राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे

सब जब घर लौट जायेंगे
मैं कहाँ जाऊंगा
इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष!

मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं
और एक पुराने स्कूल की
जिसकी दीवार ढह गयी थी
मास्टर जी की पीठ पर
छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ लौटता था मैं
क्या अब भी वहाँ कोई मेरा इंतजार कर रहा है?

एक फूल जो ठीक मेरे स्कूल जाने वक्त खिलता थाएक लड़की जो रुक जाती थी उस क्षण
जब मैं पीछे छूट जाता था
एक गीत जो मेरी फरमाइश पर
किसी और के नाम बजता था
इस सृष्टि में बहुत सारे छोटे- छोटे उत्सवों ने
मेरे खुश होने का इंतजार किया
क्या अब भी किसी के आंसुओं में मेरा दुख झर रहा है?

माँ की हथेलियाँ जैसे मेरी पृथ्वी थीं
जिस पर तिनके जुटाकर मैंने आकाश रचा था
एक दिन जब सब लौट जायेंगे अपने नीड़ में
मैं इस अंधेरे में किधर जाउंगा!
पृथ्वी माँ है

मैं जिस तरह टूट रहा हूँ
वह मैं जानता हूँ या पृथ्वी जानती है
हर रोज जितना अंधेरे से बाहर निकलती है
पृथ्वी, उतना ही अंधेरे में रोज डूबती है वह!

वसंत जिसके चेहरे पर सजाता है मुस्कराहटें
उसके अंदर आग है
सिर्फ बादलों ने जाना है उसका दुख
जब भीगती है पृथ्वी!

मैं पृथ्वी के लिए उदास कविताएं नहीं लिखता
वह बरजती है मुझे
पृथ्वी माँ है
वह हर वक्त मेरे साथ होती है।
कहता हूँ

डरता हूँ फिर भी कहता हूँ!
नहीं कहता तो टूट जाता
अपने अंदर के कांच को बचाने के लिए कहता हूँ
नहीं कहता तो बह जाता
अपने अंदर के पानी को बचाने के लिए कहता हूँ!

मेरी आत्मा में आकाश की छाया है
आत्मा में आकाश समाने के लिए कहता हूँ
सहता रहता हूँ दिन- रात उदास इच्छाओं के दुख
एक दिन इच्छाओं से उन्मुक्त हो जाने को कहता हूँ!
लौट आता हूँ रोज

मेरे पास नहीं हैं उतनी कविताएँ
जितने धरती पर अनदेखे अनजाने फूल हैं
आकाश में न गिने गये तारे हैं
और हैं जीवन में अनगिन दुख!

लौट आता हूँ रोज मैं अपनी भाषा में
तलाशता हुए तुम्हें ऐ मेरी खोई हुई आत्मा
निहारता हूँ परिधान बदलते सच को
निरखता हूँ कैसा है उसका अनिर्वचनीय रूप!

उत्सव करते हैं सूखे फूल और जीर्ण पात
हर बार कहने से रह जाती है भीगे मन की बात
हमने हथेलियों पर बर्फ को पिघलते देखा है
फिर कौन सदियों की जमी बर्फ के पार से पुकारता है
कि मैं सुनता हूँ उसको
उस तक मेरी आवाज नहीं पहुंचती!

इन अनगिन अनजानी आकाशगंगाओं में
कोई सृष्टि हमारे स्पर्श की प्रतीक्षा में है
और हमारी इस दुनिया में कोई सच
अभिव्यक्त होने की बेचैनी से भरा है।

हर पल खिलता कोई फूल
हर दिन जनमता कोई बच्चा
यही कहता है
हर मौसम- बेमौसम में रंग की तरह खिलो
और भाषाहीन इस दुनिया में निश्शब्द न मिलो!

 

भय  वह है

 

भय वह है
जो लड़की अपने जन्म की तारीख में
दिन बताती है
और वर्ष छोड़ देती है।

भय वह है जो
अपने नाम के दूसरे शब्द
से पहले किसी झिझक की तरह आता है
और कभी उपनाम के भीतर छिपा रहता है।

भय वह है
जो लक्ष्य पर पहुंच कर दुविधा में रहता है
कि वह आने वालों के साथ खड़ा है
या जाने वालों के साथ!

