विजय शंकर विकुज की कहानी ‘संक्रमण’

विजय शंकर विकुज

जन्म 12 सितंबर 1957, आसनसोल

शिक्षा – स्नातक

प्रकाशन – वागर्थ, वर्तमान साहित्य,  कतार,  संवेद,  निष्कर्ष,  मधुमती,  कथाबिम्ब,  प्रेरणा,  जनसत्ता, छपते छपते, उत्तर प्रदेश, भाषा, युद्धरत आम आदमी,  वैचारिकी,  स्वाधीनता,  सृजनपथ, समय के साखी इत्यादि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। कहानी के अलावा आलेख, संस्मरण, रिपोतार्ज, साक्षात्कार तथा अन्य कई विधाओं में लेखन। बहुत – सी रचनाओं का बांग्ला तथा उर्दू में अनुवाद। आकाशवाणी से अनेक कहानियों का प्रसारण।

उपलब्धियां – वर्तमान साहित्य के वर्ष 1991 अंक में कृष्ण प्रताप कहानी प्रतियोगिता में नक्शा कहानी पुरस्कृत।वर्तमान साहित्य द्वारा 2013 में आयोजित कमलेश्वर कहानी प्रतियोगिता में आपरेशन प्रलय (विपर्यय) कहानी पुरस्कृत। आसनसोल की साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति एवं हिंदी जन जागरण मंच द्वारा 2016 में पत्रकारिता सम्मान।

सम्पादन – रानीगंज से प्रकाशित कोयलांचल परिक्रमा (1996) का सम्पादन। प्रभाकर श्रोत्रिय कालीन वागर्थ में कुछ दिनों सम्पादन सहयोग। छपते छपते की साप्ताहिक पत्रिका उपहार का बारह वर्षों तक सम्पादन। कलयुग वार्ता दैनिक में वरिष्ठ उपसंपादक। वर्तमान में सन्मार्ग दैनिक के आसनसोल ब्यूरो में उपसंपादक

संपर्क – विजय शंकर विकुज

द्वारा – देबाशीष चटर्जी

आर. के. रॉय रोड, ईस्माइल पश्चिम

कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के पास

आसनसोल – 713301

मोबाइल- 7430915414

ई-मेल- bbikuj@gmail.com

 

आज क्यों इतनी देर हो रही?

प्रश्न मन में उभरते ही पलभर में किसी अप्रत्याशित की आशंका से रेनू भीतर ही भीतर सिहर उठी। उसी तरह अगले ही पल उसके मन ने दृढ़ता ओढ़ते हुए उत्तर दिया, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो अब तक उसके मोबाइल पर पापा, मम्मी या राकेश का फोन आ चुका होता।’

तो फिर देर क्यों हो रही है ?

फिर वही प्रश्न !

अब तक वह चार-पांच बार कॉलबेल बजा चुकी थी। भीतर कॉलबेल बजने की आवाज बाहर से भी उसे साफ सुनाई पड़ी थी। ड्राइंग रूम में बत्तियां जलती-सी लग रही हैं। दरवाजा भी भीतर से बंद है। फिर यह सन्नाटा कैसा ! यह तो कोई सोने का समय भी नहीं है। उसका मन कुढ़ उठा कि आखिर घर के भीतर सारे लोग कर क्या रहे हैं ? रेनू ने पलटकर निहारा। बाहरी गेट के उस ओर सड़क पर लोग आ-जा रहे हैं, गाड़ियां आ-जा रही हैं। आसपास की दुकानें खुली हुई हैं। लोग खरीदारी कर रहे हैं। अभी इतनी रात भी नहीं हुई है। आठ ही तो बजे हैं। यही तो समय है उसे रोज घर लौटने का। और दरवाजे पर पहुंचने के बाद कॉलबेल बजाते ही पापा, मम्मी या राकेश लपके-से आकर दरवाजा खोल देते हैं। आज सभी कहां गये ?

आखिर रेनू के हाथ कॉलबेल बजाने के लिए फिर उठा था कि उसे भीतर से सिटकनी खोलने की आवाज सुनायी पड़ी। रेनू ने हाथ वापस खींच लिया।

दरवाजा खुला। उसने एक पल दरवाजा खोलने वाली घर की उम्रदराज नौकरानी सुजाता को निहारा और धीरे से चौखट के भीतर पांव बढ़ाये। सुजाता दरवाजे से हटकर एक ओर सिर झुकाये चुपचाप खड़ी हो गयी। भीतर आकर रेनू ने ड्राइंग रूम में एक ओर से चारों ओर नजरें घुमायीं। उसके पिताजी एक ओर सोफे पर सिर झुकाये चुपचाप बैठे थे। छोटा भाई राकेश बंद टीवी के सामने गुमसुम बैठा था। और मां ने उसे अपनी ओर निहारते देख अपना चेहरा इस तरह फेर लिया जैसे उसने घर में कदम रखकर बहुत बड़ा अपराध किया हो।

सभी के चेहरे पर अजीब-सी कठोरता के भाव देख उसे भीतर ही भीतर आश्चर्य हुआ। आखिर घर के लोगों का ऐसा रवैया सामने क्यों आ रहा है ? सभी ने ऐसी चुप्पी साध रखी है कि उससे ही क्या, वे आपस में बात करेंगे तो कोई संक्रामक बीमारी उन्हें तुरंत दबोच लेगी। पता नहीं क्या बात है! ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ ?

