रामकेश सिंह की पांच कविताएं

एक

निःसंदेह अन्न और अक्षर की लड़ाई
नहीं जीत सकते हम
मजहबी किताबों से,
अखबार या चैनलों के शोर में
फ़ैल रही गदगद आत्ममुग्धता से
छिप नहीं सकती
बारूदी गंध
गुप्त मंत्रणाएं इधर भी हैं, उधर भी हैं
इसलिए नहीं कि लड़ाई जमीनों की है
इसलिए कि लड़ाई कमीनों की है,
भाषणों के मलबे पर
सर्पिल उद्घोषणाओं के
बेहोश गवाह हैं हम
धरती की सांस गयी है थम
स्वाभिमान का प्रभामंडल
भुरभुरा कर रहा है अस्थि-पंजर
और मुहावरों में भर रहा है
भाईचारे का जहर ||

 दो
चितकबरी चांदनी में
फागुन के गीत
पियराये चाँद को याद आया मीत
बेदर्दी नयनों ने दर्द ही दिया
नागिन हवाओं ने जर्द ही किया
सर्द सर्द आहों में
जली-तपी प्रीत |

मंद मंद छंद बहे
पुरबी हवाओं में
मितवा की गंध बसी
धनखेती राहों में
नदी-तीर गीत से
चकित-भ्रमित जल धारा
तोड़ बंध
खिलखिलाते संध्या-नभ-मोती
मूंज की ओट से प्रणय राग छेड़ता कपोत
पुलकित सन्नाटे से प्राण गया रीत
जो याद आया मीत |

तीन

हरे हरे धनवा पे
बरस गया सावन
तन मन भिगो गया ,
वर्षों से मुरझाया जेहन
खिल उठा गुलमोहर के फूल सा
भिंडी, तरोई औ’ कुनरू की बतिया
सिहराये ऐसे ज्यों
मुरहा ने छू दी
क्वारी की छतिया
रतिया को निमिया भी
महकी लहक के
बोली टिटिहरी बहक के चहक के
छानी से चुए बरखा का पानी
झंकारे झींगुर सुनाये कहानी
हैं तान छेड़े गादुर औ’ दादुर
हिलडुल बुलाते हैं गन्ना बहादुर
शीशम औ’ सेखुआ हँस के पुकारे
गौवां में देखे हम अद्भुत नज़ारे।

चार

मैंने खिड़कियाँ, रोशनदान और दरवाजे
सब खोल दिए
ये सोच कर कि आएगी
ताज़ी हवा के साथ फूलों की महक
पक्षी की चहक
टहनी की लहक
पर हाय रे दुर्भाग्य
घर के हर कोने में
भर गए हैं
रक्त-चूषक कीट
अब अपनी आकांक्षा पर
पछता रहा रहूँ
उदारता की टीस
सबको सुना रहा हूँ।

पांच

अब तो तितलियों ने भी कोयल के
पंख जड़ लिए हैं
लगता है हवा ने भी
इरादे पकड़ लिए हैं
पर बाज भी है आसमां में
दूर तक छाये
परवाज होश में,
कई हैं जाल बिछाए।।।

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