रंजना जायसवाल की कहानी ‘कैसे लिखूं उजली कहानी’

रंजना जायसवाल

जन्म  : ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पड़रौना जिले में |

शिक्षा –गोरखपुर विश्वविद्यालय से “’प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी |

प्रकाशन –आलोचना ,हंस ,वाक् ,नया ज्ञानोदय,समकालीन भारतीय साहित्य,वसुधा,वागर्थ,संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता ,राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण,हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय,साहित्यिक परिशिष्ठों पर  कविता,कहानी ,लेख व समीक्षाएँ प्रकाशित |

अन्य गतिविधियाँ-साहित्य के अलावा स्त्री-मुक्ति आंदोलनों तथा जन-आंदोलनों में सक्रिय भागेदारी |२००० से साहित्यिक संस्था ‘सृजन’के माध्यम से निरंतर साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन | साथ में अध्यापन भी |

प्रकाशित कृतियाँ 

कविता-संग्रह –

मछलियाँ देखती हैं सपने [२००२], लोकायत प्रकाशन,वाराणसी

दुःख-पतंग [२००७], अनामिका प्रकाशन,इलाहाबाद

जिंदगी के कागज पर [२००९], शिल्पायन ,दिल्ली

माया नहीं मनुष्य [२००९],संवेद फाउंडेशन

जब मैं स्त्री हूँ [२००९],नयी किताब,नयी दिल्ली

सिर्फ कागज पर नहीं[२०१२],वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली

क्रांति है प्रेम [2015]वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली

स्त्री है प्रकृति [2018]बोधि प्रकाशन,जयपुर

कहानी-संग्रह –

तुम्हें कुछ कहना है भर्तृहरि [२०१०]शिल्पायन,दिल्ली

औरत के लिए [२०१३]बोधि प्रकाशन,जयपुर

लेख-संग्रह –

स्त्री और सेंसेक्स [२०११], सामयिक प्रकाशन ,नयी दिल्ली,

तुम करो तो पुण्य हम करें तो पाप [2018]नयी किताब,दिल्ली |

उपन्यास –

….और मेघ बरसते रहे ..[२०१३], सामयिक प्रकाशन नयी दिल्ली

त्रिखंडिता [2017], वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली |

मुझे माफ करना इला , मैं  तुम्हारा साथ न दे सकी । चाहती थी देना ….बहुत….बहुत दूर तक साथ देना पर … मैंने खुद भी तुम्हें गलत कहा, बुरा व्यवहार किया पर वह इसलिए कि तुम मेरा घर छोड़ दो । तुम जानती हो इला, यह औरत–जात बड़ी कमजोर होती है। तुम खुद भी इतनी पढ़ी –लिखी, कमाऊ और आजाद लड़की हो। फिर भी दुनिया की नजर में क्या हो तुम? सिर्फ एक देह,जो युवा है, सुंदर है, जिसे सब भोगना चाहते हैं। तुम दवाओं की एक कंपनी में काम करती हो, फर्राटे से अंग्रेजी बोलती हो, वह सारे काम करती हो,जो मर्द करते हैं ,फिर भी बच पाई क्या लड़की होने के अभिशाप को झेलने से!

तुमने ही तो बताया था कि जिस भी डॉक्टर के पास तुम जाती हो, वह दवाओं में कम, तुममें ज्यादा दिलचस्पी लेने लगता है। वह तुम्हारे ऊपर ही प्रयोग करना चाहता है, कम से कम एक रात के लिए ही । बदले में वह तुम्हारी कंपनी की ही दवाएँ खरीदेगा, जिसके लिए कंपनी तुम्हें तनख्वाह देती है। ये डॉक्टर, जिनके पास सुंदर डॉक्टर पत्नियाँ हैं, बच्चे हैं, अथाह पैसा है। कोठी, बंगला, गाड़ी सब कुछ जरूरत से बहुत ज्यादा। फिर भी वे मजबूर लड़कियों के देह चाहते हैं और लड़कियां हैं कि  मुस्करा रही हैं, हँस रही हैं… रिझा रही हैं। सारी अश्लीलता देह और मन पर झेल रही हैं, ताकि उन्हें पैसा मिले| पैसा, जो उन्हें आजाद होने का अहसास दिलाता है, पैसा, जो उन्हें घर के चूल्हे-चौके से एक हद तक निजात दिलाता है, पर क्या सचमुच आजाद होती हैं वे ?आजादी की इतनी बड़ी कीमत! तभी तो तुम्हारा भाई कहता है कि यह काम छोड़ दो। घर का काम-काज करो और विवाह के पहले तक.उसे खुश रखो …..| पर तुम्हें यह मंजूर नहीं, तभी तो तुम यह काम नहीं छोड़ती। रोज डॉक्टरों से हँसती…बोलती….टालती अपना काम किए जाती हो।

