नदी पर रोहित ठाकुर की 4 कविताएं

रोहित ठाकुर
जन्म तिथि – 06/12/ 1978
 
शैक्षणिक योग्यता  –   परा-स्नातक राजनीति विज्ञान,
विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित, 
विभिन्न कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ 
 
 वृत्ति  –   सिविल सेवा परीक्षा हेतु शिक्षण  
 
रूचि : – हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य अध्ययन 
 
पत्राचार :- जयंती- प्रकाश बिल्डिंग, काली मंदिर रोड,
संजय गांधी नगर, कंकड़बाग , पटना-800020, बिहार 
 
मोबाइल नंबर-  7549191353
 

ई-मेल पता- rrtpatna1@ gmail.com

 

एक

नदी को देखना 

नदी को जानना नहीं है 

नदी को छूना 

नदी को पाना नहीं है 

नदी के साथ संवाद 

नदी की तरह भींगना नहीं है 

नदी की तरह होने के लिये 

नदी के उद्गम स्थल तक पहुंचना नहीं है 

सड़क पर और किसी गली में 

नदी की तरह बहा जा सकता है 

नदी की जिजीविषा लेकर    ।।

दो

नदी सो रही है 

रेत पर 

भींगती हुई 

खाली पाँव 

वह मजदूर लड़की 

भी एक नदी है 

खेत में खोई है 

भींग रही है ओस से 

एक भींगती हुई नदी 

एक भींगती हुई लड़की 

हमशक्ल हैं 

हँसती हुई वह लड़की

इस समय 

एक बहती हुई नदी है   ।।

तीन

पिता ने कहा था 

अपने कठिन दिनों में 

 कुछ मांगना नहीं 

बिलकुल नदी की तरह 

 

नदी और तुम दोनों 

एक ही गोत्र के हो 

तब से मैंने शामिल किया 

नदी को अपने जीवन में 

 

और बाँटता रहा

उसके साथ अपना लेमनचूस 

पर नदी के स्वाद को नहीं जान सका 

मैं जी लूंगा ऐसे संशय के साथ 

 

नदी ने मेरे अंदर नहीं भरी रेत 

इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ 

रेत न होना नदी होना है 

पिता ने कहा एक दिन     ।।

 

चार

वह नदी चाँद पर बहती है 

किसी खाई में    

वह नदी 

धरती पर बहने वाली 

किसी पठारी नदी की जुड़वा है 

वह पठारी नदी जब गर्मियों में हाँफती है 

वह नदी जो चाँद पर बहती है 

उसकी आँखों से झड़ते है आँसू

और तारे टूटते हैं 

मैं तारों को टूटते देखता हूँ 

तारों का टूटना 

दो नदी का मिलना है 

मेरी कविता में 

नदी ऐसे ही मिलती है 

जब नदी मिलती है 

उसकी वनस्पतियों का रंग अधिक 

हरा हो जाता है  

यहीं से लेता हूँ मैं हरापन

उन लोगों के लिये 

उस पेड़ के लिये 

जहाँ फैल रहा है पीलापन     ।।

पांच

 

 

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1 Response

  1. Rahul says:

    Rohit thakur. Excellent

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