रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘पुरुष’

कविता लिखना है

सोच रही हूँ कि क्या लिखूँ

न जाने क्यों सबसे पहले

औरत, लड़की और उससे

जुड़े मामले ही मन में आते हैं

फिर सोचती हूँ कि बहुत लिखा

हमने औरतों पर,

बहुत चर्चा कर ली

हमने लड़कियों पर

उनकी आदतों पर, आचरणों पर

उनकी बंदिशों पर, उनके दायरे पर

 

अब मैं लिखना चाहती हूँ

उन पुरुषों पर

जो हमेशा हम से ही बने होते हैं पर

हमारे सपने को उनसे कम तौला जाता है

हमारे ओेहदे को उनसे कम माना जाता है

 

न जाने क्यों पति-पत्नी में पति

परमेश्वर हो जाता है

पर पत्नी  देवी नहीं हो पाती है

 

सींच-सींच कर पालती है माँ अपने बच्चों को

पर बच्चे पिता के ही कहलाते हैं

 

बहन हमेशा भाई से कमजोर क्यों होती है

बेटा-बेटी में भी कुछ वैसा ही है

बेटियों के लिए सीमा है, दायरा है

समय है,

और बेटा आवारा है फिर भी घर का लाडला है

क्योंकि वह लड़का है

चार लड़कियों के साथ घूमता है

अश्लील फिल्में देखता है

लड़कियों को छेड़ता है

परीक्षा में कम नंबर लाता है

घर देर से आता है

फिर भी वह अव्वल है

क्योंकि वह लड़का है

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