एस. आनन्द के दस मुक्तक

एक

इतना आदर दिया गया मुझको
टूटा छप्पर दिया गया मुझको।
इस सियासत की गंदी भाषा का
अक्षर-अक्षर दिया गया मुझको

दो

सबको सबका विश्वास नहीं होता है
सुख सूरज सा ढल जाता ,अहसास नहीं होता है
दुख की बदली जब घिरती है चारों ओर
उस वक्त अपना भी अपने पास नहीं होता है।

तीन

कौन पीछे से हमें लरजतीं सदाएँ दे गया
छीनकर खुशियाँ मेरी अपनी व्यथाएँ दे गया।
बदनसीबी की ही चादर बुन रहा मैं आजकल
जो भी मेरे पास आया दुखतीं कथाएँ दे गया।

चार

गीत मेरे स्वर तुम्हारे
उड़ान मेरी पर तुम्हारे
बैसाखियों पर देश यह चलता रहा है
नींव मेरी घर तुम्हारे

पांच

कहना तो चाहता हूं कहते नहीं बनता
अंगार हथेली पर सहते नहीं बनता।
नजदीक बहुत हूँ और दूर है पुलिन,
खाली है नाव, लेकर बहते नहीं बनता।

छह

क्या वक्त है वतन से परे हो गये हैं हम,
चाहत के सगेपन से पेर हो गये हैं हम।
काँटों को बीन – बीन के गुंचों को जगह दी,
हंसते हुए चमन से परे हो गये हैं हम।

सात

कंधे पर लादे अपना घर
मैं भटक रहा हूँ इधर-उधर।
सड़कों, गलियों, चौरस्तों से
भरमाता है मुझे नगर।

आठ

शब्द का अर्थ गढ़ लिया मैंने,
दर्द था, दर्द पढ़ लिया मैंने
सोचा था खुशियाँ बिक गयीं होंगी,
बस, गम का दरिया पकड़ लिया मैंने।

नौ

चलते-चलते पाँव थककर चूर हैं,
फिर भी मंजिल से बहुत हम दूर हैं
जो हमारे हौसले को पंख देते थे कभी,
आज वे कहते हैं कि हम मजबूर हैं।

दस

नहीं जब चाँद होगा फिर कहाँ से चाँदनी होगी
अँधेरे में कोई आवाज ही तब रोशनी होगी
इरादे से जो बुनता जाल सपनों का उसी खातिर
किसी दरिया की माटी ने कोई मछली जनी होंगी।

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