रामावतार सागर की दो ग़ज़लें

एक

सोच के साये टूटे होंगे
तब जाकर वो रूठे होंगे
पनघट पर देखे सपनों के
गागर घर पर फूटे होंगे
किससे जाकर कहता बीती
घर अपनो ने लूटे होंगे
नफरत की बेलों पर यारों
झगड़ों के ही बूटे  होंगे
अब जाकर सागर छलका है
बंध नदी के टूटे होंगें

दो

दूर तक तीरगी है गांवों में
रोशनी है,मगर छलावों में
अब कहां महफिलें जवां होगी
खाक फैली है सब अलावों में
जब भी देखे हरे हरे से लगे
कैसी खुशहाली है इन घावों में
देखकर भी यकीं नही होता
धूप सिमटी है आके छांवों में
जरूर करते है भरोसा सागर पर
सफर जारी है कागज़ की नावों में

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रामावतार सागर
सम्प्रति:-  व्याख्याता, हिंदी, राजकीय
महाविद्यालय, कोटा
प्रकाशन:-  मधुमती, सौगात,
प्रयाग(इलाहाबाद) ,
फेसबुक मित्रो का कविता
संग्रह भाग 2 में
कविताओं का प्रकाशन
पता:-   59, कमला उद्यान विस्तार,
कुन्हाड़ी कोटा ।

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