मनोज मंजुल की कहानी ‘रूबी की मां’

मनोज मंजुल

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रूबी की माँ काफी परेशान है, उसका मन भारी-भारी है, चिंता से उसके चेहरे पर जो रेखाऎं उभर आईं हैं वे काफी गहरी दीख रहीं है. वह उस खतरे के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहती, पर मन है कि बार-बार वहीं जाकर अटक जाता है. अन्दर ही अन्दर एक लहर-सी उठती है और वह काँपने लगती है, घबराहट के मारे चेहरे पर पसीने की बूँदें जमा हो गईं हैं, फिर भी वह संयत है. वह नहीं चाहती कि रूबी उसकी इस स्थिति को समझे क्योंकि यदि वह कमजोर पड़ गई तो सबकुछ बिखर जायेगा. इसलिए वह भय के भाव को प्रकट नहीं होने देना चाहती. उसके सामने आने से पूर्व वह चेहरे को अच्छी तरह साफ कर लेती है. आईने में मुखरा इधर-उधर घुमाकर वह परख लेती है और फिर बनावटी मुस्कान के साथ अवतरित होती है.

रूबी भी माँ को देखकर मुस्करा उठती है, यद्यपि उसकी मुस्कान भी ऊपर ही ऊपर तैर रही है. उसके भी अन्दर के आकाश में भय का बादल पसरा हुआ है, जिसे वह जज्ब करने की कोशिश कर रही है.

पर माँ की नजर तो पारखी होती है. वह उसके हर मनोभाव को पलभर में समझ लेती है, फिर भी वह इस मामले पर चर्चा करना नहीं चाहती. वह अनबूझ की तरह उससे बातें करती है. वह उससे तैयार होने को कह रही है.

वह माँ के ‘तैयार होने’ कहने का मतलब अच्छी तरह समझती है. तैयार होने का मतलब केवल तैयार होना ही नहीं, बल्कि पूरी तरह तैयार होना है.माने, खतरे के प्रति सचेत होकर उससे मोर्चा लेने के लिये तैयार होना. मिर्ची पाउडर की डिब्बी, तीखी गंध का स्प्रे इत्यादि को संभाल कर रख लेना, टाइगर सर के बताये नुस्खे एवं तरीकों के उपयोग के लिए स्वंय को तैयार कर लेना, ताकि अवसर पाते ही इनका प्रयोग किया जा सके.

माँ जानती है बेटी को बुद्धिमान व होशियार बनाने का अर्थ…. अर्थात संकट की स्थिति में बिना घबराये उससे उबरने की कोशिश करना. जो भी हो डर के मारे रोजमर्रा की जिन्दगी तो रूक नहीं सकती, कॉलेज तो जाना ही पड़ेगा…. ट्यूशन तो छोड़ा नहीं जा सकता. यदि कॉलेज जाना वह छोड़ देगी तो पढ़ाई कैसे पूरी करेगी….? उसकी आँखों के सामने शून्य तैरने लगता है….. शून्य में वह बेटी को कैसे छोड़ सकती है…? एक दिशाहीन पथ पर…   ….. बिल्कुल अनजान  ……अलग रास्ते पर…..  वह अपने दायित्व को कैसे समझेगी ? यह भी तो मर जाना ही है. इससे अच्छा तो लड़कर ही मरे…

जब रूबी की माँ छोटी थी तो उसने देखा था अपनी माँ को…. वह उसका कैसे ख्याल रखती थी? कैसे लालन-पालन करती थी ? विशेष कर समस्या के वक्त…. छोटी-मोटी परेशानियों का तो वह पिता को बिना बताये ही हल कर लिया करती थी. यह वह समय था जब बेटियों का पिता से घुलना-मिलना कम होता था, ज्यदातर बेटियां माँ के पास ही अधिकांश समय गुजारा करती थीं. माँ ने ही हर छोटी- बड़ी बातें उसे सिखाई थी. अपनी समझभर शिक्षा दिलवाई थी. …..और आज जब वह स्वंय माँ बन गई है तो वह अपने उत्तरदायित्व को कैसे भूल सकती है ?  उसे भी तो अपनी बेटी को तैयार करना है, उसे ज्ञानबोध कराने हैं, उसके हौसले को पंख लगाने हैं. यदि पहले ही रोंयां बिखर गया तो वह उड़ान कैसे भरेगी ?

घर में पिता नहीं हैं। पिता का बहुत पहले ही देहांत हो चुका है, माँ ही माता-पिता दोनों हैं. दोनों की जिम्मेवारी अकेली ही वह निभाती आई है. नाते-रिश्तेदार हैं, लेकिन उनका होना या न होना, बराबर ही हैं. जब पिता थे तब उनका व्यवहार कुछ और था… उनके न रहने पर कुछ और हो गया है. सब–कुछ बदल-बदल सा गया है.