रेनू मन मसोसकर रह गयी। उसने ठिठके कदमों से सभी की ओर कई बार निहारा। उसकी नजरें घूमती हुई सुजाता के ऊपर पड़ीं। उसकी ओर गौर से निहारती सुजाता ने झट अपना सिर झुका लिया और उसके बगल से होती हुई दरवाजा बंद करने के लिए आगे बढ़ गयी।

वह समझ गयी कि घर में इस सन्नाटे भरे माहौल में भीतर ही भीतर कोई ज्वालामुखी भभक रहा है जिससे वह पूरी तरह अंजान है। इसके साथ ही उसके मन में यह बात भी उभरी कि भले ही उससे अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा हो लेकिन सभी का व्यवहार उसके प्रति उपेक्षा और नाराजगी ही दर्शा रहा है। मगर क्यों ? उससे ऐसा क्या हो गया कि कोई उसकी ओर देखना नहीं चाह रहा। वह तो जिस तरह रोज अपने चैनल की नौकरी पर जाती है, आज भी गयी थी। जिस तरह वापस आती है, आयी है। घर या बाहर उससे कोई उल्टा-सीधा काम भी नहीं हुआ है।

तो फिर ? सभी के व्यवहार के साथ जब घर का सन्नाटा उसके मन पर भारी पड़ने लगा तो वह मां की ओर बढ़ी, ‘मम्मी, क्या हुआ है ?’

उसकी मां तमतमाकर उठी और बगैर कुछ बोले भीतर के कमरे की ओर बढ़ गयी। अजीब बात है ! उसने गौर किया, उसकी आवाज से उसके पिताजी और राकेश के चेहरे भी तमतमा उठे थे और वे दोनों अपनी-अपनी जगह इस तरह तनकर बैठ गये जैसे वह उनसे भी वही सवाल न पूछ बैठे। सुजाता रसोईघर की ओर बढ़ गयी थी।

रेनू भीतर ही भीतर छटपटा उठी। अपना दोष जाने बिना सभी का उपेक्षित व्यवहार उसके मन को मथने लगा था। और तुरंत ही उसने अपने मन को नियंत्रण में लेते हुए निर्णय लिया, वह भी चुपचाप रहेगी। कोई उससे बात करना नहीं चाहता तो वह भी किसी से बात नहीं करेगी। वह भी देखेगी, आखिर कब तक लोग उससे इस तरह मुंह फेरे रह पाते हैं। और उसने चुपचाप अपने कमरे की ओर कदम बढ़ा दिया। किसी ने उससे कुछ नहीं कहा।

अपने कमरे में आकर उसने वैनिटी बैग और मोबाइल टेबिल पर रखा, फिर फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चली गयी। थोड़ी देर में फ्रेश होकर आने के बाद वह पलंग पर लेट गयी। इसके साथ ही उसके दिमाग में घर के लोगों के व्यवहार को लेकर उथल-पुथल फिर तेज हो गयी। उसे एक ही सवाल बार-बार कुरेदने लगा था कि आखिर उसने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि उसे आज घर में सभी की उपेक्षा सहनी पड़ी। अपने भीतर उभरे सवालों का जवाब तलाशने में उसका मन और विह्वल हो उठा। रहस्य का एक धुंध उसके मन को अपने पाश में घेरने लगा था। और धुंध धीरे-धीरे एक पिंजरे का शक्ल अख्तियार करने लगा जिससे बाहर निकलने के लिए उसका मन फिर छटपटाने लगा।

पापा और मम्मी के ऐसे व्यवहार के पीछे आखिर क्या कारण हो सकता है। पापा ने आज तक कभी उससे इस तरह का कठोर व्यवहार नहीं किया। वह कई बार किसी बात को लेकर पापा से रूठ गयी थी तो वे उसके लिए बेचैन हो जाते थे। उसने अपने पापा से जब जो चाहा है, उन्होंने तुरंत लाकर दिया है। जब वह स्कूल में पढ़ती थी, तब से लेकर कॉलेज और अब टीवी चैनल की नौकरी से घर लौटने तक बेसब्री से उसका इंतजार करते मिलते। और आज उन्होंने ही उससे मुंह फेर लिया।

और मां के लिए वह तो हमेशा ही उनका बड़ा बेटा रही है। किसी भी बात पर मां उसके पापा से पहले उससे सलाह-मशविरा किया करती। आज तो वह उनकी सहेली की तरह भी है। टीवी चैनल के स्टुडियो से घर लौटने पर मां हमेशा पूछती कि आज की एंकरिंग कैसी रही। वह किसी धारावाहिक में ‘चांस’ मिलने के लिए ‘ट्राई’ क्यों नहीं करती। कई बार मम्मी ने बातों ही बातों में उससे पूछा भी है कि क्या उसका कोई ब्वॉय फ्रेंड है तो वह उन्हें जरूर बताये। उस वक्त वह हंसकर कहती है कि अगर कभी कोई ब्वॉय फ्रेंड बनेगा तो वह उसे सबसे पहले मम्मी से जरूर मिलवायेगी।

राकेश उससे चार साल छोटा है। उसका दुलारा-प्यारा भाई जो घर में हमेशा उसके आगे-पीछे रहता कि वह उसके लिए क्या लेकर आयी है। वह छोटा भाई भी है और दोस्त भी। मगर ….!

