रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘एक स्त्री की दिनचर्या’

एक स्त्री की  दिनचर्या

पिछले कई दिनों

लड़ाई चल रही है एक स्त्री और एक पत्नी के बीच

स्त्री ने कसम खाई है कि वह अपनी आत्मरक्षा, सम्मान के

लिए अब नहीं झुकेगी

पत्नी का दिल पिघलता है, वैसे ही जैसे पिघलता  आ रहा है

कई सालों से

अपने दर्द को छुपाकर हंसती जा रही है

अपनी  इच्छाओं, आत्मसम्मान को दांव पर लगाए जा रही है

पर अब वह टूटना नहीं चाहती,

वह खुद से कहती है कि

बहुत जी ली मैंने बेटी की तरह, बहन की तरह

पत्नी की तरह, माँ की तरह

अब मैं जीना चाहती हूँ  खुद के लिए भी

खुद के स्वाभिमान के  लिए, खुशी के लिए

अब नहीं झुकुंगी किसी के आगे

चाहे वह पति हो या बच्चे

या हो बॉस या फिर और कोई

रात बीत जाती है सोचते-सोचते

जैसे जैसे समय बीतता है दृढ़ निश्चय उतना ही

पक्का हो जाता है

पर जैसे जैसे उजली किरण

धरती पर पड़ती है

और सुबह की पौ जैसे ही खुलती है

वह केवल एक स्त्री नहीं रह जाती है

फिर पत्नी और माँ बन जाती है

झुकने का दौर फिर शुरू हो जाता है

मुस्कुराने का दौर फिर शुरू हो जाता है

मन में कशमकश चलता रहता है

पर पत्नी और माँ बनते-बनते दिनभर

कट जाता है

रसोई, काम, पढ़ाई

सब कुछ में बंट जाती है एक औरत

और फिर जैसे रात होती है

पूरा परिवार सो जाता है

वह फिर से माँ और पत्नी से

स्वयं के रूप में आ जाती है

और फिर जीने लगती है अपनी जिंदगी

देखने लगती है हजारों सपने

कुछ सपने तो अधूरे रह जाते हैं

और कुछ तो जैसे पंख पसार कर

आसमान में उड़ने लगते हैं

रात भर का सिलसिला चलने के बाद

फिर सुबह केवल वह एक औरत, पत्नी, माँ

बनकर जुट जाती है अपनी दिनचर्या में

———

नाम   :    रेखा श्रीवास्तव

जन्म :    1 नवंबर 1975

शिक्षा  :    बी.ए. (पास), कलकत्ता विश्वविद्यालय

कार्य :    ऑफिस सेक्रेटरी, प्रेसिडेंसी  विश्वविद्यालय, कोलकाता

मोबाइल :   9163958946

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