रंजीत राज की तीन कविताएं

दर्द से रिश्ते

दर्द से रिश्ते
कुछ ऐसे बने मेरे
कुछ टूट गये
कोरे सपने मेरे
यही तो मेरी जमा-पूँजी है
खाली आसमाँ खाली-खाली जमीं है
दर्द सहना है चुप ही रहना है
मैं कवि हूँ
जब तक जीना है पल-पल मरना है

पीड़ाओं का मुकुट किसे दिखलाऊँ
समंदर दुविधाओं का किसे समझाऊँ
जो पाना था उसे खोता आया
किस्मत की लकीर किसे बतलाऊँ
थाम कर
अंगुलियाँ मेरे
कह दे कोई
प्रीतम मेरे
राँझे की हीर से बड़ी बेकसी है
खाली आसमाँ खाली-खाली जमीं है
दर्द सहना है चुप ही रहना है
मैं कवि हूँ……..

खता क्या हुई मुझे बता दो
इस जिंदगी की डोर को मिटा दो
तुम्हें चाहना अगर जुर्म है
तो जो चाहे मुझे सजा दो
मिला कर
मुझसे नजर मेरे
हमदम न सही
मनमीत मेरे
यही सुनने को मेरी नब्ज थमी है
खाली आसमाँ खाली-खाली जमीं है
दर्द सहना है चुप ही रहना है
मैं कवि हूँ………..

तब गीत बनता है

जब आँखों से आँसू गिरता है
तब सुन्दर सा गीत बनता है

कितने ही संमदर छिपे है इस नयन में
चाहे तेरे नयन हो या मेरे नयन
जब उठता है दर्द काली बेबस रातों में
छुप-छुप के रोते है सब बातों ही बातों में
ख्वाब से पलकें बोझिल होती है
बार-बार यह उपवन उजड़ता है
जब आँखों से आँसू गिरता है
तब सुन्दर सा गीत बनता है

तड़पकर उठा है सागर सा मंथन
भिंगो देंगे मन को ये उलझन
तुझे छूने की आरजू दिल में लिए
भटकता रहा सपनों में मुश्किल लिए
जब अनजान राहों पर पाँव बढ़ता है
चलते-चलते यह राह भटकता है
जब आँखो से आँसू गिरता है
तब सुन्दर सा गीत बनता है

चिड़ियों की बोली

चिड़ियों की बोली
कौन सी भाषा
कौन सी लिपि

सुमधुर
संगीतमय
कर्णप्रिय
ये बोली

नासमझ
नामुराद
नाद्वेश
ये बोली

माँगना क्या
चाहना क्या
देना क्या
समझ से परे

चिड़ियो की बोली
कौन सी भाषा
कौन सी लिपि
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