आज सभी का व्यवहार उसके प्रति इतना बदला-बदला-सा क्यों है ? आखिर कौनी-सी ऐसी बात हो गयी जिसने घर के अपनेपन के माहौल में ग्रहण लगा दिया। उसे लगने लगा, घर के अपनेपन का माहौल किसी भूकंप की चपेट में आ गया हो और उसका मन कांच की तरह दरकने लगा। जी करने लगा, वह फफककर रो पड़े और सबसे पूछे कि उसका अपराध क्या है।

‘छी:-छी:, ऐसा एड देखकर तो हमलोगों का सिर जमीन में गड़ गया। पता नहीं कैसे कर लिया इतना गंदा एड ! शर्म-हया सब धो डाला है। शादी क्या है कुछ पता नहीं होगा और महारानी मर्दानगी की दवा बेचकर आ रही हैं। छी:, मुझे तो वह एड देखकर शर्म आने लगी और और पता नहीं कैसे कैमरे के सामने बोले जा रही थी कि ……… यह दवा पुरुषों की खोयी जवानी वापस ला देगी और किसी को अपनी बीवी से शर्मिन्दा नहीं होना पड़ेगा। पता नहीं कितने लोगों ने यह प्रचार देखा होगा। जो लोग हमें जानते हैं, वे महरानी के बारे में क्या-क्या सोच रहे होंगे ……..!’

उसके कमरे के दरवाजे के सामने से गुजरकर पास ही रसोईघर में जाने के बाद मां बड़बड़ाये जा रही थी। उसे मां की आवाज साफ सुनायी पड़ रही थी जैसे उसे ही सुनाने के लिए मां वहां से बड़बड़ाती हुई गुजरी हो। वह पलभर में समझ गयी कि उसके पीछे उपेक्षापूर्ण व्यवहार के पीछे सच्चाई क्या है।

तो यह बात है ! उसके भीतर से हंसी आते-आते ठहर गयी। नहीं, यह हंसने वाली बात नहीं। तो क्या वह सीधा जाकर मम्मी-पापा से पूछे कि आखिर इस एड ने उन्हें जमीन में कितना नीचे गाड़ दिया ? तुरंत ही उसके मन ने सरगोशी की, नहीं-नहीं, अभी यह उचित नहीं होगा। पहले पूरे माजरे को समझना होगा। उसे तत्काल किसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बेहतर होगा कि वह फिलहाल चुप्पी साधे रहे।

और फिर उसे उस एड का ख्याल आ गया। यह उसकी टीवी लाइफ का पहला काम था। जब उसे इस एड का ऑफर मिला था तो उसे ऐसा लगा था कि अब उसका भाग्य खुलने वाला है। वही एड दो-तीन दिनों से टीवी चैनलों पर दिखाया जाने लगा है और लगता है कि घर के लोगों ने भी आज देखा होगा। अब अगर यह एड मर्दानगी बढ़ाने की दवा का है तो इसमें बुराई क्या है।

मां रसोईघर में अभी भी बड़बड़ाये जा रही थी। वह समझ गयी कि मां उसे सुनाने के लिए ही जोर-जोर से बोले जा रही हैं। अब कुछ बोलने से क्या फायदा ! जब उसने टीवी चैनल के लिए नौकरी ज्वायन किया था तो सभी खुश थे कि उनकी बेटी एंकरिंग करेगी। टीवी पर उसके चेहरा रोज दिखायी देगा। कल किसी धारावाहिक में भी ‘चांस’ मिल सकता है।

रेनू की सोच सपनों की दुनिया में पहुंचते-पहुंचते लड़खड़ाकर फिर बिखर गयी। वह तो एक टीवी एंकर है और यही तो उसका काम है। आखिर उस एड में उसने अभिनय ही तो किया है। टीवी पर धारावाहिकों और फिल्मों के प्रसारण के दौरान ब्रेक के समय साबून से लेकर खांसी की दवा, हारपिक से लेकर मोबाइल, हगिज से लेकर महिलाओं के पैड तक के एड दिखाये जाते हैं। इन्हें सभी लोग देखते हैं। बड़ों के सामने बच्चे और बच्चों को सामने बड़े तक देखते हैं।

फिल्मों में ‘किस’ से लेकर सुहागरात के दृश्य तक दिखाये जाते हैं, वह सब तो अभिनय ही होता है। सभी जानते हैं कि वह टीवी एंकर है। न्यूज रीडिंग से लेकर नेता, सेलिब्रेटियों का इंटरव्यू या किसी शॉपिंग मॉल का उद्घाटन, कई तरह के काम उसे करने पड़ते हैं। इस दवा का एड तो उसकी लाइफ का पहला ब्रेक है जिसके लिए उसे अच्छे पैसे मिले हैं। मर्दानगी बढ़ाने की दवा का एड उसने कर दिया तो कौन-सा अपराध हो गया। अब इस एड के कारण उसके घर के लोग उससे नाराज हो गये हैं तो उसके साथ अन्याय कर रहे हैं। अभिनय तो अभिनय होता है।

मां बड़बड़ा रही है। पापा और राकेश गुस्से में हैं तो वह क्या करे। दुनिया कहां की कहां पहुंच गयी है और उसके घर के लोग आज भी दकियानूसी दुनिया में भटक रहे हैं। सभी के भीतर एक भूत छिपा बैठा है जो आज भी दुनिया की सच्चाई से कोसों से दूर है।

मां की बड़बड़ाहट अब सुनायी नहीं दे रही थी। वह समझ गयी कि मां अपने मन की भड़ास निकालकर ड्राइंग रूम या अपने कमरे में चली गयी होंगी। रेनू चुपचाप पलंग पर पड़ी रही। उसके जेहन में तरह-तरह के ख्याल आते-जाते रहे। सोचते-सोचते वह उंघने लगी थी।

‘ रेनू दीदी, खाना खा लीजिये,’ सुजाता की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई।

‘ अ….. हां, ’ वह उठी, कमरे से बाहर आकर ड्राइंग रूम में पहुंची। वहां कोई नहीं था। फिर वह रसोईघर में पहुंची। वहां भी सिर्फ सुजाता थी जो उसके खाने की थाली सजा रही थी। रेनू ने चुपचाप उसकी ओर प्रश्नवाचक नजरों से निहारा।

