संजीव ठाकुर की बाल-कथा ‘डरपोक’

संजीव ठाकुर

सीतेश पूरे हॉस्टल में बदनाम था। उसकी बदनामी इस बात में थी कि वह न तो कभी ठीक से नहाता था, न ही ढंग से कपड़े पहनता था और न ही बिस्तर ठीक करता था। उसकी किताबें-कापियाँ वगैरह भी जैसे-तैसे ही रहती थीं। वह कभी भी समय पर क्लास नहीं पहुँचता था। स्कूल की घंटी बजने के बाद वह जूतों में ब्रश करना शुरू करता था। खेल के मैदान में जिस किसी को लँगड़ी मार देना भी उसकी बुरी आदतों में से थी। क्लास रूम में शायद ही कोई ऐसे शिक्षक होंगे जिन्होंने उसे बेंच पर खड़ा न किया हो या पीछे दीवार से नाक सटाकर पूरे पीरियड खड़ा न किया हो? किसी भी विषय में होमवर्क नहीं करके जाना जैसे वह अपनी शान समझता था। गणित के शिक्षक तो उसे रोज मैदान के चार चक्कर जरूर लगवाते थे। कभी-कभी स्केल से हाथ पर ठुकाई भी कर देते थे।

उसका जीवन ऐसे ही कट रहा था।

एक दिन की बात है। अंग्रेजी की क्लास में जब सर ने सुलेख की कापी माँगी तो सीतेश उसी तरह सिर नीचा किए खड़ा हो गया। शिक्षक उसे दंड देने ही वाले थे कि उसी की क्लास का एक लड़का विजय खड़ा हो गया। बोला—”सर! आज इसे छोड़ दीजिए। कल से यह होमवर्क करके आएगा!”

”सोच लो विजय! अगर कल भी यह होमवर्क करके नहीं आया तो इसके साथ-साथ तुम्हें भी दंड मिलेगा।” सर ने कहा।

”ठीक है सर!” कहकर विजय बैठ गया। सर ने सीतेश को भी बैठने को कह दिया।

और अगले दिन सचमुच चमत्कार हो गया। सीतेश न केवल अंग्रेजी का बल्कि गणित और हिंदी के भी होमवर्क कर लाया था। सर के साथ-साथ पूरी क्लास को उसके इस बदलाव पर आश्चर्य हो रहा था।

अब सीतेश पिछली बेंच पर सिर झुकाए बैठा नहीं मिलता था। अब वह विजय के साथ अगली बेंच पर बैठता था। वह रोज नहाकर भी आने लगा था। हॉस्टल में बिस्तर, किताबें वगैरह व्यवस्थित भी रखने लगा था। हाँ, खेल के मैदान में उसकी शैतानियाँ जारी थीं।

अब वह रोज अपने हॉस्टल से विजय के हॉस्टल आ जाता और फिर उसके साथ ही स्कूल जाता। उनकी दोस्ती की मिसाल दी जाने लगी थी।

काफी दिनों के बाद एक दिन ऐसा आया जब सुबह सीतेश विजय के हॉस्टल नहीं आया। क्लास रूम में भी वह विजय के पास न बैठकर उससे दो-एक पंक्ति पीछे बैठ गया। विजय ने समझा, लेट आने की वजह से वह पीछे चला गया। छुट्टी होने पर वह तेज-तेज चलता विजय से आगे निकल गया। विजय ने समझा, उसे जल्दी पहुँचना होगा। लेकिन अगले रोज भी जब वह उसके हॉस्टल नहीं आया और क्लास में भी पीछे बैठा तब विजय को लगा, ‘जरूर कोई बात है।’

विजय स्वाभिमानी था ही, उसने भी तय कर लिया कि अब वह सीतेश से बात नहीं करेगा। लेकिन सीतेश ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है, वह जानना जरूर चाहता था।

थोड़े समय बाद उसके एक दोस्त कमल ने पूछा—”सीतेश तुमसे क्यों नहीं बात करता है—जानते हो?”

”नहीं तो!” विजय ने कहा।

”क्योंकि उसके हॉस्टल के एक सीनियर ने उसे डाँटा है। तुमसे मिलने और बात करने से मना किया है।”

विजय सब समझ गया। उसने सोचा—सीतेश से दोस्ती का कोई फायदा नहीं है। जो इतना डरपोक हो कि किसी सीनियर के डर से अपने दोस्त को छोड़ दे तो उससे अब कभी बात भी नहीं करनी चाहिए।

दोनों दसवीं करके स्कूल से निकल गए तब भी दोनों में अबोला ही रहा।

कोई एक साल बाद दोनों दूसरे शहर में अचानक आमने-सामने आ गए। विजय ने उसे रोकते हुए कहा—”कहो, डरपोक, कैसे हो?”

सीतेश उसके गले लग गया।

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2 Responses

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