संजीव ठाकुर की बाल कविताएं

संजीव ठाकुर

ताल     

पंखा चलता हन-हन–हन

हवा निकलती सन-सन–सन ।

टिक-टिक टिक–टिक चले घड़ी

ठक-ठक –ठक–ठक करे छड़ी ।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप

आँधी आती हिप–हिप–हिप ।

फू–फू–फू फुफकारे नाग

धू–धू-धू जल जाए आग ।

कोयल बोले कुहू-कुहू

पपीहा बोले पिऊ-पिऊ ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल

लहर–लहर लहराए बाल ।

 

सुबू ने खाई  

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

एक छीन ली पापा से

एक झटक ली मामा से

मम्मी ने अपने हिस्से की

दे दी उसको एक पकौड़ी !

 

फिर आई उसकी थाली

जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी

प्याज और आलू वाली

उसने न दी एक किसी को

खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

 

कौआ काका

 कौआ काका क्या कहते हो

आएँगी मेरी नानी ?

सोच मिठाई की बातें

मुँह में भर आया पानी ।

 

न जाने क्या–क्या लेकर

आएँगी मेरी नानी

मैं तो तुमको एक न दूँगा

मुझे नहीं बनना दानी !

 

लेकिन काले कौए काका

अगर नहीं आईं नानी

कौन मुझे दिलवाएगा

प्यारी सी गुड़िया रानी ?

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