‘ सभी ने खाना खा लिया है और सोने चले गये हैं। आप खाना खा लीजिये तो मैं भी खा लूंगी,’ सुजाता ने सिर झुकाये हुए ही धीरे से कहा।

क्या ! रेनू मन ही मन चौंक पड़ी। आज सभी ने उसके बगैर खाना खा लिया ? ऐसा तो कभी नहीं हुआ। वह समझ गयी कि उसके ऊपर सभी की नाराजगी इतनी अधिक है कि जो पहले कभी नहीं हुआ, वह आज हो गया। उसका मन दर्द से बिलख उठा। क्या वह इस घर की सदस्य नहीं है। न तो कोई बातचीत, न सवाल-जवाब और सभी अपने मन से उससे ऐसे कट गये हैं जैसे किसी से उसका कोई रिश्ता ही नहीं हो। उसने एक दवा का एड क्या कर दिया जैसे घर पर पहाड़ टूट पड़ा हो।

‘ मुझे भूख नहीं है। तुम खाना खा लेना,’ उखड़े मन से कहकर वह अपने कमरे में लौट आयी।

रात नींद देर से आयी मगर सुबह अपने निर्धारित समय पर ठीक खुल गयी। उठने के बाद फ्रेश होकर रेनू ने नाश्ता अपने कमरे में मंगवा लिया। फिर स्टुडियो के लिए निकलने तक घर के लोगों के साथ उसका सामना तो हुआ मगर सभी उसे देखते ही दूसरी ओर बढ़ जाते। सभी की उपेक्षा उसके मन पर भारी पड़ने लगी थी। वह भीतर ही भीतर छटपटा उठी कि क्या वह जाकर पापा-मम्मी से पूछे कि आज तक उन्होंने हर क्षेत्र में उसका हौसला जितना बढ़ाया था, वह सब ढकोसला था।

उसने एड में काम करके कोई गलत काम नहीं किया है। एक टीवी एंकर के लिए किसी एड में काम करने का मौका मिलना अच्छी ही बात है। घर के लोग उसके काम को समझने को कोशिश नहीं कर रहे। कोई बात नहीं, वह भी हार नहीं मानेगी। उसने भी तय कर लिया कि जब तक घर के लोग खुद ही पहल नहीं करते, वह भी किसी से बात नहीं करेगी।

जब वह स्टुडियो के लिए घर से निकली, सुजाता को छोड़कर उससे किसी ने भी बात नहीं किया था। मन में घर के लोगों के व्यवहार के बारे में सोचते-सोचते ही वह स्टुडियो पहुंची। उसने सोचा, वह स्टुडियो में किसी से ऐसी कोई बात नहीं करेगी जिससे उसकी मानसिक स्थिति या घर के लोगों के उपेक्षापूर्ण व्यवहार के बारे में एहसास हो जाये।

कई सहकर्मियों ने उससे हाय-हैलो किया तो उसने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा और अपनी सीट पर बैठी कंप्यूटर पर ‘बाइट’ को ‘एडिट’ करने की व्यस्तता प्रदर्शित करती रही। मगर मन की बेचैनी उसे भीतर से अपना आभास जरूर दे रही थी।

‘ क्या बात है, आज बड़ी ‘बिजी’ लग रही हो ?’ कप में चाय सुड़कती शबाना उसके करीब आ खड़ी हुई।

‘ हां, कुछ काम हल्का कर लूं,’ उसने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए धीरे से कहा, ‘ एक घंटे के बाद एक सेलिब्रिटी के इंटरव्यू के लिए निकलना है।’

‘ कल रात ही यौवन सुधा का एड देखा। अच्छा लगा। भविष्य में बहुत आगे बढ़ोगी,’ शबाना पीछे से उसका कंधा थपथपाकर आगे बढ़ गयी।

‘ थैंक्स,’ उसने कहना चाहा मगर कह न सकी। तुरंत ही घर के लोगों का व्यवहार आंखों के सामने झलक उठा और उसे लगा, शबाना उसे तमाचा लगाकर चली गयी हो।

उसने चोर नजरों से आसपास निहारा। सभी अपनी-अपनी सीट पर डटे अपना काम कर रहे थे। उसका मन फिर विह्वल हो उठा। अपने मन पर काबू पाने के लिए उसने अपनी पीठ को सीट की पुश्त से टिका लिया। उसने देखा, सामने बड़े स्क्रीन के टीवी पर न्यूज के ब्रेक में वही एड आ रहा था। उसके कई सहकर्मियों ने उस एड को देखते हुए उसकी ओर निहारकर प्रशंसा भरी नजरों से उसे ‘ विश’ किया। उसने इशारे से सभी को थैंक्स जताया।

टीवी पर फिर वही एड दोबारा आने लगा। वह खुले बाहों वाली एक छोटी स्कर्ट में टीवी के स्क्रीन पर मुस्कुराकर कह रही थी, ‘ यह दवा आयुर्वेदिक पद्धति से बनायी गयी है जिसकी कोई साइड इफेक्ट नहीं है। इसे अठारह साल के युवक से लेकर सत्तर-अस्सी साल तक के लोग ले सकते हैं। इसके सेवन से बूढ़े लोगों में दोबारा जवानी का जोश पैदा हो जाता है। जो लोग अपनी पत्नी, प्रेमिका या गर्ल फ्रेंड के पास जाने में अपनी कमजोरी के कारण हिचकते हैं, शर्मिन्दगी महसूस करते हैं, इस दवा के लेने से उन्हें शर्म से सिर झुकाना नहीं पड़ेगा …… ’

रेनू अपने आप मुस्कुरा पड़ी। जिन्दगी की खुशी से हताश लोगों की भलाई के लिए अगर उसने ऐसे किसी एड में काम किया है तो कुछ भी गलत नहीं है। और वह अब बच्ची थोड़े ही है। कल उसकी भी शादी होगी। फिर ………….. टीवी की एंकरिंग से टेली शॉपिंग तक …………. कल कोई बेहतर चांस भी मिल सकता है। भविष्य और भविष्य में तरक्की के बारे में आखिर कौन नहीं सोचता ?

