रवि सुतार की तीन कविताएं

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पासपोर्ट

स्विट्ज़रलैंड

हो जैसे गाँव का बस स्टैंड

खेत से गाँव की दूरी जितनी है

उतनी ही दूर तेरे लिए सिडनी है

डिनर दुबई में

ब्रेकफास्ट के लिए इटली है

स्लिम सा ड्रिंक हैबिट तेरी

यार तेरा

काश्तकार

अमली है

अंग्रेजन पट गई तू कैसे..??

घास नहीं डालती मुझे

गाँव की उछली और बिमली है….!!

 

रस्ता देखे रोज नया एयरपोर्ट तेरा

मैं चयनित राशन-कार्ड धारी

ख्वाब देखूँ

कभी होगा खुद का पासपोर्ट मेरा ..!!

 

सुनने में आता है…!!

किसान अन्नदाता है…!!

उसके घर में थी रोटी

तो फाँसी क्यों खाता है..???

 

बारिश के लिए करते हैं हवन

लेकर हमसे पैसे

पढ़ते पण्डित श्लोक हैं…!!

खुदरा हर सामान खरीदे हैं

बेचते हैं धान अगर तो लगते भाव थोक हैं…!!

 

मेरे कुछ निजी इलज़ाम है अपने मुल्क पे…!!

इसलिए तुझे पटाया फेसबुक पे…!!

कोई फर्क नहीं गाँव की “गूंगळि बाई”

और तेरे लुक में…!!

मगर बहुत बड़ा है फर्क सुख और दुःख में…!!

तो बात कहूँ 2 टूक में…!!

#खेत_बेच_के_जीजा_खरीदा [बहन का दहेज]

#मकान_रख_गिरवी_वीजा_खरीदा

 

कि चाहता हूँ करूँ इस गाँव से

मैं एक्सपोर्ट मेरा…!!

 

इधर जल्दी से जल्दी आने को फ़ोर्स तेरा

दो बोरी बाजरी बेच के

तैयार है पासपोर्ट मेरा….!!

 

(किसानों पर लिखी यह कविता बताती है की किसान पलायन कर रहे हैं, गाँव में अब बुजुर्ग रह गए हैं, जवान कोई किसान गाँव में अब बचे नही, कोई मुम्बई तो कोई दुबई. इस भूख ने गाँव की जवानी ही नहीं बचपन भी छीन लिया है )

 

आओ एक पेड़ काटें

 

इलेक्ट्रॉनिक कोई आरी चलाओ

जो गरीब हैं वो एक कुल्हाड़ी उठाओ

काम ये अमीर-गरीब सब में बांट लें

आओ एक पेड़ काट लें..!!

 

भाई जब भाई नहीं

रिश्ता कोई स्थायी नहीं

लाइटर बने फिरते चौधरी सब

आग नफरत की किसी ने बुझाई नहीं

हो जाये बंटवारा तो फिर कोई लड़ाई नहीं

दीवार हम खींचे हैं

पर एक भाई पेड़ के नीचे है

धूप में खड़े

कैसे भला हम साँस लें….!!

आओ उस पेड़ को काट लें…!!

 

मौसम का दोगलापन देखें हैं

अख़बार में भी

“पेड़ बचाओ” विज्ञापन  लिखे हैं

हरियाली है हरियाणा में

अपनापन वहाँ देखे हैं

सूखे टिब्बों में खड़े हैं चार दरख्त

कौन से हैं काटने

आओ हम छांट ले…!

उनमे से 3 तो हम काट लें…!!

.

खैर

काम ये जरूर करना

पर जरा सा बात पे मेरी गौर करना

हिन्दू हो अगर तो

धर्म है तुम्हारा न मारना न मरना

एक पेड़ काटने से पहले

तुम किसी कसाई को याद करना

गर्व अपनी संस्कृति पे

और

शर्मिंदा होना तुम मारी गई अपनी मति पे

पेड़ भी

मानो है जैसे एक बकरी या भेड़ ही

सीधा-सादा

जीव जो काम आये इंसान के खुद से ज्यादा…!!

बीज

पौधा

लता

फसल

और

जो

पेड़ है

यही आवरण है

यही तो वातावरण हैं.

कैसे हम बगैर इस वातावरण के सांस लें

 

वो जो खेत हैं हरियाले

कुछ मेरे तो कुछ तेरे हिस्से वाले

आओ उनमे प्लॉट हम काट लें

आओ उनमें एक एक पेड़ काट लें…!!

 

आओ मेरे साथ कसम लो

या तो अब से साँसे कुछ कम लो

या फिर एक पौधे को जन्म दो..!!!

.

किसके जिम्मे कुदरत का नुकसान है..??

कुछ मेरा कुछ तेरा योगदान है

फिर भरते हम ही भुगतान है..!!

सोचो ज़रा

क्यों बेवजह हम परेशान है…???

.

ये हानि

ये परेशानी

कर खत्म दो…!!!

आओ मेरे साथ कसम लो

या तो अब से साँसे कुछ कम लो

या फिर एक पौधे को जन्म दो..!!!

.

घर में हो या खेत में

खोदो गड्डा एक रेत में

.

गड्डा गहरा हो दो हाथ का

फिर करो छिड़काव ज़रा खाद का

.

शीशम खेजड़ी या फिर नीम हो

चाहे आप जिसके भी शौकीन हो

.

पौधे को गड्ढे में डालो

ऊपर फिर रेत जमा लो

.

ऊपर से फिर पानी डालो

देते रहोगे पानी हमेशा

इसका भी प्रण लो…!!!

आओ मेरे साथ कसम लो

या तो अब से साँसे कुछ कम लो

या फिर एक पौधे को जन्म दो..!!!

 

जेल

जेल में जैसे मेरे हाल हैं..!!

पता है मुझे

वैसी ही तेरी ससुराल है..!!

 

दिनभर चक्की से आटा पिसवाता है

शाम को जेलर बैरक में आता है

पूछता ढेर सारे सवाल है

और

खाने में रोज रोज वही चावल और दाल है

पता है मुझे

वैसी ही तेरी ससुराल है…!!.

.

घर से अपने दूर हूँ

बिना मजदूरी का मजदूर हूँ

अब क्या बताऊँ आके यहाँ

कितना मैं मजबूर हूँ

एक जोड़ी कपड़ों में कट गए कितने साल हैं

पता है मुझे

कुछ ऐसी ही तेरी ससुराल है..!!.

.

चला आया जेल में एक बन्दूक उठाकर

बैठ गई तू भी डोली में अपनी सन्दूक उठाकर

तू भी सोचती तो होगी मुझे

जैसे आता मुझको तेरा ख्याल है

पता है मुझे

इस जेल के जैसी ही तेरी ससुराल है

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1 Response

  1. NEERAJ says:

    Very very nice

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