परिवार में दो ही जने हैं –माँ और बेटी. बेटी की आँखों में सपना है, उम्मीद है…  उसकी उँगली हमेशा मंजिल की ओर होती है. माँ उस मंजिल की ओर जानेवाले रास्ते को ढ़ूंढ़ती है, वह उसे साफ करती है, कंकड़, पत्थर हटाती है.

उसे पता है उस हर एक बाधा के बारे में जिसे रूबी के रास्ते में आने की संभावना है. वह उसे हमेशा सावधान करती रहती है. छोटी-मोटी बाधा का समाधान तो उसके पास होता ही है, पर कभी-कभी मुश्किलें बड़ी होती हैं, जिनके बारे में वह नहीं जानती कि इनका हल कैसे निकलेगा ?

आज वे दोनों कुछ ऎसी ही मुश्किलों से गुजर रहीं हैं. घर से निकलकर वे गली में आतीं हैं, कुछ दूर चलने पर चौड़ी सड़क मिलती है जहाँ पर ऑटो खड़ी है और वे उस ऑटो से कॉलेज मोड़ पहुंचती हैं. फिर शुरूआत होती है परेशानी की घड़ी की. लगभग चार सौ मीटर की सूनसान सड़क, जहां दो-चार लड़कों का एक झुंड, जो अक्सर रूबी  का पीछा करता है,उसे परेशान करता है.

कई दिनों तो वह बचकर निकल आती है, लेकिन रोज-रोज बचना मुश्किल-सा हो गया है. अब उसे यह कठिन लगने लगा है. पता नहीं क्या हो जाय ?  कोई अनहोनी घटना जिसका परिणाम भयावह हो…  मन में हमेशा डर बना रहता है.

उसने चाचा से कहा था, पर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, वह रूबी और उसकी माँ को कभी गंभीरता से से नहीं लेते.  वह उन्हें एक भार समझते हैं. कोई भी बात हो … उनके मुँह से पहले ‘ना’ निकलती है जैसे पहले से ही तय हो. उसके बाद वह सुनते हैं….  और सुनने के बाद फिर मौन हो जाते हैं.

इस बार उन्होंने ‘ना ’ तो नहीं कहा, पर कुछ दिनों तक वह टालते जरूर रहे, फिर एक दिनों रूबी पर ही बरस पड़े,“क्या जरूरी है रोज- रोज कॉलेज जाना… , कुछ दिन जाना बन्द कर दो, वे खुद ही हट जाएंगे…. वे बदमाश बच्चे हैं.. उनसे झगड़ा लेना ठीक नहीं”.

वह मामा से भी कहती है, पर उन गुंडों से उलझना उनके बस का नहीं….

वे इसे अन्य तरह से सुलझाने का उपाय खोजती हैं .. पर किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पातीं. कभी-कभी उनके मन में यह भी आता है कि क्यों न पुलिस वाले को कहा जाय… पुलिस चाह ले तो एक दिन में समस्या दूर कर सकती है.

यह तो सौ आने सत्य है, यदि पुलिस चाह ले तो सारी समस्या का हल निकला सकता है… पर मुश्किल है उन पर भरोसा करना.  आये दिन उनकी काली करतूतें अखबारों में छपती रहती हैं.

माँ और बेटी दोनों तो औरतें ही हैं.  ….और पुलिस वाले….  अधिकांशत: पुरूष हैं …. पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा हो ?

पड़ोसियों से भी इस बारे में चर्चा करना ठीक नहीं… वे तो केवल कमी निकालने में ही लगे रहते हैं…. कोई बात बिगड़ जाए तो सबसे पहले उन्हें ही खबर मिलती है….. यदि मदद कर भी दें तो एवज में एहसान का ढिंढ़ोरा पीटते हैं पूरे मुहल्ले में.

अर्थात ..  चाचा-मामा, नाते-रिश्तेदार सब ऎसे ही हैं हाथी के दाँत की तरह..  केवल दिखाने के लिए…..

जो भी करना है.. खुद ही करना होगा.. पर करें तो क्या ? कुछ सूझ ही नहीं रहा है उन्हें ….. छिपकर रहने से काम तो चलेगा नहीं… अंततः तैयार तो होना ही पड़ेगा एक दिन …

और वह दिन जितना दूर होगा…. भय का साया भी उतना ही लंबा होगा, इसलिए टालने से समस्या घटेगी नहीं, बल्कि बढती ही जायेगी ……

…. अब और नहीं, बहुत हो चुका…. – यह सब सोच-समझकर माँ ने एक दिन कलेजा कड़ा कर ही लिया.

