ऋचा साकल्ले की पांच कविताएं

 काश!  सूरज की जुबान होती

काश सूरज की जुबान होती
वो बताता हमको
प्रकृति नहीं करती अंतर
उसने दिया है सबको अपना-अपना वजूद
वो बताता हमको
इंसान की परिभाषा में
जितना पुरुष है शामिल उतना स्त्री भी है शामिल
न कोई प्रथम, न कोई द्वितीय
दोनो अद्वितीय
न कोई बड़ा, न कोई महान
दोनों बराबर, बस इंसान

दया, ममता, करुणा, सेवा
विश्वास, आत्मविश्वास, सहनशीलता
आक्रामकता और लज्जा
हर एक के पास
बस, बराबर-बराबर

जी हां सूरज की जुबान होती तो वो बताता हमको
एक जननी तो एक जनक
मतलब ये नहीं
एक कमज़ोर तो एक ताकतवर

वो बताता हमको
प्रकृति के उपहार का उड़ाओ मत उपहास
आखिर सदियों से ये ख्याल ही तो है हमारा
राम पेड़ पर चढ़ता है, हवाई जहाज से खेलता है और,
कुसुम पानी लाती है, गुड़ियों से खेलती है

हां यदि वो बोलता तो शायद
चीख-चीखकर कहता हमसे
क्या बदल नहीं सकते तुम अपने ख्याल
मैं अकेला देख रहा हूं
सदियों से ये झंझावत
कहीं इससे पहले मैं हो जाऊं
निस्तेज, निष्प्राण
कोई तो आओ
एक बार, एक साथ
एक पल के लिए
और दे दो प्रकृति के निर्णय को सार्थकता
नहीं है नर नारी में कोई भी भगवान
दोनों एक समान, बस इंसान

मैंने चुना सूरज को बोलने के लिए
मैं चुन सकती थी चांद भी
पर शायद चांद अंधेरे की गफलत में खो जाता
शायद कह देता ऊलजुलूल
लेकिन सूरज है संपूर्ण प्रकाश के साथ
देख रहा है शाश्वत सत्य
इसीलिए…काश उसकी ज़ुबान होती
वो बताता हमको
सिर्फ सत्य

मैं और मैना….

पिंजरे में बंद मैना
मुझे अपने जैसी लगती है
पर काट दिए हैं उसके
उड़ने से रोक दी गई है वो
शिकारी मदमस्त है
मैना की हार, अपनी जीत पर मस्त है

लेकिन मैना,
वो मन ही मन हंसती है
शिकारी के जैसे भ्रम नहीं पालती वो
यूं उसने पिंजरे को घोंसला मान लिया है
शिकारी के इशारों पर नाचना सीख लिया है
मगर पिंजरे के भीतर से
जब भी खुले आसमान को देखती है
मन ही मन कहती है आ रही हूं मैं…
लौट रही हूं तुम्हारे दामन में पंख पसारने…

भरोसा पक्का है उसका
कि, एक दिन आएगा
शिकारी पिंजरा बंद करना भूल जाएगा
उड़ान तो भर ही लेगी वो…
पिंजरे में बंद मैना मुझे अपने जैसी लगती है

मैं अपनी राह में पानी बन जाना चाहती हूं’

पानी की राह में  जब भी आया ‘पत्थऱ’
पानी न रुका ,न थमा, न उसने अपनी राह छोड़ी
न ही उसने ‘पत्थर’ को हटाने के जतन किए
चुपचाप बिना कुछ कहे निकाल लिया रास्ता
नई राह पर फिर चल पड़ा आगे

राह नई….नया पत्थर
पानी नहीं बदला
वो बदले भी क्यूं?
पत्थर-पत्थर है…पानी-पानी है

मैं अपनी राह में पानी ही बन जाना चाहती हूं
मैं अपनी राह में मेरे बहाव को एक अवसर देना चाहती हूं…..

भारत मां

हां
हर रक्तपात से लथपथ है वो
हर गर्भपात से बहता है उसके वक्षस्थल से रक्त
भेदभाव, असमानता और बलात्कारों से छलनी है उसकी योनि
हत्या, लूटपाट और झूठ के बवंडर में टूट गई है उसकी रीढ़
तिरंगे में लिपटे हर शहीद को देख अवसाद में है वो
धर्म के नाम पर दंगे फसाद, गोलीबारी से आहत है उसका दिल
और आप कहते हैं वो आपकी मां है, भारत मां
क्यों झूठ बोलते हैं आप?

तलाश

तुम सवाल मत पूछो
जिज्ञासा पर मेरा हक़ है
तुम बहस मत करो
तुम्हारी बहस मुझे पशुता के लिए प्रेरित करती है
बुद्धिहीन रहो,बुद्धिशील तो मैं हूँ
तुम चिल्लाओ मत
लिजलिजी सी रहो
चिल्लाना तो मेरी शान है
तुम ज़ोर से मत हँसो
तुम्हारी हँसी के नाद से फट सकते हैं शास्त्र और पुराण
ठहाकों पर तो मेरा वर्चस्व है
तुम लड़ो भी मत
लड़ाइयाँ सदियों से मैंने जीती हैं
यक़ीन मानो लड़ोगी तो हार जाओगी
तुम बस मूर्ख, भावुक सी बनी रहो
तभी मिल सकता है तुम्हें मेरा प्यार
मेरा प्यार चाहिए तो ‘औरत’ सी रहो
लेकिन,
मेरे ए दोस्त, मेरे हमदम
तुम्हारी हर शर्त से है मेरा इनकार
मैंने चुन लिया है अनजान पथ
निकल पड़ी हूँ मैं अकेली
तुम्हारी शर्तों से दूर…बहुत दूर
उस कोने की तलाश में जहाँ इंसान बसते हैं…

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2 Responses

  1. M.d.s.ramalaxmi says:

    Very nice beauitiful

  2. बेहतरीन। भावपूर्ण।

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