सुबह से देर शाम तक दौड़ती तुम मुझे अच्छी लगी थी। मुझे शुरू से बोल्ड लड़कियाँ पसंद हैं। फर्राटेदार अंगेजी बोलने वाली, तेज स्कूटर चलाने वाली और मर्दो के कान काटने वाली! शायद इसलिए कि मुझमें ये तीनों ही विशेषताएँ नहीं हैं। वैसे तो समाज में मेरी छवि ‘लौह महिला’ की है, पर सच कहूँ तो मैं अंदर से बड़ी डरपोक स्त्री हूँ। डरपोक नहीं होती, तो तुम्हें घर से न निकाल देती। मैं डर गई थी इला, कहीं तुम्हारे घर वाले मुझ पर ही केस न कर दें कि तुम्हें बहला-फुसलाकर या जबर्दस्ती अपने पास रोक लिया है। तुमने ही तो बताया था कि तुम्हारे भाई कहते हैं कि मैं जरूर लड़कियों का रैकेट चलाती होऊंगी। उफ,अब ये भी सुनना होगा!

हाँ, यह सच है कि इधर लड़कियाँ मेरे घर आने-जाने लगी हैं, विशेषकर सताई हुई लड़कियाँ! उन्हें लगता है कि मैं बहुत सबल हूँ उनका साथ दूँगी। वे सब की सब अच्छी लड़कियाँ हैं। लड़कियाँ हमेशा अच्छी होती हैं। परिस्थितियाँ कुछ लड़कियों को गलत रास्ते पर डाल देती हैं| फिर भी वे बुरी नहीं बन पातीं,पर लोग उन्हें बुरा कहते हैं। विडम्बना यह है कि जो अकेले में उनके सामने गिड़गिड़ाते हैं, भीड़ में उनकी उपेक्षा करते हैं। ऐसे दोहरे चरित्र वाले लोगों को एक स्त्री के घर लड़कियों का आना भी अखरता है। लड़के तो खैर वर्जित हैं ही। वे तो भाई ….बेटे जो भी हों, सीधे प्रेमी मान लिए जाते हैं और स्त्री ‘लौंडेबाज’ की उपाधि से नवाज दी जाती है। अब लड़कियों के साथ भी दिक्कत है। कहीं ‘समलिंगी’ तो नहीं। जैसे दुनिया के सबसे ज्वलंत मुद्दे यही हों। मानवीय रिश्ते भी कटघरे में हैं आज! एक महाशय ने मेरे एक रिश्तेदार से कहा –‘वे तो ठीक लगती हैं, पर उनके घर जो लड़कियाँ आती हैं, उन पर संदेह होता है।‘ वे महाशय और मेरे रिश्तेदार वे लोग हैं, जो उन दिनों मेरा हाल-चाल ज्यादा पूछने लगते हैं, जिन दिनों कोई लड़की मेरे घर ठहरी होती है।

न जाने कितने लोगों से मेरे रिश्ते खराब हो गए, इन लड़कियों के कारण। जाने क्यों मुझे बर्दाश्त ही नहीं होता कि कोई इन मजबूर लड़कियों की देह पाने की बात सोचे! उन पर घटिया टिप्पणी करे। न पा सकने पर बदचलन कहे और पा लेने पर अपनी मर्दानगी पर इतराए।