भय वह है
कि जब सुंदर लगने लगता है
मनुष्य का डर
और विस्मय हाथ बांधे खड़ा रहता है।

भय वह है
जो मैं लिख देता हूँ कविता में सच
पर वह समझ नहीं आता है और
कहने पर अनकहा रह जाता है।

बड़ी बात, छोटी बात

उसने कहा हमेशा बड़ी बातें कहो
छोटी बातें लोग नकार देंगे
जैसे कहो आकाश से नदियों की होती है बारिश
कि यह जो तुम्हारी आँखों का अंधेरा है
दरअसल वह एक घना जंगल है
कि एक दिन हाथी चुरा ले जाते हैं फूलों की खुशबू
कि संसार की सबसे खूबसूरत लड़की
तुमसे प्यार करती है।

पर इतना बड़ा कुछ नहीं
मुझे कहनी थी कुछ छोटी बात
कि जैसे जब हिल रहे थे पहाड़
तो निष्कंप रही घास की एक पत्ती
कि सारी नदी बह गयी पर एक तिनका
अपनी जगह डोलता रहा
मेरे डूबने के इंतजार में
कि एक छोटा सा दुख लेकर
मैं तुम्हारे जीवन के सबसे छोटे क्षण की
प्रतीक्षा करता रहा
कि इच्छाओं से भरे इस संसार में
मुझे चूमनी थी
ठीक तुम्हारे आँखों के पास वाली वह जगह
जहाँ हर बार एक आँसू आकर
ठिठक जाया करता है।

माफ करना
मैं बड़ी बात कहने से हमेशा डरता रहा
इसलिए कह नहीं पाया कभी
मैं तुमसे प्यार करता हूँ!

(उसी कविता का एक असंलग्न हिस्सा है!)

पर कुछ छोटी बातें कह सकता हूँ तुमसे
जैसे कि मैंने एक कविता लिखी है तुम्हारे लिए!

 

मुझे ले चल पार

नाव देखते ही लगता है
जैसे हम डूब गए होते अगर यह नाव नहीं होती
डगमग डोलती है नाव
और संग डोलता है मन
स्मृतियों की एक नदी
में धप्प गिरता है माटी का एक चक्खान
धीरे- धीरे भीगता है सूखी आँखों का कोर!

नाव में शायद हमारे पूर्वजों की स्मृतियां हैं
जब किसी अंधेरी रात वे किनारों की तलाश में थे
और गरज रहा था घन घनघोर
और तभी कोई डर समा गया था
उनके गुणसूत्रों में
और जिसे लेकर पैदा हुई संततियां
जिसे लेकर पैदा हुए हम!
और अब भी नाव को तब देखिए
जब कोई नहीं देख रहा हो
तो ऐसा लगता है कोई बुला रहा है हमें
पूछ रहा है कानों में
जाना है उस पार?

वे सारे मांझी गीत
जिनमें प्रीतम की पुकार है-
जाना है उस पार!
हमें इतना विकल क्यों कर देते हैं
जैसे हाथ से छूट रहा हो प्रेम
कि लहरों के बीच कठिन है जीवन
कि जैसे उस पार कोई सदियों से इंतजार कर रहा है
और जल में डोल रही है
चंचल मन सी नाव!

पहली बार नाव बनाकर
मेरे ही किसी पूर्वज ने देखा होगा स्वप्न
इस अथाह अंधेरे और अतल जल के पार जाने का
और पहली बार उसने गाया होगा गीत
इस निर्जनता के विरुद्ध
किसी खोये प्यार को पा लेने का!
क्या वही पुकार गूंज रही है मेरे अंदर?
क्या वही मन मेरे अंदर कांप रहा है
मेरे थिर शरीर में?

हवा जो छू रही है मुझे
पहले भी इसने छूआ था किसी को
यहीं कहीं इस नीरव में
उसका डर, उसकी सिसकियां
उसका आर्तनाद
सब कुछ कोई भरता है मेरे कानों में!
इस विशाल विश्व के अंधेरे में
बस प्रेम के किसी हारे मन की पुकार गूंज रही है
जैसे डोलता है दीपक अकेला
नाव की छत पर टंगा
जैसे ब्रह्मांड के सूनेपन में
अकेली धरती घूम रही है।
जब सब चुप हैं
मुझको सुना रहा है कोई
अपने मन का छुपा हुआ डर
छूटती है बरसों की दबी रूलाई
जब पुकारता हूँ
मुझे ले चल पार!

मुझे ले चल पार!


नाम : राकेश रोहित

 

जन्म : 19 जून 1971 (जमालपुर).

संपूर्ण शिक्षा कटिहार (बिहार) में. शिक्षा : स्नातकोत्तर (भौतिकी).

कहानी, कविता एवं आलोचना में रूचि.

पहली कहानी “शहर में कैबरे” ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित.
“हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं” आलोचनात्मक लेख शिनाख्त पुस्तिका एक के रूप में प्रकाशित और चर्चित. राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग में विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन.

सक्रियता : हंस, कथादेश, समावर्तन, समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, नवनीत, गूँज, जतन, समकालीन परिभाषा, दिनमान टाइम्स, संडे आब्जर्वर, सारिका, संदर्श, संवदिया, मुहिम, कला, सेतु आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, आलोचनात्मक आलेख, पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक/सांस्कृतिक रपट आदि का प्रकाशन. अनुनाद, समालोचन, पहली बार,  असुविधा, स्पर्श, कविता – समय, उदाहरण आदि ब्लॉग पर कविताएँ प्रकाशित.

संप्रति :          सरकारी सेवा.

ईमेल –      rkshrohit@gmail.com

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