जब फागुन रंग झमकते हों

रीमा दीवान चड्ढा

मौसम ने ली अँगडाई, वह देखो घने जंगलों में लाल पलाश के फूलों ने आग है लगाई, शोख रंगो से लदी टेसू की टहनी मुस्काई, ढोल-नगाड़ों की मस्ती है छाई, फागुन की फुहार हर मन से है टकराई, अरे …रे…रे…होली है आई।

रंगों का रसीला, छबीला पर्व होली आज फिर हमारे  जीवन के आंगन में अपने सारे सुर्ख रंग बिखेर पसर जाना चाहता है। लोक जीवन की कोमल संवेदनाओं से जुडा रंगों का यह अनूठा पर्व मात्र पुरातन काल्पनिक कथाओं का वार्षिक आयोजन नहीं है, यह है प्रकृति परिवर्तन का रंगीला सूचक, जो बतलाता है कि जीवन का निखार, रंगों की बौछार, रस की बहार और फागुन की फुहार के बीच का मर्म है सौंदर्य, सत्य और सुख। कर्म की बेल पर सुख का मीठा फल जो जीवन की कड़वाहट को, गंदगी को, असत्य को, अधर्म को होलिका की तरह दहन कर देता है और सत्य के सूर्य को प्रह्लाद-सा जीवन देकर खुशियों से सराबोर कर देता है। यही होलिका प्रतीकात्मक तौर पर प्रतिवर्ष गली-गली जलाई जाती है और सत्य को सूर्य के तेज के साथ स्वीकार करती है।
वैदिक परंपरा कहती है कि चैत्र वैशाख अर्थात् मार्च-अप्रैल ही वसंत ऋतु है। चैत्र का वैदिक नाम मधु है और वैशाख का माधव। मधु-माधव की संज्ञा वाले चैत्र–वैशाख वसंत ऋतु रचते थे, जब आर्यों का निवास किसी हिमशीतल प्रदेश में हुआ करता था। मान्यता तो यह थी कि इन प्रदेशों में ही सूर्य मधुमय रहा होगा और आदित्य मंडल में निहित मधुनाडी की वैदिक अनुभूति तभी हुई होगी। व्यवहार में ऋतु चक्र हमेशा एक मास आगे चलता है। इस हिसाब से वसंत के असली महीने हैं फाल्गुन और चैत्र अर्थात् फरवरी और मार्च।
भारतीय संस्कृति महीनों के नामकरण से भी विशिष्ट है और विशिष्ट है अपनी संस्कृति की गाथाओं एवं  परम्पराओं से। होली के लिए एक मिथकीय आधार है देव और दैत्यों की लडाई। मान्यता यह है कि कलह के अंत के लिए यज्ञ की आहुतियों में घृणा को जलाकर शांति की नई लपटों का स्वागत किया गया था। इस महान यज्ञ की पावन स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है। कथा यह है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व प्रकृति की कोख से ज्वालामुखी फूट पडे थे, जिससे प्रकृति का कोना-कोना विनाश की लपटों में घिर गया था। इस घोर विनाश लीला को देख पितामह वरुण ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवों और दैत्यों को बुलाया गया।

दैत्यों की भूलों के लिए उन्हें लताड़ा गया और छल-कपट के लिए देवों की भर्त्सना की गई। सभी को उनके कर्तव्यों की याद दिलाकर ब्रह्मा ने राग-द्वेष छोडकर सद्व्यवहार की प्रेरणा दी। देवों और दैत्यों ने अपनी भूलों का प्रायश्चित किया और यज्ञ की लपटों में सारी ईर्ष्या, सारा स्वार्थ भस्म कर दिया और तभी फूटा स्नेह का अँकुर। रंग-गुलाल से सराबोर हो गया कश्यप का कुल और धरती के सभी लोग आनंद से सराबोर हो गए। सद्भाव और स्नेह के सागर में सारी सृष्टि डूब गई और प्रेम के रंगों की बौछारें पड़ने लगीं।

