रोहित ठाकुर की 5 कविताएं

रोहित ठाकुर

 आखिरी दिन   

आखिरी दिन

आखिरी दिन नहीं होता

जैसे किसी टहनी के आखिरी

छोर पर उगता है हरापन

दिन की आखिरी छोर पर

उगता है दूसरा दिन

आज व्यस्त है शहर

शहर की रोशनी जहाँ

खत्म हो जाती है

वहाँ जंगल शुरू होता है

आज व्यस्त है जंगल भी

किसी जंगली फूल का

नामकरण है आज

जंगल से रात को लौट कर

कल सुबह शहर के

जलसे में शामिल होना है

दिन की व्यस्तता ही

एक पुल है जो जोड़ती है

एक वर्ष को दूसरे वर्ष से    ।।

जीवन

एक साइकिल पर सवार आदमी का सिर

आकाश से टकराता है

और बारिश होती है

उसकी बेटी ऐसा ही सोचती है

वह आदमी सोचता है कि उसकी बेटी के

नीले रंग की स्कूल – ड्रेस की

परछाई से

आकाश नीला दिखता है

बरतन मांजती औरत सोचती है

मजे हुए बरतन की तरह

साफ हो हर

मनुष्य का हृदय

एक चिड़िया पेड़ को अपना मानकर

सुनाती है दुख

एक सूखा पत्ता हवा में चक्कर लगाता है

इसी तरह चलता है जीवन का व्यापार    ।।

गोली चलाने से फूल नहीं खिलते

गोली चलाने से पलाश के फूल नहीं खिलते

बस सन्नाटा टूटता है

या कोई मरता है

तुम पतंग क्यों नहीं उड़ाते

आकाश का मन कब से उचटा हुआ-सा है

तुम मेरे लिए ऐसा घर क्यों नहीं ढूंढ़ देते

जिसके आंगन में सांझ घिरती हो

बरामदे पर मार्च में पेड़ का पीला पत्ता गिरता हो

तुम नदियों के नाम याद करो

फिर हम अपनी बेटियों के नाम किसी अनजान नदी के नाम पर रखेंगे

तुम कभी धोती-कुर्ता पहनकर तेज कदमों से चलो

अनायास ही भ्रम होगा दादाजी के लौटने का

तुम बाजार से चने लाना और

ठोंगे पर लिखी कोई कविता सुनाना   ।।

बसें

कितनी बसें हैं जो छूटती हैं

इस देश में

कितने लोग इन बसों में चढ़ कर

अपने स्थान को छोड़ जाते हैं

हवा भी इन बसों के अंदर पसीने में बदल जाती है

इन बसों में चढ़ कर जाते लोग

जेल से रिहा हुए लोगों की तरह भाग्यशाली नहीं होते

ये लोग मनुष्य की तरह नहीं सामान की तरह यात्रा में हैं

ये लोग एक जैसे होते हैं

मामूली से चेहरे / कपड़े / उम्मीद के साथ

जिस शहर में ये लोग जाते हैं

वह शहर इनका नाम नहीं पुकारता

भरी हुई बसों में सफर करता सर्वहारा

नाम के लिए नहीं मामूली सी नौकरी के लिए शहर आता है

ये बसें यंत्रवत चलती है

जिसके अंदर बैठे हुए लोगों के भीतर कुछ भींगता रहता है

कुछ दरकता सा रहता है  ।।

चाँद पर गुरुत्वाकर्षण बल कम है 

इस धरती पर देखो

कितना गुरुत्वाकर्षण बल है

इसे तुम विज्ञान की भाषा में

नहीं समझ सकते

कितने लोग हैं जिनकी चप्पलें

इस धरती पर घिसती है

कितने लोग हैं जो पछाड़ खा कर

इसी धरती पर गिरते हैं

कितने लोग हैं जिनके बदन से छीजता

पसीना इस धरती का नमक है

कितने लोग हैं जो थक कर चूर हैं

और इस धरती पर लेटे हुए हैं

कितने लोग हैं जो इस धरती

पर गहरी चिंता में डूबे हैं

वे जो प्रेम में हैं

और वे जो घृणा में हैं

इसी धरती पर हैं

कितने लोग हैं जो

आशाओं से बंधे हैं

कितने लोग हैं जो

किसी की प्रतीक्षा में हैं

इस धरती का जो

गुरुत्वाकर्षण बल है

यह इन सबका ही

सम्मिलित प्रभाव है    ।।

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