उसे याद आया, कई रोज पहले ही उसने मम्मी को बताया था कि उसे एक दवा कंपनी के एड में काम करने का ऑफर मिला है। ऐसे एड में अच्छा पैसा देकर नये चेहरों को लिया जाता है क्योंकि नये चेहरे ही टीवी के दर्शकों से लेकर दवा के जरूरतमंदों तक को आकर्षित करते हैं। कल और भी बढ़िया चांस मिल सकता है।

उस समय मम्मी बहुत खुश हुई थी कि उसे एक बढ़िया मौका मिला है। इसी तरह उसे नामी चैनलों और टेली शॉपिंग कंपनियों में काम मिलेंगे। रेनू जरूर तरक्की करेगी। वह सुंदर और स्मार्ट भी तो है। मम्मी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वाद दिया था और यह खुशखबरी उसके पापा को सुनाने के लिए दौड़ पड़ी थी। सुबह स्टुडियो के लिए निकलने से पहले पापा ने भी उसे आर्शीवाद दिया था और राकेश ने कहा था कि उसके लिए एक अच्छा मोबाइल गिफ्ट देना होगा। रेनू ने हंसकर हामी भर दी थी।

और एड ने रिलीज होते ही उसके घर में कोहराम मचा दिया है। कल से आज तक वह जिन मानसिक परिस्थितियों से गुजरी है, उसने उसे एक गहरा दर्द देने के साथ ही कई तरह की बातें सोचने को मजबूर कर दिया है। जीवन में शायद ही उसकी संवेदना कभी इतनी चंचल हुई होगी ! रेनू ने सिर झटक कर निश्चय लिया, जो होगा देखा जायेगा। आखिर मम्मी-पापा आज नहीं तो कल समझेंगे कि कौन गलत है।

रात जब वह घर पहुंची तो कल की तरह उसे कई बार कॉलबेल बजाना नहीं पड़ा। पहली ही बार कॉलबेल का स्वीच दबाने के कई पल बाद ही मम्मी ने आकर खुद ही दरवाजा खोला और चुपचाप एक ओर हट गयी। रेनू ने एक नजर मम्मी के गंभीर चेहरे की ओर देखा और भीतर आकर दरवाजा बंद कर लिया।

उसने तिरछी नजरों से देखा। उसके पिताजी एक ओर सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे और राकेश टीवी पर क्रिकेट देख रहा था। रुटीन रोजाना की तरह सामान्य लगा पर एक अदृश्य खामोशी सभी के दरम्यान पसरी-सी नजर आयी।

वह चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गयी।

रोज की तरह फ्रेश होकर जब वह बाथरूम से बाहर निकली तो देखा कि मां उसके पंलग पर बैठी हुई है। उसे ऐसा लगा जैसे उसकी मां उसका ही इंतजार कर रही हो। रेनू ने सोच लिया था कि जब तक कोई खुद उससे बात नहीं करता, वह भी किसी से बात नहीं करेगी।

‘ क्या बात है ? तुझे क्या हुआ है ? ’ उसकी ओर सवालिया नजरों से देखती हुई उसकी मां ने ही पहल की।

‘ मुझे तो कुछ नहीं हुआ,’ बालों में कंघी करते हुए उसने आश्चर्य से मां की ओर देखते हुए कहा,’ जो कुछ हुआ है, वह आपलोगों को हुआ है। स्टुडियो से घर आने के बाद से ही आपलोगों का तमाशा देख रही हूं। जिसकी ओर देखती हूं, वही कुप्पा नजर आता है। पता नहीं मैंने क्या कर दिया है ?’

‘ क्यों न गुस्सा हों ! जिस एड में काम करने के लिए तू इतनी उतावली थी, उसकी सच्चाई के बारे में हमें पहले पता नहीं था। हमलोग तो यही सोच रहे थे कि तुझे अच्छा चांस मिल रहा है मगर एड देखने के बाद हमारा सिर शर्म से झुक गया। क्या किसी और चीज का एड तुझे नहीं मिला ? ’ मां ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा मगर चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी।

‘ क्या करुं, पहले ब्रेक में यही एड मिला तो मैंने सोचा कि मौका हाथ से क्यों जाने दूं ! और मम्मी, आजकल जमाना काफी ‘एडवांस’ हो गया है। अच्छे-अच्छे घर की लड़कियां ब्रेसियर और पैंटी का एड कर रही हैं। बारह-तेरह साल की लड़कियां पैड का एड कर रही हैं। मैं तो पूरी महिला हो गयी हूं,’ उसने हंसते हुए कहा,’ जमाना बहुत आगे बढ़ गया है मम्मी ! जो दिखता है, वही बिकता है। मुझे भी आगे बढ़ना है।’

‘ अब तू हमारे साथ भी बेशर्मों की तरह बातें करने लगी है ! याद रख, हमलोग मामूली लोग हैं। हमें समाज में रहना है। यह समाज तेरा टीवी चैनल या स्टुडियो नहीं,’ उसकी मां ने कुढ़ते हुए कहा,’ मेरा वश चलता तो मैं टीवी पर ऐसे सारे एड बंद करवा देती।’

