डॉ. राकेश जोशी की चार ग़ज़लें

1
आदमी के लिए ज़िंदगानी तो लिख
धूप कोई कभी आसमानी तो लिख

छुट्टियों में भला, जाएं बच्चे कहाँ
हर किसी के लिए एक नानी तो लिख

हो शहर में कोई एक ऐसी नदी
जिसमें सबको मिले, थोड़ा पानी तो लिख

आज फिर बैठकर कोई कविता सुना
और जनता हुई है सयानी तो लिख

ये ज़मीं, आसमां हैं सभी के लिए
चाहे झूठी सही, ये कहानी तो लिख

मेरे बचपन के सपने में तू एक दिन
एक राजा तो लिख, एक रानी तो लिख

जिसमें ज़ुल्मो-सितम ख़त्म हो जाएंगे
वो सुबह हमको लेकर है आनी तो लिख

गाँव, कस्बे, नगर, और सारे शहर
और सबकी है ये राजधानी तो लिख

हर किसी के लिए एक घर, एक दिन
भोर सबके लिए वो सुहानी तो लिख

2
तुम तहख़ाने से डरते हो
तभी तो आने से डरते हो

पत्थर से मिलते रहते हो
बुत बन जाने से डरते हो

तुम भी औरों के ही जैसे
धोखा खाने से डरते हो

गीत जो मैं लिखकर आया हूं
उसको गाने से डरते हो

सच्ची बातें वो कहता है
तुम दोहराने से डरते हो

लोग तो खोने से डरते हैं
तुम तो पाने से डरते हो

सुबह बहुत है दूर सभी से
उसको लाने से डरते हो

आँसू की लाचार नदी में
तुम बह जाने से डरते हो

कैसे बादल हो बोलो अब
अक्सर छाने से डरते हो

दुनिया की इन दीवारों से
सर टकराने से डरते हो

3
हर नदी के पास वाला घर तुम्हारा
आसमां में जो भी तारा हर तुम्हारा

बाढ़ आई तो हमारे घर बहे
बन गई बिजली तो जगमग घर तुम्हारा

तुम अभी भी आँकड़ों को गढ़ रहे हो
देश भूखा सो गया है पर तुम्हारा

फिर तुम्हें कोई मदारी क्यों कहेगा
छोड़कर जाएगा जब बन्दर तुम्हारा

ये ज़मीं इक दिन उसी के नाम पर थी
वो जिसे कहते हो तुम नौकर तुम्हारा

दूर उस फुटपाथ पर जो सो रहा है
उसके कदमों में झुकेगा सर तुम्हारा

4
गर ज़मीं पर आग के मंज़र नहीं होते
ये ज़मीं और आसमां सुंदर नहीं होते

जो वहां थे वो सभी अब तो शहर में आ गए
गाँव में अब आजकल बंदर नहीं होते

आसमां में ख़ूब हिम्मत से उड़ा करते हैं वो
जिन परिंदों के डरे-से पर नहीं होते

वो जो ख़ुद से भागते फिरते हैं अक्सर रात-दिन
वो भले इंसान भी अक्सर नहीं होते

आपसे मिलकर शिकायत आपकी करता
आपके हाथों में जो पत्थर  नहीं होते

जो भी होते हैं तज़ुर्बे तल्ख़ जीवन में हमें
वो किताबों को कभी पढ़कर नहीं होते

इन अमीरों के हैं बंगले, गाड़ियां, दफ़्तर
बस, ग़रीबों के कहीं दफ़्तर नहीं होते

परिचय:

डॉ. राकेश जोशी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड में अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इससे पूर्व वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के पद पर मुंबई में कार्यरत रहे. मुंबई में ही उन्होंने थोड़े समय के लिए आकाशवाणी विविध भारती में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर भी कार्य किया. उनकी कविताएँ अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं. उनकी एक काव्य-पुस्तिका “कुछ बातें कविताओं में”, एक ग़ज़ल संग्रह “पत्थरों के शहर में”, तथा हिंदी से अंग्रेजी में अनूदित एक पुस्तक “द क्राउड बेअर्स विटनेस” अब तक प्रकाशित हुई है.

फ़ोन: 9411154939
ईमेल: joshirpg@gmail.com

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