समहुत का अक्टूबर-दिसंबर अंक

हिंदी सिनेमा के विख्यात कवि, गीतकार, फिल्म निर्माता शैलेन्द्र की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते डॉ.इंद्रजीत सिंह-जनकवि शैलेन्द्र। शैलेन्द्र:’इप्टा’ के गीतकार-शैलेन्द्र के निकट रहे रमेश चौबे के साथ विख्यात कथाकार बृजमोहन की अंतरंग बातचीत, दुर्लभ चित्रों के साथ। शैलेन्द्र पर लिखी किताब:’धरती कहे पुकार के।’

हिंदी रंगमंच की दशा और दिशा पर चिंता व्यक्त करतीं सुविख्यात रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला। भारतीय रंगमंच का विश्लेषणात्मक परिचय दे रहे हैं सुपरिचित नाटककार प्रताप सहगल।
प्रेमचंद का समय और समकालीनों का साहित्य

सिक्किम का लोकजीवन:नुनिता राई द्वारा और मॉरीशस की लोक छवि को याद करतीं सविता तिवारी।

रामकुमार तिवारी, मोनिका अग्रवाल,रोचिका अरुण शर्मा, विनीता परमार,विजय जोशी ‘शीतांशु’ की कहानियां।

संतोष श्रीवास्तव,पूनम झा,सरला सिंह,भानु भैरवी,व्यग्र पांडे, सविता दास सवि, अर्चना वर्मा की लघुकथाएं।

सुश्री भावना,शिव कुशवाहा,राग रंजन, दिलीप दर्श,अनुज की कविताएं।

कुमार प्रजापति, ऋषिपाल धीमान,मिदास्क आज़मी, राकेश अचल की ग़ज़लें।

आलोचना: इन दिनों–भागीनाथ यादवराव वाकले द्वारा हस्तीमल हस्ती की गजलों पर विमर्श !

रोहित कौशिक,ऋतु त्यागी, कुंवर रवींद्र के कविता संग्रह पर सीमा शर्मा,अनवर सुहैल और प्रेमनंदन के समीक्षात्मक आलेख।
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