गीता पवित्र है

संजय सिन्हा

 

ये कहानी है गीता की। ये कहानी है परी की। ये कहानी है हैवानियत की। ये कहानी है इंसानियत की।
आपने मेरी न जाने कितनी तस्वीरें ढेरों फिल्मी नायिकाओं के साथ देखी होंगी। आपने मुझे ढेरों खूबसूरत और मुस्कुराती नायिकाओं के बीच घिरे पाया होगा। पर आज यहां जिस लड़की की मैं चर्चा करने जा रहा हूं, वो बेहद ख़ास है।
आइए आज आपको मैं पहले गीता की कहानी सुनाता हूं, फिर सुनाऊंगा परी की कहानी।
गीता, शायद ये उसका नाम नहीं। दरअसल उसे अपना नाम पता ही नहीं। उसे तो यह भी नहीं पता कि वो कब और कहां पैदा हुई। वो कब बड़ी हुई। वो कब अपने घर से निकली। उसे कुछ भी नहीं पता। इसकी मानसिक हालत ठीक नहीं।
अपनी कहानी की नायिका

गीता तक मैं कभी पहुंच ही नहीं पाता, अगर मैं हरदोई नहीं जाता। दो दिन पहले अपनी मां Urmila Shrivastava बुलावे पर मैं हरदोई गया। वहां मैं उनके सर्वोदय आश्रम गया। कभी न कभी मैं उस आश्रम की चर्चा करूंगा, पर आज मैं सिर्फ और सिर्फ गीता और परी की कहानी सुनाऊंगा।
मैं सर्वोदय आश्रम गया था वहां चल रहे स्कूलों को देखने के लिए। वहां पढ़ रहे बच्चों से मिलने के लिए। वहां पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं से मिलने के लिए। मै बरामदे में बैठा था, अचानक अपने दोनों हाथ जोड़े हुए गीता मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मैंने बहुत गौर से उसे देखा। ये कौन है?
मेरे मन के सवाल को भांपते हुए मेरे साथ आश्रम तक आए हरदोई के एसडीएम अशोक कुमार शुक्ला ने मुझे बताया कि ये गीता है और आपको प्रणाम कह रही है। मैंने अपने हाथ गीता की ओर जोड़ दिए।
मेरे मन में एक नहीं, हज़ार कहानियों ने जन्म ले लिया था।
कौन है ये? मुझसे मिलने क्यों आई? क्या ये बोल नहीं सकती? पर इसकी आंखों में इतनी चमक है, ये कोई ख़ास महिला है।
अशोक शुक्ला जी ने मुझे बताना शुरू किया कि ये कौन है, कोई नहीं जानता। हमने इसका नाम गीता रखा है। ये ठीक से बोल नहीं पाती, पर बातें सब समझती है। इसे आज आपके यहां आने की पूरी जानकारी थी। यहां आपके आने की चल रही तैयारियों को देख कर ये सुबह से बहुत खुश है।
पर ये है कौन?
“संजय जी, मैं भी नहीं जानता। एक दिन यह हमें हरदोई रेलवे स्टेशन पर पड़ी मिली थी। कुछ दरींदों ने इसके साथ बलात्कार कर इसे गर्भवती कर के छोड़ दिया था। जब यह हमें स्टेशन पर यूं ही लावारिस हालत में मिली थी, तब इसे खुद भी नहीं पता था कि इसके साथ क्या हुआ था। इसके पेट में आठ महीने से अधिक का बच्चा पल रहा था। किसका बच्चा है, किसने एक लाचार लड़की के साथ ऐसी हरकत की, यह इतना भी बताने की स्थिति में नहीं थी।
हम इसे अस्पताल ले कर गए। वहां इसकी एक बेटी हुई। मानसिक रूप से विक्षिप्त एक महिला के मां होने की जानकारी हमने अखबारों के ज़रिए लोगों तक पहुंचाई कि शायद कोई इसे पहचान ले, अपने साथ ले जाए। कुछ लोग आगे तो आए, लेकिन बच्ची को गोद लेने के लिए। बच्ची को तो आप देख ही रहे हैं, एकदम परी की तरह है।
हमारे सामने समस्या थी कि अगर बच्ची को हम किसी को दे दें, तो मां का क्या होगा। मां को साथ ले जाने के लिए कोई तैयार नहीं था। फिर हमने उर्मिला जी से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि मां और बेटी दोनों को इस आश्रम में ले आइए।
पिछले दो सालों से दोनों यहीं हैं। हमने मां को नाम दिया गीता और बेटी को परी।
आज परी इस आश्रम में सबकी चहेती है। इसे यहां कई मांएं मिल गई हैं। ये सारा दिन इस गोद से उस गोद में उछलती फिरती है।
और गीता अपनी बेटी को बड़ी होती हुई देख रही है। इलाज़ के बाद इसकी भी स्थिति कुछ सुधरी है। इसे मालूम है कि संजय भइया यहां आ रहे हैं। उसने हमसे कई बार इशारे में कहा कि भइया को नमस्ते करुंगी।”
***
मैं गौर से गीता की ओर देख रहा था। मेरे सामने संसार की सबसे सुंदर दो आंखें चमक रही थीं। दोनों हाथ जुड़े हुए थे। बहुत धीमी और रुकी हुई आवाज़ में वो कहने की कोशिश कर रही थी, ‘नमस्ते’।
मैंने गीता को अपने साथ कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। गीता बैठी।
मैं संजय सिन्हा, जिसने न जाने कितनी सुंदर फिल्मी हीरोइनों के साथ तस्वीरें खिंचवाई हैं, आज पीछे खड़ा था, संसार की इन दो सबसे खूबसूरत आंखों के साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए।
अगर लियोनार्दो द विंची होते, तो इस तस्वीर को देख कर कह उठते, यही है मोनालिसा।
***
गीता के साथ तस्वीर खिंचवाने के बाद परी भी मेरे पास आई। अपनी एक और मां की गोद में।
मैंने उसकी तस्वीर खींचनी चाही तो उसने मेरी ओर देखा और मचलने लगी, मानो कह रही हो, “मामा, मेरे लिए खिलौने नहीं लाए?”
***
मैं हरदोई से दिल्ली लौट आया हूं, पर गीता और परी की कहानी भी मेरे साथ चल कर आई हैं।
यौन शोषण की शिकार महिलाओं की तस्वीरें हम आम तौर ढक कर, छुपा कर ही अखबारों में और टीवी पर दिखलाते हैं।
पर मुझे लगता है कि ढकना और छुपना तो उसे चाहिए जिसने इस दुष्कर्म को अंज़ाम दिया है।
मैं झुक कर सलाम करता हूं उन लोगों को जिन्होंने गीता को एक नई ज़िंदगी दी। मैं झुक कर सलाम करता हूं उस प्रशासनिक अधिकारी को, जिन्होंने गीता को मेरी मां तक पहुंचाया।
हर काल की कहानी में रावण है, तो राम भी हैं।
मेरा प्रणाम राम को। मेरा संदेश रावण को…देखो रावण, इस तस्वीर को गौर से देखो। अगर पहचान पाओ, तो पहचानो अपनी दरिंदगी को। तुम मर सको तो मर जाओ अपनी शर्मिंदगी के आंसुओं में डूब कर। तुम्हें मर ही जाना चाहिए।

परी की कहानी कल पढ़ें। इसे आप संजय जी के फेसबुक वॉल पर भी पढ़ सकते हैं। https://www.facebook.com/sanjayzee.sinha

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