‘ जिस समाज की बातें आप कर रही हो, वह समाज ही ऐसे एड अधिक देखता है और उसी के कारण ऐसे एड बनते भी हैं। आपलोग इन्हें देखती हो और कहती हो कि ऐसे एड गंदे होते हैं। लेकिन सच कहा जाये तो ऐसे एड कुछ भलाई का काम भी करते हैं। आज हमारे लिए जिन्दगी को समझना जरूरी हो गया है तो उससे तालमेल मिलाकर चलना भी जरूरी है। जिन्दगी की सबसे बड़ी सच्चाई यही है,’ रेनू ने गंभीरता ओढ़ते हुए मां को समझाने वाले अंदाज में कहा।

‘ मैं तो यही जानती-समझती हूं कि अच्छा अच्छा होता है और बुरा बुरा। तेरा यह एड अब टीवी पर आने लगा है। हमें जानने-पहचानने वाले लोगों ने इसे देखा होगा तो यहीं सोचेंगे कि यह लड़की कितनी बेशर्म है !’ मां ने जैसे सहमे-से स्वर में धीरे से कहा।

‘ फिर गलत सोच रही हैं,’ रेनू ने मां की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा,’ अब तक मुझे सैकड़ों एसएमएस और फोन आ चुके हैं। कई लोगों से मुलाकात होने पर कहा भी है कि एड में मेरा काम बहुत अच्छा हुआ है। मुझे तो इन कई दिनों में और भी कई टेली शॉपिंग कंपनियों और टीवी चैनलों से अच्छे ऑफर मिले हैं। और यहां मेरी स्थिति घर की मुर्गी की तरह है।’

‘ लोगों ने बधाइयां दी हैं, ऑफर मिले हैं तो अच्छी बात है लेकिन हमलोग तो तेरे मां-बाप हैं। हमलोग हर तरह से तेरे भले की ही सोचेंगे। टीवी पर खबरें पढ़ती हो, किसी मुद्दे पर चर्चा करती हो या किसी का इंटरव्यू लेते दिखाया जाता है तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है लेकिन यह एड हमें बेहद भौंडा लगा। टीवी पर ऐसे एड जब आते हैं तो मैं किसी काम में लग जाती हूं और तेरे पापा अखबार-किताब पढ़ने लगते हैं। राकेश भी उठकर चला जाता है। हमलोग एक-दूसरे से आंखें नहीं मिला पाते। ये एड बड़े ही बेहूदे तरीके से दिखाये जाते हैं और हमलोग देखने के लिए मजबूर हैं। पता नहीं आज बाजार में कैसी-कैसी बेहूदी चीजें आ गयी हैं….. ’ मां उसकी ओर निहारती हुई एक सुर से बोले जा रही थी।

‘ हमें इससे क्या ? ’ रेनू ने मां की बात काटते हुए कहा, ‘ मुझे तो बस अपने काम से मतलब है।’

‘ तुझे क्या जरूरत है नौकरी करने की ?’ मां ने तुनककर कहा,’ तेरे पापा सरकारी अफसर हैं। अच्छी तनख्वाह पाते हैं। तूने भी एमए तक पढ़ाई की है और इतना ही बहुत है। हमलोग तेरी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं।’

रेनू ने मां को प्यार से जकड़ लिया, ‘ तो ढूंढिये न लड़का। मैंने कब मना किया है। मेरी शादी जब होगी तब होगी। तब तक मैं घर में बैठकर क्या करुंगी ? मैं जानती हूं, आपलोग मुझे बहुत चाहते हैं।’

‘ ठीक है-ठीक है। अब ज्यादा मस्का मत मार,’ मां ने उसका गाल प्यार से थपथपाते हुए कहा,’ कल से हमलोगों ने ठीक से खाना नहीं खाया। आज एक साथ खायेंगे।’

‘ मां, एक बात कहूं ? ’ रेनू के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थिरक उठी।

‘ क्या ?’ मां ने आश्चर्य से उसे निहारा।

‘ पापा आजकल अखबार-पुस्तकों में ज्यादा डूबे रहते हैं। और रात में खाना खाकर सीधा सोने चले जाते हैं। उन्हें भी यह दवा एक बार खिलाकर देखो न।’

‘ बेहया – बेशर्म ! मां से ऐसा मज़ाक करती है,’ मां ने दिखावटी गुस्से से उसकी पीठ पर हल्के घूंसे लगाते हुए कहा,’ जल्दी आना। हमलोग इंतजार कर रहे हैं।’

‘ अच्छा आ रही हूं,’ रेनू हंसने लगी थी।

एटीएम से बारह हजार रुपये निकालकर रेनू ने अपने वैनिटी बैग में रखा लिया। बैग का चेन ठीक से लगाकर वह स्टुडियो की ओर चल पड़ी। ये रुपये उसने राकेश के लिए निकाले थे। आज जब वह घर से स्टुडियो के लिए निकलने वाली थी तो उसी समय राकेश ने शिकायत भरे स्वर में कहा था, ‘ दीदी, आपने मुझे एक अच्छा मोबाइल गिफ्ट देने का वादा किया था। अभी तक नहीं दिया। ज्यादा नहीं, पांच-सात हजार रुपये वाला होने से चल जायेगा।’

‘ मोबाइल तो मैं नहीं दूंगी,’ उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा था और राकेश का चेहरा तुरंत ही उदास होकर लटक गया था। उसके चेहरा देखते ही रेनू को हंसी आ गयी थी,’ हां, मगर पैसे दे दूंगी। तू अपनी पंसद का मोबाइल खरीद लेना।’