युद्ध से पहले कितनी भी तैयारी कर ली जाय, पर युद्ध शुरू होने तक कोई न कोई कमी महसूस होती ही रहती है … और जब एक बार शुरू हो जाता है तो योद्धा सारी कमियाँ भूल कर दुश्मन को परास्त करने में सारी शक्ति लगा देते हैं.

वे दोनों कॉलेज मोड़ पर ऑटो से उतर गयीं. योजना यह थी कि पहले माँ कॉलेज की तरफ बढेगी, कुछ दूर चलने के बाद वह पेड़ के नीचे रूक जायेगी और उसके बाद रूबी जायेगी. यदि लड़के छेड़ेंगे तो पहले उनसे प्यार से बातें की जाएगी, अगर वे नहीं मानते, जबरदस्ती करते हैं तो फिर आगे की कार्यवाही की जायेगी.

ऑटो से उतरने के बाद वे दोनों अलग-अलग कुछ दूरी पर खड़ी हो गईं और परिस्थिति का मुआयना करने लगीं. दो-तीन बदमाश लड़कों का गुट कुछ दूरी पर इधर-उधर चहलकदमी कर रहा था. वे वही लड़के थे जो रूबी को छेड़ा करते थे.

माँ ने आँखों से रूबी को इशारा किया तो वह वहीं खड़ी हो गई. उसके बाद माँ आगे की ओर बढ़ चली… कुछ दूर चलने के बाद वह उन लड़कों के गुट से आगे बढ गई और एक पेड़ के नीचे ठहर कर सुस्ताने का बहाना करने लगी.

लड़के आपस में बातें करते हुए सड़क के किनारे खड़े थे, वे कभी-कभी जोर से बातें करने लगते तो कभी ठहाका लगाकर हँस पड़ते… तो कभी पीछे मुड़कर किसी को ढ़ूंढ़ने लगते …. और फिर अजीब तरह से मजाक करने लगते.

माँ यह सब देखकर भयभीत हो उठी… उसके पैरों में कंपन होने लगा.

अबतक रूबी भी आगे की ओर बढने लगी थी. वह धीरे-धीरे सड़क के किनारे चल रही थी. भय तो उसे भी हो रहा था, पर बड़ी धैर्य के साथ वह सहज भाव में चल रही थी.

जब वह उन लड़कों के पास से गुजर रही थी तो उसके कदम तेज हो गये और जल्दी-जल्दी वह आगे बढ़ने लगी.

उन लड़कों में से एक ने उस पर अश्लील फिकरे कसे और दूसरे ने आगे बढ़कर उसका रास्ता रोका.

वह रूक गई और पीछे हट कर बगल से जाने लगी, इतने में तीसरा उसके सामने आकर खड़ा हो गया. अब वह घिर चुकी थी.

माँ जो दूर खड़ी रह कर देख रही थी, अब रूकी रह न सकी. उसे लगा कि कहीं कुछ अनर्थ न हो जाय, इसलिए वह दौड़कर उन लड़कों के पास आई और विनती के भाव में गिड़गिड़ाने लगी, “रूक बेटा.. रूक जा… अरे, यह तू क्या कर रहा है…?  बहन समान है तेरी… बहन के साथ कोई ऎसे व्यवहार करता है क्या ?”

“अरे आंटी, तुझे क्या जरूरत पड़ी है जो टाँग अड़ा रही है… ? तू चुपचाप जा अपना काम कर..”

“देख, तू जो कर रहा है सही नहीं कर रहा है… राह चलते लड़की के साथ कोई ऎसा सलूक करता है क्या ? छोड़ दे इसे …छोड़ दे.”

“तेरी कौन लगती है यह ?”

“तू कैसी बातें कर रहा है ? छोड़ दे इस लड़की को…”

“यदि नहीं छोड़ा तो तू क्या कर लेगी… तू क्या कर लेगी ?”

“तू नहीं छोड़ेगा..   देख, इसका बहुत बुरा परिणाम होगा..”

“क्या परिणाम होगा…?”यह कहते हुए एक ने माँ को धकेल दिया. वह सड़क पर लुढ़क गई.

उसे गिरा देख रूबी बेचैन हो उठी, उसके मन से भय गायब हो गया, वह उसे उठाने के लिये बढी. .. तबतक एकलड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया और जोर से खींचने लगा.

वह खींचती चली जा रही थी.