हाँ, इला मैंने तुम्हें घर से निकाल दिया, क्योंकि तुम्हारे भाई ने धमकी दी, तुम्हारे पिता मेरी कॉलोनी में घूमने लगे। मैं बदनामी के डर से काँप उठी। तुम अपने घरवालों से लड़कर मेरे पास आई थी। तुमने विद्रोह किया था। उन्होंने तुम्हें जानवरों की तरह पीटा था। तुम्हारी देह जगह-जगह से नीली पड़ गई थी। तुम्हारे गले पर रस्सी कसे जाने के निशान थे। मैं तुम्हें इस हालत में देखकर तड़प उठी थी। मैं तुम्हें बचा सकती हूँ। अपने पास रख सकती हूँ। यह सोचकर अर्धविक्षिप्त हालत में स्कूटर चलाती हुई तुम ,शहर के दूसरे छोर पर स्थित मेरे घर आ गयी थी| कितनी उम्मीद थी तुम्हें मुझसे। तुम मेरे साथ रहना चाहती थी। मुझे क्या एतराज हो सकता था, पर मैंने एतराज किया। मैं डर गई। तुम्हें ही जब तुम्हारे घर वाले ‘कालगर्ल’ कह रहे थे, तो मुझे क्या न कहते! हो सकता था कि हम ‘समलिंगी’ मान लिए जाते और बड़ी मुश्किल से लगी मेरी प्राइवेट नौकरी मुझसे छूट जाती। फिर मैं भी सड़क पर आ जाती और वह लड़ाई अधूरी रह जाती जो बचपन से लड़ रही हूँ। अपने अस्तित्व को बचाने में मेरी अब तक की उम्र खप गई है। मैं बस इसलिए बची रह गई हूँ कि एक छोटा घर और छोटी नौकरी है और झूठी ही सही समाज में एक इज्जत है। मैं उसे खोने से डरती हूँ। तुम कहोगी, मैं कितनी स्वार्थी हूँ। सच है, स्वार्थी हूँ क्योंकि जिंदगी की इस हकीकत को जानती हूँ कि लड़की के पास अपना घर और पेट भरने की रोटी न हो, तो उसकी बोटी-बोटी नोंच लें ये तथाकथित सभ्य लोग!

इला, हम तो आर्थिक रूप से स्वनिर्भर हैं। सोचो उन अनपढ़ पराश्रित लड़कियों के बारे में। किस तरह देह के धंधे में उतार दी जाती हैं। फिर किस तरह समाज और पुलिस-प्रभाग उन्हें जलील करता है। कितना खतरनाक और घिनौना है यह सब! मैं इससे बहुत डरती हूँ, इस ठप्पे से डरती हूँ। इस झूठे ठप्पे के कारण न जाने कितनी बहनों का जीवन-संघर्ष दो कौड़ी का होकर रह गया और यह ठप्पा लगाना कितना आसान है, यह तुम भी जानती हो।

इला, लड़की होना किसी अभिशाप से कम नहीं है, यह तुम भी जानती हो, मैं भी जानती हूँ और इस देश की हर वह लड़की जानती है, जिसके सिर पर तथाकथित महान पुरुषों–चाहे वह पिता, भाई, प्रेमी, पति कोई भी हो—का वरदहस्त नहीं है। मैंने तुम्हें घर से इसलिए नहीं निकाला कि  तुम्हें बुरा समझती हूँ, बल्कि इसलिए कि अभी भी मेरी स्थिति बहुत कमजोर है। स्त्री वह भी अकेली! वह भी सुदर्शना! वह भी स्वाभिमानिनी! वह भी पुरुषों के लिए चुनौती! सह सकता है ऐसी स्त्री को कोई ? कैसे कुचला जाय उसे, कैसे ? धन से…. ! नहीं संभव है… । बदनाम करके…कठिन है…तो प्रेम से…आह, यह प्रेम शब्द! कितना लुभावना है। विवेक सम्पन्न स्त्री भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाती ।

पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण प्राकृतिक है, पर कितना अप्राकृतिक बनाकर रख दिया गया है इसे। इस प्रेम नाम से मैं भी पिघली थी, पर तुम तो पिघलकर ऐसी बन गई हो कि तुम्हारी आकृति ही बिगड़ गई है। कैसे लिपटकर रोई थी तुम उस दिन मुझसे। तुम्हारा दर्द मेरे सीने में भी उठने लगा था। तुम बार-बार विक्षिप्त-सी एक ही बात रटे जा रही थी- ‘उसने मुझे धोखा क्यों दिया? एक-दो दिन नहीं पूरे छह माह वह मुझसे प्रेम करता रहा और आज अचानक यह पता चला कि वह किसी और से विवाह कर रहा है। उससे सात साल पुराना अफेयर है। वह ऐसा कैसे कर पाया! जब वह किसी और से प्यार करता था, फिर मेरे पास कैसे लेट गया? अपना सब कुछ देना और किसी का सर्वस्व ले लेना क्या सिर्फ मनोरंजन है? उसने पहले क्यों नहीं बताई यह बात कि वह किसी और से….।‘

इला, मेरी बहन, वह पहले से ही क्यों बताता कि उसकी जिंदगी में ‘कोई’ है। बता देता तो तुम्हारा शरीर कैसे मिलता उसे! अधिक से अधिक स्त्री-भोग से ही तो मर्दों की मर्दानगी साबित होती है, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह तुमसे प्रेम नहीं करता था। इला, तुम नहीं जानती, प्रेम का नाम भी कुछ मुफ्तखोर मुफ्त का आनंद उठाने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं । बाजार में जाएंगे, तो देह की कीमत देनी पड़ेगी। ऊपर से जूठे गिलास का पानी पीना पड़ेगा, वे तो साफ-सुथरे, सुंदर गिलास का पानी पीना चाहते हैं मुफ्त में और बिना बदनाम हुए और ऐसा सिर्फ प्रेम का नाम ले लेने से संभव हो जाता है।

तुम खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोंचना चाहती हों। कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी तुम उसका। तुम्हारा ही बिगड़ता चला जायगा। तुम दलदल में फँसती चली जाओगी। तुम्हें इस हार को पचा लेना होगा, पर तुम हार मनाने को तैयार नहीं हो, उसे बदनाम और बर्बाद करना चाहती हो..काश, तुम समझ सकती कि प्रेम जबरन हासिल नहीं किया जा सकता। फिर ये मर्द बड़े ताकतवर होते हैं, देह, मन और दिमाग से ही नहीं, समीजिक स्थिति से भी। परिवार, समाज, धर्म सब इनका ही साथ देता है, फिर वह तुम्हारी कंपनी का मैनेजर है, फ्लाइट से चलता है, फाइव-स्टार होटलों मे ठहरता है, बड़ा आदमी है, ऊंची पहुँच वाला भी! तुम क्या कर लोगी उसका? एक महिला ने उठा तो दिया प्रश्न कि – ‘तुमने अमीर लड़का ही क्यों चुना? मतलब तुम भी दौलत चाहती थी….. । ना…ना सफाई मत देना …मैं जानती हूँ सच! दरअसल, वह महिला भी इसी समाज की उपज है, पर मैं तो एक दूसरी आवाज सुनती हूँ। मैंने तो अमीर लड़के का वरण नहीं किया था। फिर मेरा प्रेम असफल क्यों हुआ!

इला, लड़की बहुत भावुक होती है। वह पुरुष का प्रेम चाहती है, पर बदले मे धोखा खाती है। ये मर्द खुद पर आँच आते देख तुरत-फुरत बदल जाते हैं। उन्हें एक मिनट के लिए यह भी ख्याल नहीं आता कि जिसे प्यार किया था, उसके बारे में क्या कह रहे हैं? बदलचलन, वेश्या कुछ भी कह सकते हैं। फिर लड़की सबकी दृष्टि में अपराधी बन जाती है। मैंने सैकड़ों लड़कियों की व्यथा-कथा सुनी है। सभी कभी न कभी प्रेम के नाम पर छली गई हैं। पुरुष का दिमाग प्रेम के क्षणों में भी काम करता रहता है वह कभी भी घाटे का सौदा नहीं करता। लड़की पर जो भी खर्च करता है, उसका एक-एक पाई वसूल लेता है।