‘ दीदी, तुम हमेशा ही मुझे बेवकूफ बनाते रहती हो,’ राकेश के चेहरे पर एक साथ नाराजगी और खुशी दोनों झलक उठी थी।

उसके पिताजी और मां हंसने लगे थे। पापा ने हंसकर कहा था,’ अब किसी भी चीज के लिए मुझे नहीं कहता। मेरी तो कई अहमियत ही नहीं रह गयी है।’

‘ नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं है,’ रेनू ने राकेश की ओर निहारते हुए आत्मीय हंसी के साथ कहा,’ मैंने उससे वायदा किया था इसलिए उसका हक बनता है।’

‘ भगवान तुम दोनों को इसी तरह खुश रखे,’ मां ने उन दोनों की ओर देखते हुए आशीर्वाद स्वरूप धीरे से हाथ उठाते हुए कहा था। उसके पिताजी ने उसी आशीर्वाद के समर्थन में अपना सिर धीरे से हिलाया था।

एटीएम से बाहर आकर स्टुडियो के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए रेनू सोचने लगी, वह बारह हजार रुपये राकेश को दे देगी और कहेगी कि वह अपनी पसंद का एक अच्छा मोबाइल खरीद ले। अब तो वह अच्छा-खासा कमाने लगी है। इस नये एड ने उसके कई रास्ते खोल दिये हैं। इस एड के बाद उसने अब तक और भी दो एड में काम किये हैं। अगर वह साल में ऐसे आठ-दस एड में भी काम करेगी तो उसके लिए टीवी चैनल के सलाना पैकेज से बहुत ज्यादा होगा। वह अब अपनी ‘रेट’ बढ़ायेगी और जरूरत पड़ी तो चैनल की नौकरी छोड़ देगी। कुछ टेली शॉपिंग कंपनियां तो उसे भी शहर का एक सुपर मॉडल मानने लगी हैं। हर जगह उसके काम की तारीफ होने लगी है।

और स्टुडियो के रास्ते में चलते-चलते वह चौंक पड़ी। उसे लगा, वैनिटी बैग में उसके मोबाइल का रिंगटोन बज रहा है। रास्ते के किनारे एक ओर ठहरकर उसने अपना मोबाइल निकाला। उसने देखा, घर का नंबर है। मोबाइल ऑन कर उसने कान से लगा लिया,’ हैलो !’

उसे मां की घबरायी हुई आवाज सुनायी पड़ी,’ रेनू, जल्दी से घर चली आ। तेरे पापा की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गयी है। तू तो अभी रास्ते में ही होगी, ज्यादा दूर नहीं गयी होगी। राकेश का कॉलेज तो बहुत दूर है, उसे आने में देर हो जायेगी। मैंने फोन कर दिया है। तू जल्दी से आ जा बेटी ……. ’

रेनू ने मां की बात काटते हुए तुरंत कहा, ‘ मम्मी, तुम चिन्ता मत करो। मैं अभी आ रही हूं। मैं पड़ोस के डॉक्टर अंकल को भी फोन कर देती हूं। मैं आ रही हूं।’

वह तुरंत ही उल्टे पांव घर की ओर लौट पड़ी। घर से स्टुडियो के लिए वह पैदल ही निकलती है। स्टुडियो उसके घर से ज्यादा दूर नहीं है। रास्ते में ही उसने अपने पड़ोस में रहने वाले डॉक्टर अंकल को फोन कर दिया। डॉक्टर अंकल ने कहा, वे तैयार होकर उसके घर जा रहे हैं। रेनू के पैरों में गति आ गयी थी।

उसने हड़बड़ाये हुए घर में प्रवेश किया। ड्राइंगरूम में उसे कोई नजर नहीं आया। वह पिताजी के कमरे में गयी। वहां सामने पलंग पर उसके पिताजी बांये हाथ से अपना सीना दबाये लेटे नजर आये। उनके मुंह से हल्की-हल्की कराह निकल रही थी। वे अपनी आंखें बंद किये ऐसे पड़े थे जैसे जरा-सा भी हिलने-डुलने से उनकी तकलीफ जान पर भारी पड़ सकती है। उसकी मां बिखरे बाल और लटपटाये कपड़ों में उन्हें थामे बैठी हल्के हाथों से उनका सिर सहला रही थी। डॉक्टर अंकल उसके पिताजी की बांह में कोई इन्जेक्शन लगा रहे थे।

रेनू जाकर चुपचाप पलंग के पास खड़ी हो गयी। उसकी मां ने उदास और चिन्तित नजरों से उसे निहारा तो उसने इशारे से पूछा कि पिताजी को क्या हुआ। मां ने ओठों पर उंगली रखते हुए उसे चुप रहने का इशारा किया। वह चुपचाप खड़ी रही।

‘ घबराने की बात नहीं है। और थोड़ी देर होने से मुसीबत खड़ी हो जाती। वह तो भाई साहब की किस्मत अच्छी है कि मैं समय पर आ गया। अब थोड़ी देर में इनकी हालत संभल जायेगी मगर मेरी सलाह है कि आपलोग इन्हें आज ही अस्पताल में भर्ती करवा दें, ’ डॉक्टर अंकल ने इंजेक्शन लगाने के बाद सीधा खड़ा होते हुए धीरे से कहा, ‘ लगता है इन्हें माइनर अटैक आया है या कोई और भी बात हो सकती है। ऐसे में इनकी कई तरह की जांच जरूरी है। अब तो इनको कुछ दिनों तक सावधान रहना होगा तथा अपना इलाज नियमित रूप से चलाना होगा।’

