कविता हमें त्रासदी से बाहर निकालती है : मदन कश्यप

 राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के   ‘नागार्जुन-सम्मान’ से सम्मानित  कवि मदन कश्यप का कविता-पाठ

शहंशाह आलम की रिपोर्ट

 

 ‘गूलर के फूल नहीं खिलते’, ‘लेकिन उदास है पृथ्वी’, नीम रोशनी में’, ‘कुरुज’ और ‘दूर तक चुप्पी’ जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप की कविताओं का पाठ पटना में स्थित ‘टेक्नो हैराल्ड’ के सभागार में रखा गया। ‘पटना प्रगतिशील लेखक संघ’ के तत्वावधान में आयोजित इस महत्वपूर्ण कविता-आयोजन के मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे प्रसिद्ध कवि गंगेश गुँजन थे, अतिथि दिल्ली से पधारे कवि-आलोचक देवशंकर नवीन थे। अध्यक्षता समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि प्रभात सरसिज ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि राजकिशोर राजन किया और धन्यवादज्ञापन कवि शहंशाह आलम ने किया।

इस मौक़े को दो सत्रों में बाँटा गया। पहले सत्र में समकालीन कविता के स्थापित कवि मदन कश्यप की चुनिंदा कविताओं का पाठ और इनकी कविताओं पर टिप्पणी। दूसरे सत्र में पटना और आसपास के कवियों की कविताओं का पाठ। इस अवसर पर मदन कश्यप ने अपनी ‘भारत माता की जै’, ‘डपोरशंख’, ‘छोटे-छोटे ईश्वर’, ‘पुरखों का दुःख’, ‘अभी भी बचे हैं’, ‘उम्मीद’, ‘बहुरूपिया’, ‘काल-यात्री’ और ‘बिजूका’ शीर्षक आदि कविताओं का पाठ किया। कविता-पाठ से पहले मदन कश्यप ने समकालीन कविता पर बातचीत भी कि और कहा कि समय इतना बुरा आ गया है कि हम एक त्रासदी से निकलते हैं, तो कोई दूसरी त्रासदी हमें आकर घेर लेती है। सच यही है कि कविता हमें त्रासदी से बाहर निकालती है। मदन कश्यप की कविताओं के बाद गंगेश गुंजन, प्रभात सरसिज, अशोक, शेखर, देवशंकर नवीन आदि महत्वपूर्ण कवियों-कथाकारों ने उनकी कविताओं पर अपने विचारों को प्रकट किया।

इसके बाद कविता का दूसरा सत्र चला। इस सत्र का आरंभ युवा ग़ज़लकार रामनाथ ‘शोधार्थी’ के ग़ज़ल-पाठ से हुआ। उनका एक शे’र था :

बेचारगी  तुम्हारी  मियाँ  दो  दिनों  की  है,

जो बोलकर  गए  थे, वो घर पर नहीं मिले।

 

ग़ज़लकार समीर परिमल इन दिनों हिंदी ग़ज़ल को एक नया रास्ता दिखा रहे हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़ल सुनाते कहा :

दो  निवाले  तो  जाने  दे  अंदर,

हम  भी   हिन्दोस्तान   बोलेंगे।

 

वहीं कवि घनश्याम ने सुनाया :

क्षितिज की गोद में बैठा भकाभक लाल है सूरज,

अँधेरे  के   लिए  जैसे   कोई  भूचाल  है  सूरज।

 

शिवशरण जी कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने ‘कैसी है, ये हवा / अभी गिरा एक पत्ता’ सुनाकर ख़ूब वाहवाही लूटी।

 

हेमंत दास ‘हिम’ ने अपनी कविता में कुछ इस तरह से नया रंग घोला :

बहार वहाँ नहीं आती / इसलिए उसका जाना भी / उसे मधुमय-सा लगता है।

 

भागवत ‘अनिमेष’ ने अपनी कविता के माध्यम से बेटियों को बल और संबल देते हुए सुनाया :

धान रोपती बेटियाँ / सुंदरियाँ स्लेटियाँ / हर इक अपने मन की रानी / नहीं किसी की चेटियाँ।

 

शायर और कवि संजय कुमार कुंदन ने ‘कैट वॉक’ उनवान की अपनी नज़्म सुनाई :

ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक / कि जिसमें मुल्क के हर गोशे से / आएँ नुमाइंदे / हाथों में असलहे लेकर।

 

समकालीन कविता के बेहद ज़रूरी कवि अनिल विभाकर ने जीवन को कुछ यूँ प्रकट किया :

पूस में जब तक नहीं बनता पुसहा पिट्ठा / तब तक घर, घर जैसा नहीं लगता।

 

समकालीन कविता के एक और ज़रूरी कवि राजकिशोर राजन ने कविता के रहस्य को हटाते हुए सुनाया :

दूब को देखा मैंने ग़ौर से / और हथेलियों से सहलाता रहा / दूब तो दूब ठहरी / लगी थी पृथ्वी को हरा करने में निः शब्द।

 

कवि शहंशाह आलम ने हमारे संघर्ष और विरोध को संभालते हुए सुनाया :

सत्ताधीश के भेदिए को यह मालूम है / कि मुझे कुछ भी चुराने का मौक़ा मिलेगा / तो सबसे पहले आग को चुराऊँगा।

 

वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज की कविताएँ इंसानी ज़िन्दगी के एकदम क़रीब होती हैं। इंसानी ज़िन्दगी में जो लोग असन्तोष पैदा करते हैं, वे उनके ख़िलाफ़ खड़े दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से अपने इन्हीं ख़्याल को रखा :

अपनी उत्पत्ति के केंद्र सर ही / अपनी कीर्त्ति लेकर आए हैं लोक संहारक / अब अपनी यशःकीर्त्ति के गुण स्वयं गा रहे हैं।

 

डा. बी एन विश्वकर्मा, कुंदन आनंद, प्रभात कुमार धवन, संजीव कुमार श्रीवास्तव आदि ने भी अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया।

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