इला, विवाहित पुरुष के लिए तो दूसरी स्त्री बस स्वाद बदलने का माध्यम होती है, रहे अविवाहित, तो वे आजकल विवाहित पुरुषों से भी आगे बढ़े हुए हैं । उनकी आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने होते हैं। पत्नी रूप में तो अक्षत, अकलंक लड़की चाहिए, पर खुद दुनिया की हर सुंदर स्त्री को भोग लेना चाहते हैं। लड़कियाँ तो लड़कियाँ उन्हें तो विवाहिताओं से भी परहेज नहीं। वे पुरुष वेश्याएँ हैं, जो अपने देह-प्रदर्शन व प्रेम-नाट्य से स्त्रियों को रीझाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। वे स्त्रियाँ, जो किसी कारण से पुरुष- सुख से वंचित हैं, बड़ी आसानी से उनके जाल में फंस जाती हैं। वे उन स्त्रियों का तन,मन,धन सब लेते हैं, पर बदले में कुछ नहीं देते और जब कभी वे पकड़े जाते हैं, तो यह कहकर दामन झाड़ लेते हैं कि  वे तो अविवाहित, कम उम्र व अनुभवहीन थे।

इला, यह प्रश्न हमेशा उठता है कि अनुभवी, समझदार, परिपक्व , विवाहित महिलाएँ ऐसा क्यों करती हैं? जानती हो मैंने ऐसी स्त्रियों में प्रेम की अद्भुत प्यास देखी है। अपने नपुंसक पुरुषों से प्यार न पाकर वे भटक जाती हैं पर अंतत: तनाव और बदनामी के सिवाय मिलता क्या है? इधर ‘देह स्वतन्त्रता’ की जो हवा चली हैं, उसके कारण भी कुछ स्त्रियाँ अपनी देह को स्वेच्छा से जीने पर ज़ोर देने लगी हैं, पर वह स्वतन्त्रता उन्हें दूसरे ढंग से गुलाम बना रही है। एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा पुरुष और हर बार नए ढंग का छल और देह ढलते ही अवसाद। पहले कम से कम उन्हें यह संतोष रहता था कि वे नैतिक हैं। पर अब वे मन ही मन खुद को गिरा हुआ महसूस करती हैं |नैतिकता संस्कार में होने के कारण वे खुद भी ऐसी स्त्रियों की इज्जत नहीं करती, जिनके जीवन में एकाधिक पुरुष आ चुके हों। रहे पुरुष, तो वे कभी भी मन से ऐसी स्त्रियों का सम्मान नहीं करते, प्रेम और विवाह तो दूर की बात है। हाँ, मजे करने के लिए ऐसी आजाद ख्याल स्त्रियाँ उन्हे बेहद पसंद आती हैं। पत्नी तो घर की मुर्गी है, कहाँ जाएगी? पति की रंगरलियों को जान भी गई तो रो-धोकर मान जाएगी। पुरुष ही जीतता है इला, स्त्री प्रेमिका हों या पत्नी दोनों रुपों में दुख ही पाती है । राधा प्रेम के नाम पर छली गई, सीता विवाह के नाम पर।