‘ हां-हां, ठीक है,’ रेनू ने तुरंत कहा। और इसके साथ ही उसके मन में आया कि जब से उसके ‘ यौवन सुधा’ का एड टीवी चैनलों पर दिखाया जाने लगा है, तब से उसके पिताजी थोड़ा चिन्तित रहने लगे हैं। गुस्सा थूककर उन्होंने एड में उसका काम करना मान लिया है। शायद मानसिक रूप से वे अभी भी भीतर से उससे नाराज हैं। कहीं उसके कारण तो …… नहीं … नहीं।

‘ किस सोच में डूब गयी ? मैंने कहा न कि घबराने जैसी कोई बात नहीं। ’ डॉक्टर अंकल ने प्यार से उसके सिर पर अपना हाथ फेरते हुए कहा, ‘ क्या इन्होंने कोई ऐसी-वैसी चीज खायी थी या कोई दवा चल रही थी ?’

‘ नहीं तो …… हां, सिर्फ प्रेशर की दवा रोज लेते हैं, ’ रेनू की मां ने तुरंत कहा। रेनू मुड़कर अपने पिताजी का चेहरा गौर से देखने लगी। उनका चेहरा सामान्य होता नजर आया। उन्होंने आंखें खोलकर इशारे से आश्वासन दिया कि उन्हें थोड़ा आराम मिल रहा है। रेनू ने गहरी उच्छवास छोड़ी।

उसी समय कमरे में सुजाता सब्जी से भरा थैला लिये हुए दखिल हुई। घर में लोगों की भीड़ देखते ही वह अकबकाकर रेनू के पास आ खड़ी हुई। रेनू मन ही मन सोचने लगी कि उसके पिताजी की तबीयत ऐसे समय में खराब हुई जब घर में कोई नहीं था। सुजाता को तो सब्जी लाने के लिए काफी दूर बाजार जाना पड़ता है। बाजार तक आने-जाने में काफी समय लग जाता है। सुजाता का चेहरा घबराया हुआ था। उसके चेहरे को देखते हुए उसने उसे चुपचाप रहने का इशारा किया।

‘ घबराइये मत। एंबुलेंस या किसी गाड़ी में इन्हें अस्पताल ले जाइये। भर्ती करना होगा। मैंने पर्चे पर लिख दिया है, ’ डॉक्टर अंकल ने एक ओर से रेनू, उसकी मां और पिताजी को निहारकर कहा, ‘ ठीक है। मैं निकल रहा हूं। मुझे भी अस्पताल जाना है।’

रेनू ने हामी में सिर हिलाया। डॉक्टर अंकल अपनी अटैची सहित कमरे से बाहर निकल गये।

डॉक्टर अंकल के जाते ही सुजाता को थैला रसोईघर में रखकर आने का इशारा करते हुए रेनू पलंग पर अपने पिताजी की दूसरी ओर आ बैठी। उसने उनका दाहिना हाथ अपने हाथों में थामते हुए धीरे से कहा, ‘ पापा, आप चिन्ता मत कीजिये। आपको कुछ नहीं हुआ है। हमलोग आपको किसी अच्छे नर्सिंग होम में भर्ती करवायेंगे। मैंने राकेश को फोन कर दिया है। वह भी आता ही होगा।’

उसके पिताजी धीरे से मुस्कुराये, ‘ अब तकलीफ ………. थोड़ी कम ……. हो रही है। तुमलोग भी चिन्ता …….. मत करो। मैं ठीक हो जाऊंगा।’

‘ हां-हां, आप ठीक हो जायेंगे,’ रेनू ने पिताजी का सिर धीरे से सहलाते हुए मां की ओर आश्चर्य से देखा, ‘ मम्मी, यह क्या हुलिया बना रखा है। हमलोग अस्पताल जायेंगे। कपड़े जरा ढंग से पहल लो। बाल वगैरह भी ठीक कर लो।’

‘ अ …… हां, अचानक तेरे पापा की तबीयत खराब होने लगी थी। वे जिस तरह थे, उसी तरह पलंग पर पड़ गये। मैं भी …….  और पता नहीं क्या सोचते हुए उसकी मां के चेहरे पर सहमेपन की परछाइयां उभर आयीं। रेनू ने मां की ओर गौर से निहारते हुए उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की तो उसे लगा, पिताजी की तबीयत अचानक इस तरह बिगड़ जाने से वे शायद भीतर ही भीतर घबरा गयी हैं।

उसने पापा की ओर देखा, वे धीरे से बड़बड़ाये, ‘ मुझे जरा ठीक से सुला दो। अब काफी आराम लग रहा है।’

‘ हां, मैं आपको सहारा दे रही हूं, ’ कहकर रेनू पिताजी को धीरे-धीरे सहेजने लगी। उनके सिर को ठीक करने के लिए उसने तकिया को थोड़ा आगे की ओर खींचा। तकिया के साथ बिस्तर का चादर भी खिसक आया और उसके साथ ही नीचे से एक डिब्बा निकल आया। डिब्बा देखते ही रेनू की आंखें फटी की फटी रह गयीं। वह ‘ यौवन सुधा’ का पैकेट था।

रेनू ने सिर उठाकर अपनी मां और पिताजी की ओर निहारा। उन दोनों की आंखों में शर्मिन्दगी के साथ ही तुरंत एक चोर सिमट आया था। उन्होंने अपना सिर धीरे से नीचे झुका लिया।

‘ पापा – मम्मी !’ बदहवास-सा राकेश दरवाजे से भीतर की ओर आ रहा था।

रेनू ने झट तकिये से उस पैकेट को ढक दिया।

 

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