पूरे भारत में हर्ष और उल्लास से मनाया जाने वाला यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में विविधता लिए हुए है। दक्षिण में इसे कामदहन पर्व कहा जाता है। भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने की स्मृति में यह सम्पन्न किया जाता है। रत्नावली के अनुसार, मदनोत्सव कामदेव की आराधना का पर्व है, जिसे माघ की पूर्णिमा से पूरे पखवाडे मनाया जाता है। गुजरात में होली जलाने के बाद बची हुई राख से लडकियाँ गौरी की प्रतिमा बनाती हैं और उसका पूजन करती हैं। उडीसा में विवाहित स्त्रियाँ होली के दूसरे दिन लकडी की राख आदि साफ कर वहाँ अल्पना बनाती हैं। बिहार में पूर्णिमा की रात को होली जलाने की प्रथा है। इस होली के चारों तरफ हरा गेहूँ और चना आदि भूनकर खाया जाता है। फिर दूसरे दिन रंग खेला जाता है। बंगाल और उडीसा में भगवान कृष्ण की ढोलयात्रा निकालने की प्रथा है। पूर्वी बंगाल और चौबीस परगना में यह प्रथा विशेष तौर पर प्रचलित है। बंगाल के कुछ अन्य हिस्सों में होली के बाद एक व्यक्ति को विविध मनोरंजक वस्त्र आदि पहनाकर होली का राजा बनाया जाता है और गधे पर बैठाकर सारे गांव में घुमाया जाता है और फिर रंग उडाकर मस्ती की जाती है।

कारण और मान्यताएँ चाहे जो हों, होली का पर्व रंगों की रसीली प्रवृत्ति के साथ तन-मन को भिगोकर चित्त को शीतलता प्रदान करता है।
“अब आयो नवल बसंत
सखी ऋतुराज कहायो
बेनी माधव आयो
पुष्पकली सब फूलन लगी
फाग ही फाग रचायो”
दूसरी बौछार और भी मदमस्त कर देती है –
“या रसिया से मैं हारी
मारत मोरे नैनन में पिचकारी”
शायरों के रंग-बाण में और भी तीखी फुहार है। मीर तकी मीर के लफ़्जों  में
“जश्ने-नौरोज़े-हिंद होली है
राग ओ रंग और बोली होली है”
नज़ीर अकबराबादी ने फागुन की तस्वीर यूँ खींची है-
“जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
और ढप के शोर खडकते हों
तब देख बहारें होली की”
कवि नीरज के शब्दों में कहें तो –
“प्यार के बोल तो बोलें सभी पर
अब न वो प्यार की बोली रही है
कान्हा की छेड़ न छाड़ रही वो
रहने को सिर्फ ठिठोली रही है
रंग कहाँ पिचकारी कहाँ है
खाली गुलाल की झोरी रही है
फाग न वो अब राग न वो अब
होली न वो अब होली रही है“
होली में रस और रंगों की बहार- यह पर्व एक मान्यता ही नहीं, वरन् जीवन के सतत प्रवाहमयी चक्र के बीच खुशी की एक लड़ी है, जिसे गुनने और बुनने का सुअवसर इस विराट प्रकृति ने ही हमें दिया है। टेसू की टहनी जब फूल देती है तो शोख मखमली फूलों की रंगीन आभा से प्रकृति चमक उठती है। प्रकृति हमें भी कर्म की ऐसी खूबसूरत फलदाई प्रवृत्ति को अंगीकार करने की प्रेरणा देती है। जीवन की सुंदरता केवल कर्म में ही है और सत्कर्मों से सुखदाई फल प्राप्त करना हमारे अपने ही हाथों में है। तो आइए, इस वर्ष हम भी लौट चलें प्रकृति की ओर, हरे वनों को काटें नहीं, लकडियों को जलाएँ नहीं, अप्राकृतिक रंगों को छुएँ नहीं, एक-दूसरे पर कालिख मलें नहीं, वरन टेसू के प्राकृतिक रंगों के साथ, गुलाल की रंग-बिरंगी छटा के साथ, गुझिया की मिठास के साथ एक नई होली खेलें और रंगों से तन-मन को भिगोकर चित्त को शीतलता प्रदान करें।

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रीमा दीवान चड्ढा
301 , पायोनियर सन शाइन 2

के.टी. नगर ,काटोल रोड ,नागपुर

महाराष्ट्र – 440013

 

1 Response

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