संजय शांडिल्य की 5 कविताएं

  1. पिता की तस्वीर

आज झाड़ते हुए आलमारी
अखबार के नीचे मिल गई
पिता की वही तस्वीर

कई साल पहले
ढूधवाले के हिसाब के वक्त भी
यह इसी तरह पाई गई थी
माँ की डायरी में
फूल की पँखुरी-सी सुरक्षित

फिर एक रात
जब दादी के दाँतों में हुआ था
भीषण दर्द
तब अँधेरे में
दवा के लिए निकलते हुए पैसे
यह भी खिंची चली आई थी
सिरहाने से बाहर

या पिछले ही साल
बहन के गौने के समय
जब भरा जा रहा था उसका ब्रीफकेस
तब भी संदूक से निकल आई थी
साड़ियों के साथ अचानक

पिता के यौवन से भरी
यही तस्वीर दिखती रही है सालों से

कोई नहीं जानता
कि पिता के बेफिक्र बचपन
और लुटे वर्तमान की तस्वीरें
कहाँ दबी पड़ी हैं

किसके अलबम में
किसकी स्मृति में…

  1. तुम

जैसे वेदों में साम
रामचरितमानस में राम
और महाभारत में गीता

जैसे संसृति में मानव
जैसे मानव में मन
और मन में हो ईश्वर

वैसे ही
मेरे जीवन में, प्रिये, तुम!

  1. तुमने कहा प्रेम

तुमने कहा प्रेम
और
कलम की नोंक पर उछलने लगे अनायास
अनजाने जानदार शब्द

कूँचियों से झड़ने लगे
सपनों के रंग

फूट पड़ा सामवेद कंठ से

तुमने कहा प्रेम
और
हृदय के भूले कमलवन में
दौड़ने लगी
नई और तेज हवा वासंती
मन की घाटी में गूँजने लगा
उजाले का गीत

खिल उठा ललाट पर सूर्य
चंदनवर्णी

उफनने लगी
आँसूवाली नदी

तुमने कहा प्रेम
और बिछ गई यह देह
और तपती रही…तपती रही…

फिर तुमने क्यों कहा प्रेम ?  

  1. शून्य

अंक से पहले
यह एक सुडौल पहरेदार
धूर्तताओं के इस महासमुद्र में
बचाता हुआ पृथ्वी का सच अपने नथने पर
बाद में
भरता हुआ साथी के हृदय में
दसगुनी ताकत

दूसरों के अस्तित्व से
जो कई गुना होती चली जाती है संख्या
उसे अपने रंग में ढाल लेने की  महान शक्ति से लैस
यह सवार हो जाता है जिसके सिर पर
उसे ला पटकता है शनीचर की तरह
विफलता के सबसे निचले पायदान पर

शून्य एक संत भी
गणितीय जीवन में कभी-कभी
कुछ जुड़ने-घटने के प्रति
उदासीन

चित्रकला सीखते छात्र की पहली सिद्धि यह
कि कितनी सफाई से
वह उकेर पाता है शून्य

सुबह के स्वर्णजल में पैठकर
एक पुजारी
जब उचारता है ओम
उसके होंठ शून्य बन जाते हैं

प्रकृति ने नहीं थामा हाथ
तब भी पूर्ण है यह सृष्टि का नियंता

अगर तोड़ो वटवृक्ष का बीज
तो उसके अंतर में जो शून्य है कुछ नहीं का
उसी की आत्मा में होता है कहीं
एक वृक्ष बहुत विशाल

मेरे वे सूर्य पिता
जो बोलते थे
तो कंठ से झरता था अमृत
और देखते थे
तो चीजें चमचमा उठती थीं नक्षत्रों-सी
आजकल क्यों ताकते हैं शून्य में

एक रात
जब पूरा शून्य हो जाता है चंद्रमा
तो मिल जाता है
मेरी माँ की शक्ल से
और यह खास सच है
कि सीधेपन से भरे चेहरे संसार के
अधिकतर गोल हैं
उन्हें गौर से देखो
तो दया आ जाएगी

तुम कहाँ हो नागार्जुन…आर्यभट्ट
नरेंद्रदत्त कहाँ हो
आओ देखो
कितना फैल गया है शून्य का साम्राज्य

जो दिखता है चारों ओर
उससे भी बड़ा है
नहीं दिखने का सच
खाए-अघाए हुए ईश्वर के पट-पीछे
भूख के अँधेरों में भटकते
उस ईश्वर के सच की तरह
जिसके सपनों में खनकते हैं शून्य-से
अगिन सिक्के!

  1. ताला

कितना परेशान करता है यह ताला

जब बंद करो
बंद नहीं होगा

खोलो हड़बड़ी में
खुलेगा नहीं
पसीना छुड़ा देगा सबके सामने

एकदम बच्चा हो गया है यह ताला

कभी अकारण अनछुए ही
खुल जाएगा ऐसे
साफ हुआ हो जैसे
कोई जाला…मन का काला !
——-

संजय शांडिल्य
जन्म :15 अगस्त, 1970 |
स्थान : जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |
शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |
वृत्ति : अध्यापन |

रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |

प्रकाशन : कविताएँ हिंदी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले(सारांश प्रकाशन, दिल्ली) तथा ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन उदय-वेलाके सह-कवि | दो कविता-संग्रह समय का पुलऔर नदी मुस्कुराई‘ शीघ्र प्रकाश्य |

संपादन :संधि-वेला (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), पदचिह्न (दानिश बुक्स, दिल्ली), जनपद : विशिष्ट कवि (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), प्रस्तुत प्रश्न (दानिश बुक्स, दिल्ली), कसौटी (विशेष संपादन सहयोगी के रूप में ), जनपद (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), रंग-वर्षएवं रंग-पर्व (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |

संपर्क : साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |
मो. नं. : 9430800034  |

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