माँ उठ कर खड़ी हो गई. वह रूबी को खींचता देख आपा खो बैठी, उसने उस लड़के के गाल में जोर का एक चाँटा जड़ दिया. लड़के का पूरा शरीर झन्ना उठा. रूबी का हाथउससे छूट गया.

अब लड़के माँ पर टूट पड़े.

रूबी जोर-जोर से चिल्लाकर लोगों को बुलाने लगी. उसे टाइगर सर द्वारा बताये नुस्खे को आजमाने की जरूरत महसूस हुई. उसने मिर्च पाउडर एवं तीखी गंध का स्प्रेपॉकेट से बाहर निकाला और उसे लड़कों की आँखों में उड़ेल दिया.

लड़के बेचैन हो उठे. उनकी आँखों में कड़ुवाहट फैलने लगी, आँखों की जलन से वे बिलबिलाने लगे. उन्होंने माँ को छोड़ दिया और दोनों हाथेलियों से आँखें मलने लगे.

माँ अब उनके चंगुल से छूट चुकी थी. लड़के बुरी तरह परेशान हो रहे थे. माँ-बेटी ने मौके का लाभ उठाया और हाथों-चप्पलों से उनकी मरम्मत शुरू कर दी.

तब तक लड़की की पुकार सुनकर कुछ लोग वहाँ इकट्ठा हो गये थे. उन लोगों ने उन लड़कों को पकड़ लिया और उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया.

माँ बुरी तरह घायल हो गई थी. उससे चला नहीं जा रहा था, वह काफी दर्द में थी. बेटी ने उसे सहारा दिया तो वह लंगड़ा कर चलने लगी.

पर कुछ ही कदम चलने के बाद दर्द पुन: बढ़ गया. वह बेचैन हो उठी. उससे अब खड़ा रह पाना भी मुश्किल हो रहा था.रूबी ने बोतल से पानी निकाला और उसके चेहरे को धोया, उसे पानी पिलाया. उसे लेटने की इच्छा होने लगी तो वह सड़क के किनारे ही घास पर आँखें मूंद कर लेट गई.

ठंडी हवा का झोंका संजीवनी बनकर उसके बदन को छू रहा था. पेड़ की छांव से ठंढक टपक रही थी और उस छांव में वह बेजान लठ्ठ की भांति लेटी पड़ी थी.  कुछ जिज्ञासु लोग उसके इर्द-गिर्द खड़े थे और अपनी-अपनी राय दे रहेथे . कुछ लोग अस्पताल ले चलने की बात कर रहे थे तो कुछ वहीं आराम करते रहने की सलाह दे रहे थे.

आधे-पौन घंटे वह वहीं लेटी रही.. रूबी उसके तलबे सहलाती रही. कुछ देर तक मालिश करने के बाद उसे होश आ गया. वह हड़बड़ा कर बैठ गई. उसकी आँखों में अब भी रूबी की चिंता झलक रही थी. उसने अकुलाहट भरी नजरों से उसकी ओर देखा. वह शांत और सामान्य थी और माँ से सटकर बैठी हुई थी. उसके चेहरे पर भी थोड़ी घबराहट-सी थी. परंतु माँ को होश में आते ही उसकी घबराहट दूर हो गई, वह मुस्कारा उठी.

उसे मुस्कराता देख माँ भी मुस्करा उठी. अब उसके अन्दर का भय पूरी तरह से काफूर हो गया था. सारी परेशानियों का जड़ समाप्त हो चुका था और मन बहुत हल्का लग रहा था.

उनके इर्द- गिर्द खड़े लोग अब छटने लगे थे. वातावरण में शांति और सहजता व्याप्त हो गई थी. उपर नीले आकाश में भी कोई व्यवधान नहीं था, केवल बादलों का आना-जाना लगा हुआ था. बादलों की कुछ आकृति थी जो टूटकर दूसरी आकृति में परिवर्तित हो रही थी. वह अपलकउसे निहारने लगी, शायद ईश्वर को धन्यवाद देने के लिये निहार रही थी वह.

उसने दोनों हाथ उठाये और रूबी के कंधों पर रख दिया. मन में आत्मसंतुष्टि की अनुभूति एक शांत सागर की तरह फैलगई, जिससे आनन्द की लहरें शनैः शनैः उठने लगी थी.

उसकी नजरें जब रूबी की नजरों से टकराईंतो आँखें भर आईं…..और अश्रू की एक बूँद धारा बनकर चेहरे पर लुढ़क गई .. . …

“ हाय..री…  मेरी बच्ची…….”,  उसने उसे बाहों में भर लिया था.

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