इला, तुम्हें भूलना ही होगा उस शख़्स को। उसने जो तुम्हारे साथ किया, वह हर रोज हजारों लड़कियों के साथ होता है। कितनों को न्याय मिलता है? तुम्हें भी नहीं मिलेगा और थोड़ा-सा न्याय मिला भी तो उस लड़की का क्या होगा, जो सात साल से उससे जुड़ी है। तुम विवाह के लिए पागल हो, इतनी बदनामी के बाद भी। पगली कौन करेगा, तुझसे विवाह! ये कमजोर मर्द तुम्हारे साथ सो सकते हैं, विवाह नहीं कर सकते। तुम्हारी बोल्डनेस, आत्मनिर्भरता, आजादी इन्हें रास नहीं आएगी। विवाह करने के लिए तुम्हें खुद को बदलना पड़ेगा। एक पारंपरिक, घरेलू-सी छवि बनानी पड़ेगी। तुम्हारी ईमानदारी, सच्चाई, पारदर्शिता का कोई मूल्य नहीं है। ये धोखेबाज मर्द धोखा खाने के आदी हैं। न जाने तो गंदा खा लें। जान गए तो कमल का फूल भी अपवित्र लगता है इन्हें। ये गुलाब पसंद करते हैं। गमले का गुलाब, जतन से सँजोया हुआ, काँटों से रक्षित। अब यह अलग बात है कि उस गुलाब को काँटों ने ही…. । बड़ी भद्दी बात है न, पर कितना सच! कितनी उम्र थी तुम्हारी जब तुम्हारे सगे मामा ने ही तुम्हारे साथ…. छह साल ही न…. ! क्या मिला होगा उस कामुक भेड़िए को….एक विकृत संतोष के सिवा! पर तुम तो नष्ट हो गई और फिर तुम्हारा सगा भाई भी तुम्हारे साथ, तब तक वही करता रहा, जब तक तुम विरोध करने लायक नहीं हो गई और अब विरोध करने पर मार-पीट करता है। कितना असुरक्षित महसूस करती हो तुम अपने पिता के घर में! हर पल सतर्क रहना पड़ता है। मैंने जब तुम्हारे भाई से इस बारे में बात की तो वह बेशर्मी से बोला- ‘क्या भाई-बहन होने से पहले हम लड़का-लड़की नहीं है? और फिर इसमें बुरा क्या है। दूसरों के घर भी यह सब होता है, पर लड़कियाँ मेरी बहन की तरह घर की बात बाहर नहीं ले जाती।‘ तुम्हारे माता-पिता, भाई-बहन से बात की तो सबने तुम्हें ही ‘कालगर्ल’ कहा। सब तुम्हारे भाई की सुरक्षा में खड़े हो गए और घर पहुँचने पर सबने मिलकर तुम्हें जानवरों की तरह पीटा ।

तुम ऐसे घर में नहीं रहना चाहती। ठीक ही है। कौन लड़की रहना चाहेगी ऐसे असुरक्षित माहौल में! घरेलू हिंसा का शिकार जब तुम-सी लड़की हो सकती है, फिर साधारण लड़कियों का क्या होगा? तुम किसी और से रिश्ता रखती हो, इस आड़ में वे अपना अपराध छिपना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि घर के वातावरण ने ही तुम्हें उस आदमी के प्रेम में डाल दिया और उसने तुम्हारे घर की कमजोरियों को जानकार ही तुम्हें धोखा दिया। पर हर बात के लिए सिर्फ और सिर्फ तुम्ही दोषी ठहराई जा रही हों क्योंकि तुम एक लड़की हो, वह भी इस शक्ति-पूजक देश की! हजारों बच्चियाँ जहाँ प्रतिदिन अपनों द्वारा शोषित हो रही हैं, पर सब चुप हैं तो तुम्हें भी चुप रहना चाहिए था। ऐसा ही चाहते है सब। वरना तुम्हें ‘बिगड़ी लड़की’ साबित करना उनके बाएँ हाथ का खेल है। तुम घर से बेघर हो जाओगी। फिर कोई शरीफ घर तुम्हें शरण नहीं देगा और न ही अपना घर बसाने देगा।

तुम अकेली रहना चाहती हो, इस बात को तुम्हारे घरवाले कैसे स्वीकार करें? समाज क्या कहेगा? उनके लड़कों का सिर नीचा हो जाएगा। इसलिए तुम्हें घेर-घारकर मादा की तरह घर के अंदर खूँटे से बांधकर रखना चाहते हैं। तुम एक ही समय कई मोर्चों पर लड़ रही हो। इसीलिए परेशान हों और तुम्हारी परेशानी से परेशान होकर मैंने तुम्हें घर से निकाल दिया। नारी अधिकारों की वकालत करने वाली मैं भी! न जाने ‘सम्भ्रान्त स्त्री’ कहलाने का रोग मुझे कब लग गया? इस व्यवस्था ने यह कैसा जाल बुन दिया कि पीड़िता के मन में भी अपनी पीड़ित बहनों के लिए कुछ कर दिखने का जज़्बा नहीं है। न जाने कब मेरा घर इस व्यवस्था का एक अंग बन गया। मैंने तो सोचा था की मेरा घर हर निराश्रित लड़की का घर होगा पर….. । इला, मैं भी दुनिया के हर दूसरे घर के लिए अनफ़िट हूँ। तुम्हें मेरे व्यवहार पर उदास होने की जरूरत नहीं।

