज़त इस देश में हर कोई करता है। खुलेआम सरकारी संपत्ति को आग लगाने वाले भी जब कोर्ट में पहुंचते हैं तो यही कहते हैं कि इस देश का कानून महान है,इसलिए मेरे जैसे निर्दोष को इंसाफ मिलेगा। मी लॉर्ड आप कानून के महज एक रखवाले भर नहीं है। आप इसके सबसे बड़े रक्षक हैं। यह देश संविधान के मुताबिक चल रहा है या नहीं, इसका अंतिम फैसला आपके दरबार में होता है। कानून की देवी की आंखों में भले ही पट्टी बंधी हो, लेकिन देश की अदालतें अपनी आंखें हमेशा खुली रखती हैं। इस बात का भरोसा हमारे भीतर आप जगाते हैं। लेकिन आपकी आंख भी नम हो गई!

अगर आप रो सकते हैं तो फिर देवता भी ज़रूर रोते होंगे। संहार के देवता शिव भी बीच-बीच में अपना सिर पकड़कर बैठ जाते होंगे—मैंने तो आदेश दे दिया. यमराज अपना काम ठीक से नहीं करता, इसीलिए मृत्युलोक की आबादी बढ़ती जा रही है। अपने संसार की हालत देखकर ब्रह्राजी भी तीसरी कसम के गाने की पैरोडी गुनगुनाते होंगे– क्या मेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई! ब्रह्राजी ने दुनिया तो बना दी लेकिन मृत्युलोक वालों के पास फुल ऑटोनॉमी है। हमारी दुनिया हमारे अपने कानून से चलती है। मी लॉर्ड आपको मेरी बातें हल्की लग सकती हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि आपने रुंधे गले से जो बात कही वे बहुत गंभीर थीं। प्रधानमंत्री की तरफ देखते हुए आपने कहा कि पेंडिंग पड़े मुकदमों के निपटारे में होनेवाली देरी के लिए सिर्फ अदालतों को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है? आपने पूछा कि आखिर इस बात की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि 3 करोड़ से ज्यादा पेंडिंग पड़े केस 18000 हज़ार जजों के भरोसे निपट जाएंगे? बहुत ही गंभीर सवाल पूछा आपने मी लॉर्ड।

अनुपातिक गड़बड़ियां कई तरह की समस्याओं को जन्म देती हैं। इस बात को एक उदाहरण से समझ सकते हैं। एक समय हमारे पास 33 करोड़ देवी-देवता थे और भारत की आबादी भी उतनी ही थी। यानी प्रति व्यक्ति एक देवता या देवी। प्रभु को पुकारो तो प्रभु फौरन चले आते थे। आबादी बढ़ी तो अनुपात बदल गया। एक भगवान आखिर कितने केस हैंडिल करें, इसलिए लोगों के कष्ट बढ़ते जा रहे हैं। यही समस्या आपकी ज्यूडिशियरी में भी है। अदालतों को छुट्टियों में भी काम करना पड़ता है लेकिन मुकदमे हैं कि बढ़ते चले जाते हैं। जनता न्याय ना मिल पाने की वजह से रो रही है और मी लॉर्ड आपकी आंखें इसलिए नम हैं कि आप चाहकर भी जनता को वक्त पर न्याय नहीं दिला पा रहे हैं। ज्यादा बुरी बात यह है कि सारा इल्जाम भी आपकी न्यायपालिका पर ही आ रहा है।

न्यायिक सुधारों की सिफारिशों पर तमाम सरकारें बरसों से कुंडली मारकर बैठी हैं। निचली अदालत और हाईकोर्ट ही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक में जजों के कई पद खाली हैं। ऐसे में आपकी पीड़ा समझी जा सकती है। प्रधानमंत्री जी ने भी आपका दर्द समझा और जल्द ही उचित कार्रवाई का भरोसा दिया। गनीमत है कि प्रधानमंत्री जी भी आपके साथ नहीं रोये। मोदी जी एक भावुक देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए अपनी जनता की तरह स्वयं भी बहुत भावुक हैं। दो साल में अनेक बार रो चुके हैं। दो-तीन बार तो मुझे भी याद है। पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर.. उसके बाद सिलिकॉन वैली में अपनी मां को याद करते हुए, फिर रोहित वेमुला का जिक्र आने पर।

रोना संवेदनशील होने की निशानी है। बड़े लोगों को रोता देखकर यकीन होता है कि उन्हें भी हमारी तरह दर्द होता है। इसलिए आपकी आंखों की नमी को मेरा नमन है। बस एक छोटी सी चिंता है। सरकारी आंसू हम अक्सर देखते हैं। रोने और रुलाने का खेल संसद और विधानसभाओं में भी अक्सर होता है। न्यायपालिका कोटा बाकी था वो आपने पूरा कर दिया। सारे बड़े लोग रो रहे हैं, फिर गरीबों के आंसू कौन पोछेगा। वैसे रुलाई का यह राष्ट्रीय प्रहसन देखकर अब रोने वाली जनता ने भी हंसना शुरू कर दिया है।

 

You may also like...

Leave a Reply