राकेश कुमार श्रीवास्तव की पांच कविताएं

मैं सार्वजनिक हो गया

बहुत दिन हुए
एक कविता नहीं लिखी
बहुत दिन हुए
एक कहानी नहीं पढ़ी
जब-जब प्रयास किया
कविता ने मुझे लिख दिया
और कहानी ने मुझे पढ़ लिया
अफसोस
मैं सार्वजनिक हो गया
सबके लिखने पढ़ने में

कसौटी

जमीन खा जाती है
जमीर को
और जमीर?
कभी कभार
जमीर भी
खा जाता है जमीन को
मगर विडंबना!
कि जमीन ही
अधिकतर हावी रहती है
जमीर पर
जमीर का जमीन पर
हावी होना तो
सिर्फ एक घटना होती है
जो सिर्फ और सिर्फ
मिशाल बनकर ही रह जाती है
जिसे लोग
चरित्र में न ढालकर
केवल बच्चों के पढ़ाने के काम में लाते हैं!
 अहंकार
परायों को ठुकराना आसान है..
क्योंकि उनसे हमारा
खून का रिश्ता नहीं है..
वहां हमारा अहंकार बड़ा होता है..
ठुकराये गये अपनों को अपनाना बड़ा ही कठिन..
चाहते हुए भी नहीं अपना पाना..
यहां भी एक ही वजह है..
हमारा अहंकार बड़ा होता है.
गलत होने का डर नहीं
हम सही थे तो भी गलत
और गलत तो गलत ही था
हमें सही किसने ठहराया
कि हम गलत होने से डरेंथोड़ी सी खुशियां
बटोरने की कोशिश की हमने
वरना दुनिया को क्या पड़ी है
राकेश जिये या मरे.
प्यार तो गूंगे भी करते हैं
बात से बात निकलती है
बातों से इत्तेफाक क्या
प्यार तो गूंगे भी करते हैं राकेश
वरना बातों में बात क्या

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