रोहित कौशिक की पांच कविताएं

चुप है  किसान
खेत में
हल जोतता  किसान
और तैयार बगुलूे
चुनने को कीड़े-मकोड़े
कीड़े-मकोड़े/जो मिटा सकते हैं
बगुलों की भूख
और हानिकारक हैं फसल के लिए
इसलिए चुप है  किसान
इसी व्यवस्था के बीच
बगुलों का भोजन बन रही है
केंचुओं की जमात भी।
और अब किसान मजबूर है
चुप्पी साधे रहने के लिए।
साहब का मूड
मूड ठीक नहीं है साहब का
इसलिए मजूरी मांगने की हिम्मत
नहीं कर पाएगा कल्लन
भूखे ही सो जाएंगे बच्चे
दवाओं के अभाव में
दम तोड़ देगी बूढ़ी मां
मूड  ठीक नहीं है
मूड ठीक करने
लायी जाएगी गरीब  की ही बेटी
मूड ठीक नहीं रहता
जब चार-पांच दिन बाद
आते हैं साहब ऑफिस।
और आज मूड ठीक  नहीं है साहब का
क्योंकि पसीने की  दो-चार बूंदों से
कुछ भीग सा गया है बनियान
अमीरों का मूड अधिकतर ठीक नहीं रहता
क्योंकि गरीबों का मूड अधिकतर  ठीक रहता है।
अन्तर
दिल और कलेजे  में
अन्तर है इतना
कि  टूटता है दिल
और फटता है कलेजा।
गांव से गांव गायब है
कोल्हू का  बैल
गायब है कोल्हू से
गन्ने से गायब है रस
गुड़ से वो मिठास गायब है
जैसे गायब है बोलचाल से मीठापन।
नीम नीचे से चौपाल गायब है
गायब है हुक्के की गुड़गुड़ाहट
गुड़गुड़ाहट से निकलता
सहकारिता का संगीत गायब है
लोक से गीत गायब है।
गायब है नुक्कड़ से पनघट
हवा से गायब है खुशबू
जिंदगी की छत से
गायब हैं मेल-मिलाप की कड़ियां
प्यार की धरती से
गायब है विश्वास की गोबरी
मिट्टी से गायब है सोंधापन।
गायब है रोटी और साग से
मिट्टी के चूल्हे की गर्माहट
चूल्हे के पास
परिवार संग मिल-बैठ
खाने का रिवाज गायब है।
उमंग और उल्लास की  नदी से
गायब है कागज की नाव।
होने और गायब होने के बीच से
जो गायब नहीं होना चाहिए था
वह सबकुछ गायब है
इसीलिए तो
गांव से गांव गायब है।

युद्ध

तब भी, जबकि किसी भी हाल में
टाला न जा सके
युद्ध वीरता का प्रमाण पत्र नहीं है
युद्ध इंसानियत की सबसे बड़ी हार है।
तमाम जरूरतों के बावजूद
युद्ध महाविनाश की क्रूरतम लीला है
सिर्फ इतिहास में दर्ज होने के लिए
लड़े जाते हैं युद्ध
लेकिन इतिहास में दर्ज नहीं होती चीखें
इतिहास में दर्ज होते हैं
बन्दूक, तोप, तलवार, गोला और बारूद।

यानी जिस इतिहास से
हमें पढ़ाया जाता है
वीरता का पाठ
वह बारूद का इतिहास है
कि हमारे अन्दर
पैदा होता रहे बारूद
जरूरत पड़ने पर बारूद में
कभी भी लगाई जा सकती है आग।

युद्ध में दर्ज होती हैं शौर्य गाथाएं
दर्ज नहीं होता
मांओं-पिताओं, बेटे-बेटियों और विधवाओं का दुख
राजा कहते हैं
कि हम दुख से पार पाने को
लड़ रहे हैं बहुत जरूरी युद्ध
मगर युद्ध खोद देता है एक और दुख की नींव
इस नींव में दबकर दफन हो जाती है
शौर्य गाथाएं सुनती हुई जनता।

लम्बी होती राजाओं की नाक
लड़ती है अहम् का दंगल
मगर दंगल की धूल ही
गिर जाती है प्रजा की आँखों में।
शायद यहीं से निकला हो
आँखों में धूल झोंकने का मुहावरा।
धीरे-धीरे दंगल की धूल
जम जाती है
प्रजा की श्वसन नलियों में
घुटने लगता है प्रजा का दम
और इस तरह कट जाती है
राजाओं की नाक।

राजा दंगल के अखाड़े में
ढूंढते टरहते हैं
अपनी कटी हुई नाक
इसलिए उन्हें प्रजा की आँख में आँसू
देखने की फुरसत नहीं मिलती।
उन्हें नहीं पता
कि आँख और नाक के बीच
होता है गहरा सम्बन्ध
कि साफ दृष्टि से ही
बचाई जा सकती है अपनी नाक।

जब तक नाक है
लड़े जाते रहेंगे युद्ध
‘नाक में दम’ जैसे मुहावरे
चिरस्थायी बने रहेंगे
युद्धोन्माद पैदा करने वाले बयानबहादुरों
लड़ने का इतना ही शौक है
तो पहले अपनी नाक से लड़ो
लड़ो कि नाक अपनी हद में रहे
कि लाशों की बदबू झेलने के लिए नहीं
प्रेम की खूशबू सूँघने के लिए बनी है नाक

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