सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविता ‘रोटियों के हादसे’

एक मरियल कुत्ता
और एक मरियल आदमी
कूड़ेदान में पड़ी
एक सूखी रोटी के लिए
झगड़ पड़े।

कुत्ते ने कहा–
मैंने देखा है पहले
हक मेरा बनता है।

आदमी चिल्लाया–नहीं!
नहीं कर सकते तुम
उल्लंघन
मानवाधिकारों का
रोटी पहले मैंने देखी है
इस पर मेरा
अधिकार बनता है।

आदमी ने समझाया–
देखो, माहौल में
तनाव तैर रहा है
सांप्रदायिक उन्माद में
आदमी
एक दूसरे को मारने
दौड़ रहा है
फिर
तुम क्यों तुले हो
और दो संप्रदायों को
दुश्मन बनाने पर
आदमी और कुत्तों को
आपस में लड़ाने पर।

कुत्ता गुर्राया–
हम संप्रदायमुक्त जीव हैं
विभक्त नहीं हम
तुम्हारी तरह
हम कुत्ते हैं
तो सिर्फ कुत्ते हैं
और कुछ नहीं
तुम आदमी हो
तो सिर्फ आदमी नहीं
हिंदू हो, मुसलमां हो,
सिख हो, ईसाई हो,
ब्राह्मण हो, भूमिहार हो,
अहीर हो, कहार हो।
अगर शर्म है तुम्हें
आदमी होने का
तो समझो
शेष है अभी कुछ
आदमियत तुममे।

अभी आदमी
सोच रहा था कोई जवाब
कि
सूखी रोटी पर पड़े
खून के कुछ छींटे
फिर पड़े
फिर पड़े
देखते-देखते
रोटी सन गई खून से।

कुत्ता घिघियाया–
मुझे समझा रहे थे
अब इन्हें समझाओ
आदमी को
आदमी से बचाओ

अगर नहीं समझा सकते इन्हें
तो फिर खाओ
खून से सनी यह रोटी

हम कुत्ते नहीं खाते
खून से सनी रोटियां
हम कुत्ते नहीं खाते
दंगे की आग में
सेंकी गईं रोटियां
यह चलन तुम्हारा है
तुम्ही निभाओ
श्मशान में बैठकर
खून से सनी रोटियां खाओ।

कुत्ते का जाना
उसे अखरा
दंगे की खबर
अकेलेपन के एहसास
और मौत की आशंका से
वह बहुत डरा
उसने तिरछी आंखों से देखी
खून से सनी रोटी–
खाये या न खाये?
पेट की जगह
अब दिमाग में मरोड़ था

नहीं! नहीं !!
नहीं खायेगा वह
खून से सनी रोटी।
भूखा सो जायेगा
या
भूखा ही कत्ल ही कर दिया जायेगा
लेकिन नहीं खायेगा वह
खून से सनी रोटी।

किसी साजिश के तहत
कोई रोज छीन लेता है
उसकी रोटी
कभी महंगाई के बहाने
कभी दंगे के बहाने
तो
कभी इसके विरोध में आयोजित
आंदोलन के बहाने।

छीन ली गई रोटी को
उसने देखा
फिर एक बार।

तभी एक हठ्ठा-कठ्ठा
आदमी आया
हां! वह आदमी जैसा ही दिखता था
उसकी ओर देखा
मुस्कुराया
और
खून से सनी रोटी उठाकर
आगे बढ़ गया।


लिटरेचर प्वाइंट से शीघ्र प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह ‘रोटियों के हादसे’ से

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