अंधेरे होते समय में उम्मीद की किरण है ‘काठ में कोंपल’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

लंबी कहानी को निभाना बहुत कठिन होता है लेकिन अगर कहानीकार का नाम रमेश उपाध्याय हो तो फिर कुछ भी असंभव नहीं है। अपनी नई कहानी ‘काठ में कोंपल’ में रमेश जी ने यह चमत्कार कर दिखाया है। 6 अप्रैल को गांधी-शांति प्रतिष्ठान, आईटीओ में ‘कथा-कहानी’ की मासिक गोष्ठी में रमेश जी ने इसी कहानी का पाठ किया। करीब डेढ़ घंटे तक चले कहानी पाठ ने श्रोताओं को बांधे रखा। 
‘काठ में कोंपल’ लगातार बिगड़ते माहौल में उम्मीद की कहानी है। कहानी 2 हिस्सों में है। कहानी के पहले भाग की सूत्रधार समीरा ख़ान हैं तो दूसरे भाग की उसकी बेटी दीक्षा। करीब 30 साल के लंबे कालखंड को समेटे यह एक व्यापक फलक की कहानी है। और कमाल यह कि इस बड़े कालखंड के दौरान सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक स्खलन की हर एक बारीकी पर कथाकार की पैनी नज़र है। कहानी में 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन के हश्र की विवेचना है तो मौजूदा समय में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर समाज को खंडित करने की साज़िश की गहरी पड़ताल भी।
कहानी कई अहम मुद्दे उठाती है मसलन विश्वविद्यालयों की अंदरूनी पॉलिटिक्स, सोवियत संघ के विघटन से कम्युनिज्म की दुनिया में उभरी शून्यता, वामपंथ को बचाने के लिए समर्पित और प्रतिबद्ध कम्युनिस्टों की छटपटाहट, आधुनिकता और व्यावहारिकता के नाम पर नई पीढ़ी का लगातार पतनशील होते जाना (कहानी का एक किरदार मयंक नई पीढ़ी के इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और विडंबना है कि युवा पीढ़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी वर्ग में शामिल है), लगातार बढ़ता सांप्रदायिक विद्वेष, किसानों की समस्या आदि। मैं यहां सब पर बात नहीं करूंगा, केवल एक का जिक्र करूंगा, जो पूरी कहानी में शुरू से अन्त तक मौजूद रहा है और श्रोताओं ने इसे शिद्दत के साथ महसूस किया। और वह है मुसलमान होने का डर।
एक ऐसे वक्त में जब विवेक और तर्क के साथ लिखने वाले हर व्यक्ति को मानो दो अदृश्य आंखें हरदम घूर रही हैं, रमेश जी ने कहानी में इस समस्या को जिस प्रभावी ढंग से उठाया है, वो ना केवल काबिल-ए-तारीफ़ है बल्कि साहस का भी काम है। सच्चा लेखक तो वही है, जो बिगड़ते वक्त के सामने तनकर खड़ा हो जाता है। 
समीरा ख़ान की शादी प्रणव से होती है, जो उसका प्रोफेसर भी था। हिन्दू लड़का और मुस्लिम लड़की। धर्मांधता के ज़हर का दंश यह दंपति किस तरह झेलता है, इसका जो चित्रण कहानी में है, वह ना केवल मर्मांतिक है, बल्कि रोंगटे भी खड़े कर देता है। ऐसा लगता है कि यह घटना अपने आसपास ही घट रही है क्योंकि हम हर रोज ऐसी घटनाओं से रूबरू हो रहे हैं, जहां मुसलमान होना अपराध मान लिया गया है। जब मजहब किसी की ज़िन्दगी को जोखिम भरा बना दे और वह भी इसलिए कि कुछ लोग केवल सत्ता से चिपके रहने के लिए इसे बढ़ावा दे रहे हैं, तो उससे ज्यादा भयावह समय और क्या हो सकता है। नफरत का यह ज़हर इस ढंग से फैलाया जा रहा है कि आप महसूस भी नहीं कर पाएंगे कि आपका कोई पुराना दोस्त, दफ्तर का पुराना साथी कब हिन्दू और मुसलमान बन गया। साजिशें दोनों तरफ है लेकिन जो बहुसंख्यक हैं जाहिर है वह यहां भी आगे ही है।
समीरा हर वक्त इसी दहशत में जीती रहती है कि हिन्दू बाप और मुस्लिम मां की बेटी दीक्षा का पता नहीं क्या होगा। समीरा मां है, इसलिए दीक्षा के पैदा होने के बाद मुसलमान होने का डर उसके अंदर लगातार बढ़ता ही गया। वरना प्रणव से शादी का साहसिक फैसला तो उसका अपना भी था। उसके अंदर यह डर इसलिए लगातार बड़ा होता गया क्योंकि समाज में हर रोज़ इस डर को बड़ा बनाने का गंदा खेल चलता रहा और यह आज बदस्तूर जारी है। 
बिम्ब के जरिए रमेश जी ने अपनी बात किस प्रभावी ढंग से रखी है, वो भी देखिए। प्रवीण और समीरा के घर के पिछवाड़े जामुन का एक पेड़ था। तमाम कोशिशों के बावजूद वह सूखता जा रहा था और एक दिन जब तेज़ आंधी आई, वह पेड़ गिर पड़ा। बीमारी का पता भी तभी चला। पेड़ का जो हिस्सा दीवार की ओट में था और दिखता नहीं था, उस हिस्से में दीमक लग गया था। उनका बढ़ई रामकुमार पेड़ को काटता है लेकिन जड़ को बचा लेता है। उसका कहना था कि अगर जड़ बचा रहा तो इस काठ में कोंपल जरूर आएगी। यह आम आदमी का विश्वास है। इस देश के आम आदमी का। वो जानता है सांप्रदायिकता का दीमक चाहे समाज को कितना भी खोखला करने की कोशिश क्यों न करे, कामयाब वह कभी नहीं होगा। इस देश में लोकतंत्र, प्रेम, भाईचारे की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि यह पेड़ कभी खत्म नहीं हो सकता। ‘काठ में कोंपल’ अंधेरे होते समय में उम्मीद की किरण है।

 

कहानी पढ़ने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें

https://literaturepoint.com/kath-mein-konpal-short-story-by-ramesh-upadhyaya/

You may also like...

Leave a Reply