संजीव ठाकुर की तीन बाल कविताएं

 दाना दे दो         

दाना दे दो चिड़िया को

ओ! मेरी नानी

और वहीं डालो बर्तन में

थोड़ा-सा पानी।

आएगी तो खाएगी

चिड़ियों की रानी

खुश होकर उड़ जाएगी

पीकर वह पानी।

फिर भेजेगी औरों को वह

लेने दाना, पानी

खुश हो जाओगी, देखोगी

उनको पीते पानी!

दीपों का त्योहार

दीपों का त्योहार दीवाली

रात हो गई कैसी काली

आसमान में छाई धुंध

जैसे हो बारूद की जाली ।

इतने जले पटाखे ,

बिजली इतनी बर्बाद हुई

हवा आज प्रदूषित होकर

घर –घर में आबाद हुई !

पढ़े-लिखे लोगों को आखिर

हुआ आज क्या पता नहीं ?

जले आज कागज़ के नोट

फिर भी कोई खता नहीं !

कितनी जगहों पर आग लगी

कितने लोगों की आँख जली

कितने लोगों को आज पटाखों

और दीप की कमी खली !

मस्ती के आलम में झूमे

फिर भी पागल हिंदुस्तानी

पर्यावरण प्रदूषित करने

की लिख दी फिर एक कहानी ।

अब नहीं मुझको पढ़ना

अम्मा तेरी याद मुझको बहुत सताती है

सच कहता हूँ चुपके –चुपके रोज रुलाती है ।

यहाँ कहाँ आगे –पीछे है प्यार जताने वाला ?

रूठूँ तो फिर कौन खड़ा है मुझे मनाने वाला ?

अच्छा होता गाय चराता ,क्यों भेजा स्कूल ?

कितना बढ़िया लगता था ,मुझे उगाना फूल !

मुझको क्यों भेजा है अम्मा पढ़ने इतनी दूर ?

यहाँ नहीं तेरे हाथों का लड्डू मोतीचूर !

चिट्ठी मेरी पहुँचे जैसे ,भागे –भागे आना

मेरा सब सामान बाँधकर मुझको घर ले जाना ।

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–एस॰ एफ 22, सिद्ध विनायक अपार्टमेंट ,

अभय खंड -3,इंदिरापुरम ,

गाजियाबाद -201010

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