इला, अब मैं पछता रही हूँ कि क्यों तुम्हें जाने दिया? अधिक से अधिक क्या होता पुलिस आती, तुम्हारे घर वाले मुझ पर ‘लड़की को बहका लेने’ का आरोप लगते। शहर में हो-हल्ला मचता। मुझे ‘रैकेट वाली’ या फिर इसी तरह के आरोपों से नवाजा जाता। मेरा ‘स्त्री-विमर्श’ ‘बदचलनी का विमर्श’ कहा जाता। मैं बदनाम हो जाती, मेरी नौकरी छूट जाती। बस इतना ही न! यही तो होता आया है अब तक। अखबारों से इन्हीं जानकारियों को पढ़कर ही तो मैं डर गई थी और यही तो चाहती है यह व्यवस्था की ‘लौह महिलाएँ’ भी डरी-सहमी रहें और इस व्यवस्था का एक पुर्जा बन जाएँ। मैं अकेली इसीलिए तो बना दी गई हूँ कि मुझे आसानी से कुचला जा सके। मेरे साथ कोई होता तो क्या मैं इतनी आसानी से हार मान लेती?

इला, एक प्रश्न और भी मेरे मन में सिर उठा रहा है कि कहीं मैं भी तो ‘यौनशुचिता’ के भ्रम में नहीं पड़ गई? एक असहाय, पवित्र लड़की को मैं कदापि घर से नहीं निकाल सकती थी। कहीं मैं खुद ही तो तुम्हें गलत…. । अगर यह सच है तो मुझे अभी खुद को ही बदलना होगा। मैं तुमसे ही शुरुआत कर रही हूँ।

तुम लौट आओ इला, मैंने तुम्हें कई बार फोन किया है, पर तुम उत्तर नहीं दे रही हो, जानती हूँ नाराज हो मुझसे। ऐसा काम ही किया है मैंने। मैं तुमसे क्षमा चाहती हूँ। तुम लौट आओ, मैं एक से दो होना चाहती हूँ। हम मिलकर लड़ेंगे,अपनी तमाम बहनों के लिए। अधिक से अधिक यही होगा न कि लोग हमें ‘समलिंगी’ कहेंगे। कहने दो इला, अगर यह सच भी होता तो बुरा क्या है? इन अधूरे, नपुंसक, संवेदनशून्य, बेईमान पुरुषों के साथ से तो पूर्ण संवेदनशील स्त्रियों का साथ ही सार्थक है। हम हर आरोप सह लेंगे, पर चुप न रहेंगे। लड़ेंगे आखिर तक लड़ेंगे। हम कमजोर नहीं हैं। नहीं बनना हमें इस सड़ी व्यवस्था का अंग।

क्या समझती हो इला,जो मैं लिख रही हूँ उसे आसानी से पचा पाएंगे लोग। अपने पक्ष में जारी किया गया बयान कहेंगे कुछ लोग। कुछ कहेंगे, तुम्हारे बहाने अपनी कुंठाएँ निकाल रही हूँ । यह लिखना और भी खतरनाक है, सब कुछ सहते जाने की अपेक्षा| मर्यादा की लकीरें पीछा करेंगी। औरत की मर्यादा और पुरुष की मर्यादा अलग-अलग जो है। हमें हारा हुआ, गुजरा हुआ मानने वाले इसमें रस लेंगे। सुना है, पेशेवर हत्यारा हर हत्या के बाद अपने शिकार को तड़पना हुआ देखना चाहता है। मैं जो लिख रही हूँ पश्चताप की आग में जलते हुए , तुम्हें पुकारते हुए, इसे हमारी तड़पन के रूप में देखने वालों की पूरी जमात खड़ी है। इला, देह के सवाल से शुरू हुई यह समस्या देह पर आकर क्यों खत्म हो जाती है? देह सलामत रहे, अपनी इच्छाओं और जरूरतों के साथ। देह के भीतर रहकर नहीं देह से बाहर आकर ही हो सकती है।

आओ इला, हम एक नई दुनिया बनाएँ। मुक्त हो जाएँ पुरुषों के मोह से। मैं तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ। तुम्हारे बिना कैसे लिखूँ उजली कहानी, जब तुम अंधेरे में टकरा रही हो और मैं विवश सुन रही हूँ उस टकराहट की आवाज ।

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