जीवन की कठोरता से साक्षात्कार

पुस्तक समीक्षा 

संजीव ठाकुर

कहानियों के साथ –साथ रिपोर्ताज लिखने वाले हिन्दी –लेखक सत्यनारायण के बारे में यह कहना शायद अत्युक्ति नहीं होगी कि वह अपनी कहानियों से ज्यादा रिपोर्ताजों के कारण जाने जाते हैं । समीक्ष्य पुस्तक उनके रिपोर्ताजों की पाँचवीं पुस्तक है । हालांकि ‘कथादेश’ में स्तंभ के रूप में प्रकाशित होकर ये रिपोर्ताज अनेक पाठकों के सामने से गुजर चुके हैं लेकिन पुस्तक के रूप में एक साथ पढ़कर पाठक समग्रता में उन अनुभवों से रू –ब –रू हो सकते हैं जो सत्यनारायण ने जगह-जगह से प्राप्त किए हैं ।

इस पुस्तक को पढ़कर पाठक इस इस बात से सहमत हुए बिना नहीं रह सकते कि सत्यनारायण ने जीवन की कठोरता से जूझते लोगों को बहुत नजदीक से देखा है । यह उनकी घुमक्कड़ वृत्ति और कहीं भी ,किसी से मिलकर बतिया आने का स्वभाव ही है कि उनके अनुभव –संसार में इतने अलग –अलग तरह के लोग आ शामिल हुए हैं । हरषा दादा ,स्वामी जी, ग्यारसी, ताई ,कफन बेचने वाला डोकरा ,मोहन्या की बीबी ,रामली ,सिराज ,हिम्मत सिंह ,कवि सौदाई ,खेजड़े वाली ,प्यारे लाल जैसे अनेक लोग उनसे सीधे –सीधे टकराए हैं और उन्होंने उन लोगों के जीवन के मार्मिक प्रसंगों को इन रिपोर्ताजों में उतार दिया है ।

सत्यनारायण के रिपोर्ताजों की पुस्तक ‘यह एक दुनिया’ की तरह ही इस पुस्तक के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि यह कैसी दुनिया है जिसमें असंख्य लोग अपने –अपने दुखों की सलीब उठाए जीने को अभिशप्त हैं ?कोई उन्हें देखने वाला नहीं है ,कोई उनके लिए कुछ करने वाला नहीं है । इस दुनिया को आखिर कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता कि उसकी दुनिया में कोई सड़क के बीचोंबीच सोने को अभिशप्त है तो कोई विक्षिप्त हो गलियों में भटक रहा है ?कोई अपनी कला को मामूली दामों में बेचने को लाचार है तो कोई अपनी कविता को ?कोई खुद को ही बेचकर अपना पेट पालने की मजबूरी में जी रहा है तो कोई सौ रुपये जमाकर अपनी शादी रचाने के ख्वाब में जी रहा है ?कोई बैंड-दल में शामिल होकर अपनी साँसों का ही बाजा बजा रहा है तो कोई अपनी बेटियों से ही धंधा करवाकर अपना पेट पाल रहा है ?और तमाम अभावों में जीने वाले लोग किस तरह ‘बाबो भली करेला ‘ का विश्वास पाले हुए हैं यह भी इस किताब को पढ़कर जाना जा सकता है ।

निश्चय ही सत्यनारायण अपनी संवेदनशील भाषा में समाज की कई परतों को उघाड़ने का काम करते हैं । चूंकि सत्यनारायण के ज़्यादातर अनुभव राजस्थानी समाज से जुड़े हुए हैं ,उनको अभिव्यक्त करने वाली भाषा भी राजस्थानी युक्त है। राजस्थान से बाहर के पाठकों के लिए बहुत से शब्दों को समझना मुश्किल लग सकता है । आंचलिक शब्दों का प्रयोग एक सीमा तक ही होना चाहिए ,इस किताब को पढ़कर यह बात जरूर कही जा सकती है ।

यायावर की डायरी,

सत्यनारायण ,

मेधा बुक्स ,

पृ.150,

मूल्य 250 रुपये

 

You may also like...

Leave a Reply