चोट करतीं कविताएं

रामस्वार्थ ठाकुर

 

जनतंत्र जिन्दा है

गुंबज पर ध्वज फहरा रहा है

संसद चिल्ला रही है

सरहद पर भौंक रही हैं संगीनें

‘जनतंत्र जिन्दा है’

 

बोलो मत

बोलो मत

शब्द को शीत लग जाएगा

अथवा

चीनी या जापानी इन्सेफ्लाइटिस का संक्रमण

अथवा

सांप्रदायिक उन्माद में

कोई उसे छूरा भोंक देगा।

 

असली जनतंत्र

असली जनतंत्र

जहां ‘कानून’

किताब की ‘इबारतें’

‘न्याय’ — विवादों का ‘शेष’

‘नेता’ — ‘भीड़’ को हांकने वाला

‘मताधिकार’—मतदाता सूची में दर्ज ‘एक नाम’

और

‘नागरिक’—एक अदद आदमी होता है

इसमें एक ही सहायक ‘क्रिया होता है’ है।

 

प्रोफेसर रामस्वार्थ ठाकुर मुंशी सिंह कॉलेज, मोतिहारी के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रह चुके हैं। ये कविताएं उनके काव्य संकलन ‘अतीत के मुखर वर्तमान’ से ली गई हैं। उनकी अन्य पुस्तकें हैं आलोचना आलेख, ‘भाषा का लोकपक्ष’, ललित निबंध संग्रह ‘चिंताकल्प’ और लघु उपन्यास ‘सपने और सपने’।

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