संदीप श्याम शर्मा की दो कविताएं

आज मुक्त हूँ मैं

ज़ीर्ण-शीर्ण, क्षत-विक्षत,
जैसा भी हूँ,
आगम-निगम से आज मुक्त हूँ मैं ।

गूढ़-मूढ़, घायल-आहत,
जैसा भी हूँ,
आसक्त-विरक्त से आज मुक्त हूँ मैं ।

निर्धन-निर्बल, विषय-विरक्त,
जैसा भी हूँ,
विस्मय-निर्णय से आज मुक्त हूँ मैं ।

लुप्त-रिक्त, खिन्न-भिन्न,
जैसा भी हूँ,
आदि-अंत से आज मुक्त हूँ मैं ।

विकृत-दूषित, बदरंग-बदमस्त,
जैसा भी हूँ,
विरह-मिलन से आज मुक्त हूँ मैं ।

स्थूल-धूल, नग्न-भग्न,
जैसा भी हूँ,
जीवन-मरण से आज मुक्त हूँ मैं ।

तुम संग, तुम बिन

तुम संग जीवन मीठा अमरस,
तुम बिन पानी फीका फीका,
तुम संग जीवन समरवीर सा,
तुम बिन खाली तरकश जैसा ।

तुम संग जीवन हरित सावन है,
तुम बिन उपवन उजड़ा उजड़ा,
तुम संग जीवन सर्द हिमालय,
तुम बिन थार मरूस्थल जैसा ।

तुम संग जीवन स्वप्नलोक है,
तुम बिन अनुभव जले भुने से,
तुम संग जीवन चलता पहिया,
तुम बिन स्थिर पत्थर जैसा ।

तुम संग जीवन सरल सुगम है,
तुम बिन सब कुछ उलझन उलझन,
तुम संग जीवन शाही महल सा,
तुम बिन भग्न खंडहर जैसा ।

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1 Response

  1. Sushma sinha says:

    बहुत खूब !!

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