रमेश शर्मा की 5 कविताएं

रमेश शर्मा 

92,  श्रीकुंज बीज निगम के सामने ,

बोईर दादर रायगढ़,

छत्तीसगढ़ 496001

मोबाइल 9752685148

  1. छोटी छोटी लड़कियां 

    क्या करेंगी ये छोटी छोटी  लड़कियां
    खिलौनों से खेलेंगी
    पुचकारेंगी
    सुनाएंगी कहानियां
    अपनी तोतली भाषा में उन्हें!

फिर चुपचाप दुबक जाएंगी
खिलौनों की तरह घर के किसी कोने में
खिलौनों से खेलने वाली
ये छोटी छोटी  लड़कियां !

निकल आएंगी अचानक
गुड़िया और  चॉकलेट की मांग करते
फिर से अचानक
तत्काल चाहिए अपनी चीजें इन्हें
वरना उठा लेंगी घर सिर पर

थककर झाकेंगी अपनी जैसी किन्हीं  आँखों  में
तो भूल सबकुछ
खींचने लगेंगी आड़ी तिरछी रेखाएं
कागज के पन्नों  पर

कहेंगी दादा जी …….! देखो  ……घर !

और  देकर धोखा सबको
बेआवाज
बदल लेंगी
अपना घर एक दिन
ये छोटी छोटी  लड़कियां !

 

 2. पहाड़ 

किसी की आँखों में
मुसीबतों सा दीखता है पहाड़
और भीतर ही कहीं डुबोता है
यह दृश्य उसे
शायद पहाड़ का जन्म इसी तरह होता हो
और दुनिया लगती हो एक पहाड़ सी उसे

किसी की आँखों में
दीखता है पहाड़ का हरापन
और उसकी हरियाली ले जाती है उसे
एक खूबसूरत सपनों की दुनियाँ में
जहां एक रोमांटिक फिल्म के हीरो की तरह
वह चाहता है पहाड़ को
दुनियाँ की खूबसूरती से जोड़ना

किसी की आँखों में
पहाड़ पहाड़ नहीं
जैसे रत्नगर्भा  हो
खोदकर जिसे खड़े किए जा सकते हों
संपदा के नए पहाड़

उनकी आँखों में
जो इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में आकर भी
रहते हैं पहाड़ों पर आज भी
पहाड़ पहाड़ नहीं
लगता है उन्हें अपने घर जैसा
जहां कोई बच्चा
पहाड़ी पर बने स्कूल में पढ़ने गया होता है
कोई गया रहता है लकड़ियाँ बीनने
और कोई पहाड़ी से बैठकर
देखता है दूर के शहर को
और पूरा शहर उसकी आँखों में
पहाड़ सा नजर आता है |

 

3. उनकी आत्महत्या की खबरें

अखबार में
छोटी  जगहों को  भी
नहीं घेर पा रहीं हैं
उनकी आत्महत्या की खबरें
कि धरती पर
हरियाली बिछाते  हाथों को काटा जा रहा है
किस तरह उनकी जड़ों  से
मानो धरती के अंत का समय निकट हो !

उनकी ओर उठती नजरों को बाजार ने ढंक लिया है ऐसे
कि उनकी तरफ जाते रास्ते सभी
धीरे धीरे हो  रहे हैं बंद !

गायब है
उनकी हथेलियों  से उठने वाली सुगंध भी
कि हल की मूठ थामे
हाथों  की पहुंच से बाहर
हो गया है यह समय कितना !

वे हाशिए तक धकेले जा चुके हैं
और होकर हाशिए के बाहर अब
गिर रहे हैं समय की खाईयों  में

कि वहां से नहीं उठ रहा
उनकी मृत्यु का कोई  शोर

ख़बरों  के भीतर से !

धरती के खत्म होने  का
संकेत है यह जबकि
तरक्की की नई-नई खबरें गढ़ी जा रहीं हैं रोज

एक नई दुनियां के अभ्युदय का शोर  है जिनमें
जो  घेर रही हैं बड़ी जगहों को  अखबार पर
और अंधेरे समय की आखों  से
बड़ी ख़बरों  की तरह पढ़ी जा रही हैं !!

4. मां 

वह थी
थी वह तो  बची हुई थी
संवाद के लिए जगह घर में

संभव था
इस छोर से उस छोर  तक
पहुंचना भी   रहते उसके

जाना उसका
छूट जाना था हम सबका
छोर  पर अपने-अपने

टूटना था उस पुल का भी
जो भीतर था हमारे
खुलते थे कई कई रास्ते जहां से

उसका जाना
बंद हो  जाना था
उन रास्तों  का भी

घर के भीतर
कई-कई घरों  का बन जाना था
असमय इस घर से
इस तरह उसका हमें छोड़कर  जाना !

 

5. दादी मां का घर 

निकलकर इस छोर  से
उस छोर  तक पहुंचते हुए
छूट जाता है कुछ न कुछ
पृथ्वी पर
जैसे उस घर का समय
जैसे वह घर !
जिसके आंगन से
दिखता था आसमान
रिश्तों की चांदनी में नहाया हुआ
जहां ठहर कर देखता था समय
अपने हंसते हुए चेहरे को
गढ़ा था एक स्त्री ने
बुनते हुए जिसे !

अपने समय से
मिलते जुलते चेहरों  में
कितना तो  मिलता था
उस स्त्री का चेहरा
कि दूर से ही पहचान लेता था
घर उसे !
उस स्त्री के हाथों  में कैसा तो जादू था
कि लीपते बुहारते अपने समय को
धुंधला नहीं होने  दिया
उसने कभी !

वह जहां थी
दादी मां का घर कहा जाता था
बाजार की दस्तकों  के बीच
रहते हैं हम जहां
क्या कहें उसे…….?
क्या नाम दें ………?
कि हम तो बिना घरों  वाले समय के भीतर रहते हैं !

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